जिला बदर आदेशों पर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: कलेक्टरों के लिए कड़े निर्देश

Updesh Awasthee
नई दिल्ली, 31 अगस्त 2026:
'विजय कुमार राजपूत उर्फ विज्जू बनाम छत्तीसगढ़ राज्य एवं अन्य' (2026 INSC 926) के मामले में उच्चतम न्यायालय का हालिया निर्णय प्रशासनिक शक्तियों की मनमानी और नागरिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन स्थापित करने की दिशा में एक युगांतकारी कदम है। न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू की खंडपीठ ने इस फैसले के माध्यम से स्पष्ट किया है कि जिला मजिस्ट्रेटों द्वारा दी जाने वाली 'बाहरीकरण' (Externment) या जिला बदर की सजा एक "असाधारण उपाय" है, जिसे केवल असाधारण परिस्थितियों में ही लागू किया जाना चाहिए। यह निर्णय न केवल अनुच्छेद 19(1)(d) के तहत निर्बाध संचरण के मौलिक अधिकार की रक्षा करता है, बल्कि उच्च न्यायालयों को भी यह संदेश देता है कि प्रक्रियात्मक उल्लंघन के मामलों में 'वैकल्पिक उपाय' का हवाला देकर संवैधानिक उत्तरदायित्वों से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता। 

मामले की पृष्ठभूमि और प्रशासनिक शिथिलता का इतिहास

इस कानूनी विवाद की शुरुआत 3 अप्रैल 2019 को हुई, जब पुलिस अधीक्षक (SP), रायगढ़ ने विजय कुमार राजपूत के खिलाफ 2009 से 2019 के बीच दर्ज 10 पुराने आपराधिक मामलों के आधार पर जिला बदर की सिफारिश की। इस ज्ञापन पर संज्ञान लेते हुए जिला मजिस्ट्रेट (DM), रायगढ़ ने 3 मई 2019 को मामला (केस नंबर 03/2019) दर्ज किया। 

दिलचस्प बात यह है कि यह मामला वर्षों तक लंबित रहा और अंततः 6 अक्टूबर 2025 को जिला मजिस्ट्रेट ने इसे बंद करने का आदेश (Closure Order) पारित किया। मजिस्ट्रेट ने यह स्वीकार किया कि विजय उन पुराने मामलों में बरी हो चुका है और 2019 के बाद से कोई नई पुलिस रिपोर्ट नहीं आई है। हालांकि, इस कार्यवाही को बंद करते समय एक "चेतावनी" दी गई कि वह भविष्य में किसी भी आपराधिक गतिविधि में शामिल न हो। कानूनी दृष्टि से, यह चेतावनी केवल उपदेशात्मक थी क्योंकि उस समय जिला बदर के लिए कोई 'वस्तुनिष्ठ सामग्री' (Objective Material) उपलब्ध नहीं थी।

विवाद का पुनर्जन्म: नई प्राथमिकी और प्रक्रियात्मक विफलता

मामला बंद होने के कुछ ही दिनों बाद, दो नई घटनाओं ने प्रशासनिक मशीनरी को सक्रिय कर दिया। पहली घटना अपराध संख्या 117/2023 थी, जो नगर पालिक निगम अधिनियम से संबंधित थी। विशेष रूप से, इस प्राथमिकी को छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय द्वारा 4 सितंबर 2024 को ही रद्द (Quashed) किया जा चुका था, फिर भी जिला मजिस्ट्रेट ने अपने आदेश में इसे आधार बनाया, जो स्पष्ट रूप से "विवेक के गैर-प्रयोग" (Non-application of mind) को दर्शाता है। 

दूसरी घटना 30 अक्टूबर 2025 को दर्ज अपराध संख्या 483/2025 थी। यह मामला भारतीय न्याय संहिता (BNS) और SC/ST अधिनियम के तहत सोशल मीडिया पर एक धार्मिक वीडियो विवाद से संबंधित था। इसी आधार पर विजय को 30 अक्टूबर को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। जब विजय न्यायिक हिरासत में था, तब 4 नवंबर 2025 को जिला मजिस्ट्रेट ने पिछले क्लोजर ऑर्डर को रद्द करते हुए एकपक्षीय (Ex-parte) आदेश पारित कर दिया और विजय को 1 साल के लिए जिला बदर कर दिया। उच्चतम न्यायालय ने इस "त्वरित कार्रवाई" की आलोचना करते हुए इसे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों और अधिनियम की धारा 8 का गंभीर उल्लंघन माना, क्योंकि जेल में बंद व्यक्ति को न तो नोटिस दिया गया और न ही सुनवाई का अवसर।

