सावन का महीना भगवान शिव की आराधना के लिए वर्ष का सबसे पवित्र समय माना जाता है। वर्ष 2026 में 24 अगस्त को सावन का अंतिम सोमवार है। यदि आप भारी कर्ज, आर्थिक तंगी या जीवन के दुर्भाग्य से परेशान हैं, तो इस सिद्ध तिथि पर शिव दारिद्र्य दहन स्तोत्र का पाठ आपके जीवन के समस्त अभावों को भस्म कर सकता है।
महर्षि वशिष्ठ और उनके आश्रम की पौराणिक कथा:
वैदिक काल में महर्षि वशिष्ठ का आश्रम केवल ज्ञान का केंद्र नहीं, बल्कि हज़ारों शिष्यों, ऋषियों और पशु-पक्षियों का आश्रय स्थल था। एक बार दैवीय विधान और ग्रहों के विषम प्रभाव के कारण महर्षि वशिष्ठ के आश्रम और आसपास के क्षेत्र में वर्षों तक भयंकर अकाल और सूखा पड़ा। नदियाँ सूख गईं, वृक्ष निष्प्राण हो गए और आश्रमवासियों के समक्ष भूखों मरने की नौबत आ गई। ब्रह्मर्षि वशिष्ठ स्वयं त्रिकालदर्शी थे और सुख-दुःख से परे थे, लेकिन अपने शिष्यों, अतिथियों और पशु-पक्षियों को दाने-दाने के लिए तरसते देख उनका हृदय द्रवित हो उठा। जब मानवीय प्रयास निष्फल हो गए, तब महर्षि वशिष्ठ ने ब्रह्मांड के स्वामी देवाधिदेव महादेव की शरण लेने का निश्चय किया। वे जानते थे कि भगवान आशुतोष (शिव) ही क्षण भर में असंतोष और अभाव को पूर्णता में बदल सकते हैं। वशिष्ठ जी ने घोर तपस्या प्रारंभ की और शिवलिंग के समक्ष अश्रुपूरित नेत्रों से भगवान शिव के अनुपम स्वरूप का ध्यान करते हुए ८ श्लोकों की रचना की। इस स्तोत्र की प्रत्येक पंक्ति के अंत में उन्होंने आर्त स्वर में पुकारा-
'दारिद्र्य दुख दहनाय नमः शिवाय'
(अर्थात हे शिव! मेरी दरिद्रता रूपी दुःख का दहन कर दीजिए)।
महर्षि वशिष्ठ की इस निश्छल और जनकल्याणकारी स्तुति से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए। महादेव ने अपने दिव्य तेज से आश्रम की समस्त कंगाली और अकाल को क्षण भर में समाप्त कर दिया। पृथ्वी फिर से हरियाली और अन्न-धन से परिपूर्ण हो गई।
स्तोत्र का वास्तविक अर्थ और महत्व
साधारण भाषा में लोग 'दारिद्र्य' का अर्थ केवल धन की कमी मानते हैं, किंतु आध्यात्मिक दृष्टिकोण से इसके तीन अर्थ हैं भौतिक दारिद्रय, (भारी कर्ज, व्यापार में घाटा, कंगाली और धन का अभाव दूर होता है) शारीरिक दारिद्रय (असाध्य बीमारियां, अकाल मृत्यु का भय और शारीरिक दुर्बलता नष्ट होती है) और मानसिक दारिद्रय (चिंता, अज्ञान, भय, निराशा और मानसिक अशांति का नाश होता है)
24 अगस्त 2026 (अंतिम सोमवार) की विशेष अनुष्ठान विधि
सावन के इस अंतिम सोमवार का पूर्ण लाभ उठाने के लिए इस प्रकार पूजा और पाठ करें:
1. शुभ समय: 24 अगस्त को सुबह या संध्या समय (प्रदोष काल - सूर्यास्त के आसपास का समय) पाठ के लिए सबसे उत्तम है।
2. पूजा सामग्री: स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करें। शिवलिंग पर तांबे के पात्र से जल, दूध, बेलपत्र, धतूरा और सफेद चंदन अर्पित करें।
