श्री संगेखारा महादेव कथा: बुरहानपुर क्षेत्र ताप्ती नदी में स्थित 900 वर्ष प्राचीन दिव्य अखंड शिवलिंग

Updesh Awasthee
प्रथम अध्याय:
हे श्रद्धालुओ! आज मैं आपको उस दिव्य और प्राचीन शिवलिंग की कथा सुनाता हूँ, जो सूर्यपुत्री माँ ताप्ती की गोद में विराजमान है। दक्षिण के द्वार कहे जाने वाले बुरहानपुर नगर में, पावन राजघाट के तट पर भगवान शिव का एक अति प्राचीन रूप विद्यमान है। यह शिवलिंग लगभग 900 वर्ष है, जो अपनी प्राकृतिक भव्यता के साथ आज भी अडिग है। संगेखारा नामक गहरे काले पाषाण से निर्मित यह अखंड शिवलिंग अपनी सुदृढ़ता के कारण सदियों से नदी के प्रचंड वेग को सहते हुए भी सुरक्षित है। प्राचीन काल में, जब यहाँ सनातन धर्म की परंपराएँ चरम पर थीं, तब श्रद्धालु श्रद्धापूर्वक इस दुर्लभ शिवलिंग का पूजन किया करते थे। 

द्वितीय अध्याय: 

कालचक्र के प्रभाव से जब शासन व्यवस्था बदली और फारूकी शासन काल आया, तब महादेव की इस लीला ने एक अद्भुत मोड़ लिया। उस समय की विपरीत परिस्थितियों में, इस दुर्लभ और प्राचीन शिवलिंग को माँ ताप्ती ने अपनी लहरों के आंचल में छुपा लिया। भगवान शिव एक विशाल चट्टान और हाथीनुमा आकृति वाले पत्थर के नीचे विश्राम करने लगे। यह प्रकृति का ही रक्षण था कि इतने वर्षों तक वह पावन शिवलिंग बाहरी जगत की दृष्टि से ओझल रहकर जल के भीतर सुरक्षित रहा। भक्त उन्हें भूल गए थे, किंतु महादेव वहीँ विद्यमान थे, अपनी तपस्या में लीन। 

तृतीय अध्याय: 

वर्ष 2019 के अप्रैल मास की वह घड़ी अत्यंत मंगलकारी थी, जब माँ ताप्ती का जल स्तर नीचे उतरा। भीषण ग्रीष्म काल में जब नदी ने अपना मार्ग संकुचित किया, तब अचानक वह हाथीनुमा शिला दृष्टिगोचर हुई और उसके नीचे से संगेखारा महादेव का वह भव्य रूप पुनः प्रकट हुआ। वर्षों के अंतराल के बाद महादेव को साक्षात् देख भक्त आनंदित हो उठे। यह किसी चमत्कार से कम न था कि शताब्दियों तक जलमग्न रहने के बाद भी उस अखंड शिवलिंग की आभा पूर्ववत बनी हुई थी। 

चतुर्थ अध्याय: 

जैसे ही यह समाचार फैला, बुरहानपुर और आसपास के क्षेत्रों से श्रद्धालुओं का तांता लग गया। स्थानीय लोग प्यार और अपार श्रद्धा से इन्हें "राजघाट वाले बाबा" पुकारने लगे। भक्तों ने देखा कि महादेव ने किसी कृत्रिम देवालय को नहीं, बल्कि माँ ताप्ती की रेती और शीतल जल को ही अपना स्थायी निवास चुना है। संगेखारा पत्थर की मजबूती ऐसी है कि नदी के बहाव का उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। वर्तमान में भक्त उन्हें इसी नाम से पूजते हैं और उनके दर्शन को अपना सौभाग्य मानते हैं। 

पंचम अध्याय: 

आज की स्थिति यह है कि महादेव ताप्ती नदी के जल स्तर पर अपनी उपस्थिति निर्भर रखते हैं। जब-जब जल कम होता है, बाबा साक्षात् दर्शन देते हैं और भक्त राजघाट पहुँचकर उनका जलाभिषेक और पूजन करते हैं।संगेखारा महादेव आज भी अपने मूल स्थान पर ही विराजमान हैं, उन्हें किसी अन्य मंदिर में स्थापित नहीं किया गया है। जो भी भक्त सच्ची श्रद्धा से राजघाट वाले बाबा का ध्यान करता है, उसके कष्ट माँ ताप्ती के जल की भांति बह जाते हैं।
॥आचार्योपदेशावस्थिना विरचिता इति श्रीसंगेखरामहादेवकथा सम्पूर्णा॥
बोलिए राजघाट वाले बाबा की जय 
हर हर महादेव 

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