उच्च न्यायालय का रुख और वकीलों के विधिक तर्क

जब इस आदेश को छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय (WPCR No. 16 of 2026) में चुनौती दी गई, तो न्यायालय ने 22 जनवरी 2026 को याचिका खारिज करते हुए याचिकाकर्ता को धारा 9 के तहत राज्य सरकार के पास अपील करने का निर्देश दिया। उच्चतम न्यायालय ने उच्च न्यायालय के इस "हाथ खींचने" (Hands-off approach) वाले रवैये पर आश्चर्य व्यक्त किया। सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों के मुख्य विधिक तर्क इस प्रकार थे:
पक्ष: मुख्य विधिक तर्क- अपीलकर्ता (श्री पल्लव मोंगिया)
• धारा 8 के तहत अनिवार्य नोटिस और सुनवाई का पूर्ण अभाव। 
• प्रशासनिक अधिकारियों के पास अपने ही आदेशों की समीक्षा (Review) या पुनर्विचार की अंतर्निहित शक्ति नहीं है। 
• क्षेत्राधिकार के अभाव और प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन के मामलों में वैकल्पिक उपाय (Appeal) रिट याचिका के लिए बाधा नहीं है।

प्रतिवादी (सुश्री अंकिता शर्मा)
• अधिनियम की धारा 9 के तहत अपील का अधिकार एक प्रभावी सुरक्षा कवच है। 
• आरोपी ने पिछले क्लोजर ऑर्डर में दी गई चेतावनी का उल्लंघन किया। 
• सतनामी, सिंधी और अग्रवाल समाज के भारी आक्रोश के कारण सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने हेतु त्वरित निवारक कार्रवाई आवश्यक थी।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला और कानूनी व्याख्या

न्यायालय ने छत्तीसगढ़ राज्य सुरक्षा अधिनियम, 1990 की धाराओं (5, 8, और 9) का सूक्ष्म विश्लेषण किया। न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता ने स्पष्ट किया कि धारा 5(b) के तहत बाहरीकरण की शक्ति केवल तब उपयोग की जा सकती है जब कोई व्यक्ति बल या हिंसा वाले अपराधों या IPC/BNS के विशिष्ट अध्यायों (जैसे XII, XVI, XVII) के अपराधों में शामिल हो। विजय के खिलाफ दर्ज नया मामला (अपराध संख्या 483/2025) मुख्य रूप से धार्मिक भावनाओं (Chapter XV BNS) से संबंधित था, जो धारा 5(b) की अनिवार्य शर्तों के दायरे में नहीं आता।

न्यायालय ने अपने तर्क की पुष्टि के लिए निम्नलिखित ऐतिहासिक नजीरों का उपयोग किया:
नवाबखान अब्बासखान बनाम गुजरात राज्य: न्यायालय ने जस्टिस कृष्णा अय्यर के शब्दों को दोहराते हुए कहा कि जहाँ वैधानिक सुनवाई अनिवार्य हो और उसका पालन न किया जाए, तो वह आदेश 'void ab initio' (शुरुआत से ही शून्य) होता है।

Godrej Sarah Lee Ltd. बनाम आबकारी एवं कराधान अधिकारी: यदि कोई आदेश प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन में या क्षेत्राधिकार के बिना पारित किया गया है, तो रिट अदालत को हस्तक्षेप करना चाहिए, भले ही वैकल्पिक उपाय उपलब्ध हो। 

दीपक बनाम महाराष्ट्र राज्य: न्यायालय ने स्पष्ट किया कि जिला बदर व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर एक गंभीर हमला है। "व्यक्तिपरक संतुष्टि" (Subjective Satisfaction) के लिए ठोस "वस्तुनिष्ठ सामग्री" होना अनिवार्य है, केवल समुदायों के "आक्रोश" या "नाराजगी" के आधार पर मौलिक अधिकारों का हनन नहीं किया जा सकता।

प्रशासनिक अधिकारियों के लिए कड़े और अंतिम आदेश

उच्चतम न्यायालय ने जिला मजिस्ट्रेट की इस धारणा को पूरी तरह खारिज कर दिया कि उनके पास अपने ही आदेशों को 'रिव्यू' करने की शक्ति है। न्यायालय ने कड़े शब्दों में कहा कि प्रशासनिक अधिकारियों के पास अपने आदेशों की समीक्षा करने की कोई अंतर्निहित शक्ति नहीं होती जब तक कि कानून स्पष्ट रूप से इसकी अनुमति न दे। 6 अक्टूबर के बंद मामले को बिना नए नोटिस के दोबारा खोलना पूरी तरह अवैध था।

न्यायालय के अंतिम निर्देश निम्न प्रकार हैं:
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय और जिला मजिस्ट्रेट, रायगढ़ के आदेशों को तत्काल प्रभाव से रद्द (Quash) किया जाता है।
विजय कुमार राजपूत उर्फ विज्जू के खिलाफ लागू 1 साल के जिला बदर के आदेश को निष्प्रभावी घोषित किया जाता है।
अपीलकर्ता को उन सभी जिलों में पुनः प्रवेश और निवास की पूर्ण स्वतंत्रता है जहाँ से उसे निष्कासित किया गया था।

यह फैसला भविष्य के लिए एक मिसाल है कि केवल पुलिस रिपोर्टों या जनता के आक्रोश के आधार पर की जाने वाली प्रशासनिक मनमानी कानून के शासन से ऊपर नहीं हो सकती। यह निर्णय स्पष्ट करता है कि जब तक प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों (Procedural Safeguards) का कड़ाई से पालन नहीं होता, तब तक कोई भी प्रशासनिक आदेश संवैधानिक कसौटी पर खरा नहीं उतर सकता।  रिपोर्ट: उपदेश अवस्थी (विधि सलाहकार एवं पत्रकार)।

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