3. दीपक व संकल्प: गाय के शुद्ध घी का दीपक जलाकर उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें। हाथ में जल व अक्षत लेकर अपने कष्टों व कर्ज से मुक्ति का संकल्प लें।
4. पाठ संख्या: संकल्प के बाद 'शिव दारिद्र्य दहन स्तोत्र' का 11 या 21 बार श्रद्धापूर्वक पाठ करें।
सावन सोमवार को किया गया यह अनुष्ठान वर्ष भर के लिए सुख, समृद्धि और आरोग्य के द्वार खोल देता है।
घोर दरिद्रता, आर्थिक संकट और कर्ज के बोझ से मुक्ति दिलाने के लिए सनातन परंपरा में शिव दारिद्र्य दहन स्तोत्र को अत्यंत सिद्ध और अचूक माना गया है। यह केवल धन की कमी दूर करने की स्तुति नहीं, बल्कि जीवन के हर प्रकार के दुर्भाग्य और मानसिक संताप को भस्म करने वाला एक महामंत्र है।
ध्यान श्लोक
ध्यायेन्नित्यं महेशं रजतगिरिनिभं चारुचंद्रावतंसं,
रत्नाकल्पोज्ज्वलांगं परशुमृगवराभीतिहस्तं प्रसन्नम्।
पद्मासीनं समन्तात स्तुतममरगणैर्व्याघ्रकृत्तिं वसानं,
विश्वाद्यं विश्ववंद्यं निखिलभयहरं पंचवक्त्रं त्रिनेत्रम्॥
अर्थ: जो चाँदी के पर्वत के समान कांतिमान हैं, सुंदर चंद्रमा को आभूषण के रूप में धारण करते हैं, मणियों के आभूषणों से जिनका अंग-अंग जगमगा रहा है, जिनके हाथों में फरसा, हिरण, वरद और अभय मुद्रा है, जो सदा प्रसन्नमुख हैं, कमल के आसन पर विराजमान हैं, देवता जिनकी स्तुति करते हैं, जो बाघ की छाल धारण करते हैं, जो संसार के आदि, जगत द्वारा वंदनीय, समस्त भयों को हरने वाले, पाँच मुख और तीन नेत्रों वाले हैं — उन परमेश्वर महेश का नित्य ध्यान करना चाहिए।
श्री शिव दारिद्र्य दहन स्तोत्र (संस्कृत श्लोक एवं हिंदी अर्थ)
१. विश्वेश्वराय नरकार्णव तारणाय, कर्णामृताय शशिशेखरधारणाय।कर्पूरकांतिधवलाय जटाधराय, दारिद्र्य दुख दहनाय नमः शिवाय॥
अर्थ: संपूर्ण जगत् के स्वामी, नर्क रूपी संसार-सागर से तारने वाले, कानों के लिए अमृत के समान मीठे नाम वाले, मस्तक पर चंद्रमा धारण करने वाले, कपूर के समान श्वेत कांति वाले, जटाधारी और दरिद्रता रूपी दुःखों का दहन करने वाले भगवान शिव को मेरा नमस्कार है।
२. गौरीप्रियाय रजनीशकलाधराय, कालान्तकाय भुजगाधिपकंकणाय।गंगाधराय गजराजविमर्दिनाय, दारिद्र्य दुख दहनाय नमः शिवाय॥
अर्थ: माता पार्वती के प्रिय, चंद्रमा की कलाओं को धारण करने वाले, काल (मृत्यु) का अंत करने वाले, सर्पराज को कंगन के रूप में पहनने वाले, गंगाजी को सिर पर धारण करने वाले, गजासुर का संहार करने वाले और दरिद्रता के दुःख का नाश करने वाले भगवान शिव को मेरा नमस्कार है।
३. भक्तिप्रियाय भवरोगभयापहाय, उग्राय दुर्गभवसागरतारणाय।ज्योतिर्मयाय गुणनामसुनृत्यकाय, दारिद्र्य दुख दहनाय नमः शिवाय॥
अर्थ:भक्तों से प्रेम करने वाले, संसार रूपी रोग के भय को हरने वाले, उग्र रूप वाले, अत्यंत कठिन संसार-सागर से पार लगाने वाले, ज्योतिर्मय स्वरूप वाले तथा अपने दिव्य गुणों व नामों के कारण सुंदर नृत्य करने वाले दारिद्र्यनाशक शिव को मेरा नमस्कार है।
४. चर्माम्बराय शवभस्मविलेपनाय, भालेक्षणाय मणिकुण्डल मण्डिताय।मञ्जीरपादयुगलाय जटाधराय, दारिद्र्य दुख दहनाय नमः शिवाय॥
अर्थ: बाघम्बर (चमड़ा) धारण करने वाले, शरीर पर भस्म का लेप लगाने वाले, मस्तक पर तीसरा नेत्र धारण करने वाले, मणियों के कुंडल से सुशोभित, नूपुर (घुंघरू) से सुशोभित चरणों वाले, जटाधारी और दरिद्रता रूपी दुःख को जलाने वाले भगवान शिव को मेरा नमस्कार है।
५. पञ्चाननाय फणिराजविभूषणाय, हेमांशुकाय भुवनत्रयमण्डिताय।आनन्दभूमिवरदाय तमोमयाय, दारिद्र्य दुख दहनाय नमः शिवाय॥
अर्थ: पाँच मुखों वाले, सर्पराज से अलंकृत, सुनहरे वस्त्र धारण करने वाले, तीनों लोकों को सुशोभित करने वाले, आनंदमयी भूमि और वरदान देने वाले, अज्ञान रूपी अंधकार का नाश करने वाले (या तामस स्वरूप धारण करने वाले) दारिद्र्य विनाशक शिव को मेरा नमस्कार है।
६. भानुप्रियाय भवसागरतारणाय, कालान्तकाय कमलासनपूजिताय।अध्यक्षाय सर्वजगतां सुरपूजिताय, दारिद्र्य दुख दहनाय नमः शिवाय॥
अर्थ: सूर्यदेव के प्रिय, भवसागर से उबारने वाले, यमराज का भी अंत करने वाले, ब्रह्मा जी (कमलासन) द्वारा पूजित, संपूर्ण संसार के स्वामी, देवताओं द्वारा पूजनीय और दरिद्रता के दुःख का नाश करने वाले शिव को मेरा नमस्कार है।
७. रामप्रियाय रघुनाथवरप्रदाय, नागप्रियय नरकार्णव तारणाय।पुण्येषु पुण्यभरिताय सुरार्चिताय, दारिद्र्य दुख दहनाय नमः शिवाय॥
अर्थ: भगवान श्रीराम के प्रिय, रघुनाथ जी को वरदान देने वाले, नागों के प्रेमी, नर्क रूपी सागर से तारने वाले, पुण्यों में भी परम पुण्य स्वरूप और देवताओं द्वारा अर्चित दारिद्र्य विनाशक भगवान शिव को मेरा नमस्कार है।
८. मुक्तेश्वराय फलदाय गणेश्वराय, गीताप्रियाय शशिशेखरधारणाय।विद्याधराय विषभूषणदूषणाय, दारिद्र्य दुख दहनाय नमः शिवाय॥
अर्थ: मुक्ति प्रदान करने वाले स्वामी, समस्त फलों को देने वाले, गणों के स्वामी, सामगान और गीतों से प्रसन्न होने वाले, चंद्रमा को मस्तक पर धारण करने वाले, विद्याओं के आधार, हलाहल विष को ही आभूषण बनाने वाले दारिद्र्यनाशक शिव को मेरा नमस्कार है।
फलश्रुति (पाठ का फल)
वसिष्ठेन कृतं स्तोत्रं सर्वरोगनिवारणम्। सर्वसंपत्करं शीघ्रं पुत्रपौत्रादिवर्धनम्॥त्रिसंध्यं यः पठेन्नित्यं स हि स्वर्गमवाप्नुयात्॥
अर्थ: महर्षि वसिष्ठ द्वारा रचित यह स्तोत्र समस्त रोगों का निवारण करने वाला, शीघ्र ही सभी प्रकार की धन-संपत्ति प्रदान करने वाला और पुत्र-पौत्रादि वंश की वृद्धि करने वाला है। जो मनुष्य तीनों संध्याओं (सुबह, दोपहर, शाम) में इसका नित्य पाठ करता है, वह समस्त सुखों का उपभोग कर परम पद को प्राप्त होता है।
प्रस्तुति: श्री गीतांजलि ज्योतिष केंद्र, इंदौर।

