नई दिल्ली, 23 अगस्त 2026: केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा जारी राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6 (NFHS-6), 2023-24 के हालिया आंकड़े भारत में महिला सशक्तिकरण की एक मिश्रित और जटिल तस्वीर पेश करते हैं। जहां एक ओर शिक्षा, इंटरनेट के उपयोग, बैंक खातों के संचालन और घरेलू निर्णयों में भागीदारी के मामले में भारतीय महिलाओं ने ऐतिहासिक प्रगति दर्ज की है, वहीं दूसरी ओर नकद भुगतान (रोजगार), संपत्ति के मालिकाना हक और घरेलू सुरक्षा के स्तर पर अभी भी गहरी खाइयां दिखाई देती हैं।
भारतीय महिलाओं की डिजिटल साक्षरता में भारी उछाल:
भारत में महिलाओं के बीच डिजिटल तकनीक की पहुंच बहुत तेजी से बढ़ी है। पिछले सर्वेक्षण (NFHS-5) में जहां केवल 33.3% महिलाओं ने कभी इंटरनेट का उपयोग किया था, वहीं NFHS-6 में यह आंकड़ा दोगुना होकर 64.3% पर पहुंच गया है। इसके अतिरिक्त, अपना खुद का मोबाइल फोन रखने और उसका उपयोग करने वाली महिलाओं का प्रतिशत भी 53.9% से बढ़कर 63.6% हो गया है।
भारतीय महिलाओं की वित्तीय स्वतंत्रता और बैंक खातों का उपयोग
नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे नंबर 6 के अनुसार भारत देश की 89.0% महिलाओं के पास अब अपना खुद का बैंक या बचत खाता है, जिसका वे स्वयं सक्रिय रूप से उपयोग करती हैं। यह वित्तीय समावेशन सरकारी योजनाओं के सीधे लाभ हस्तांतरण (DBT) और महिलाओं की स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता को मजबूत कर रहा है।
घरेलू निर्णयों में महिलाओं की मजबूत भागीदारी
सर्वे रिपोर्ट कहती है कि, घरेलू मामलों में महिलाओं की आवाज अब पहले से अधिक सुनी जा रही है। वर्तमान में विवाहित 89.0% महिलाएं स्वास्थ्य देखभाल, बड़ी घरेलू खरीदारी और रिश्तेदारों के घर जाने जैसे महत्वपूर्ण निर्णयों में आमतौर पर शामिल होती हैं।
घरेलू हिंसा में उल्लेखनीय गिरावट:
सुरक्षा के मोर्चे पर एक बड़ी राहत की खबर यह है कि विवाहित महिलाओं (18-49 वर्ष) के खिलाफ होने वाली जीवनसाथी (घरेलू) हिंसा 29.2% (NFHS-5) से घटकर 22.3% (NFHS-6) पर आ गई है। इसके अलावा, गर्भावस्था के दौरान शारीरिक हिंसा का सामना करने वाली महिलाओं का दर भी 3.1% से घटकर 2.7% रह गया है।
बुनियादी साक्षरता, शिक्षा और स्वास्थ्य
6 वर्ष और उससे अधिक आयु की 73.7% महिलाएं कभी न कभी स्कूल गई हैं। मतलब अंगूठा छाप नहीं है। वहीं, 10 वर्ष या उससे अधिक स्कूली शिक्षा प्राप्त करने वाली महिलाओं का अनुपात भी 41.0% से बढ़कर 46.4% हो गया है। 15-24 वर्ष की युवतियों में मासिक धर्म के दौरान सुरक्षा के स्वच्छ तरीकों (जैसे सेनेटरी पैड, कप आदि) के उपयोग का स्तर सुधरकर 79.2% पर पहुंच गया है।
बड़ी चिंता: भारतीय महिलाओं में आर्थिक स्वावलंबन और नकद कमाई का अभाव
आर्थिक मोर्चे पर महिलाएं अभी भी बहुत पीछे हैं। पिछले 12 महीनों में काम करने वाली महिलाओं में से केवल 30.8% को ही अपनी मेहनत के बदले नकद भुगतान (कैश पेमेंट) प्राप्त हुआ है। यह दर्शाता है कि अधिकांश कामकाजी महिलाएं बिना नकद वेतन वाले या पारिवारिक श्रम से जुड़े अनौपचारिक क्षेत्रों में लगी हुई हैं। मतलब वह अपनी फैमिली बिजनेस में हेल्प तो कर रही है लेकिन इसके बदले में उनको पर्सनली कोई पेमेंट नहीं मिलती। जैसे की फैमिली बिजनेस में सामान्य तौर पर बच्चों को थोड़े बहुत पैसे, अपनी मर्जी से खर्च करने के लिए दे दिए जाते हैं। इसका मतलब हुआ कि महिलाएं पैसा तो कमा रही है लेकिन अपनी कमाई को वह अपनी मर्जी से खर्च नहीं कर सकती।
घर की मालकिन लेकिन रजिस्ट्री में नाम नहीं
यद्यपि भूमि या मकान के मालिकाना हक में सुधार हुआ है, लेकिन वर्तमान में केवल 18.8% महिलाओं के पास ही अकेले या संयुक्त रूप से घर और/या जमीन का स्वामित्व है। यानी 81% से अधिक महिलाएं आज भी किसी अचल संपत्ति की मालिक नहीं हैं। मतलब वह जिस घर में रहती हैं, जिस घर को अपना घर कहती हैं, असल में उसे घर के मालिकाना हक में उनका कोई हिस्सा नहीं होता।
कुछ और चिंता की बातें
महिलाओं में इंटरनेट का उपयोग भले ही 64.3% हो गया हो, लेकिन यह पुरुषों के 80.5% के स्तर से अभी भी काफी पीछे है।
यद्यपि घरेलू हिंसा में कमी आई है, लेकिन 22.3% का आंकड़ा यह स्पष्ट करता है कि आज भी देश में लगभग हर पांचवीं विवाहित महिला शारीरिक या यौन हिंसा का शिकार हो रही है।
राजस्थान, बिहार और उत्तर प्रदेश की महिलाओं की स्थिति चिंता जनक
पूर्वोत्तर राज्य नागालैंड इस मामले में देश में सबसे आगे है, जहां 98.9% विवाहित महिलाएं घरेलू निर्णयों में भाग लेती हैं। वहीं, सिक्किम में 98.6% और केरल में 96.5% महिलाएं निर्णयों में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराती हैं। इसके विपरीत, राजस्थान (84.5%), बिहार (85.1%) और उत्तर प्रदेश (85.9%) जैसी घनी आबादी वाले राज्य राष्ट्रीय औसत (89.0%) से काफी नीचे बने हुए हैं।
रोजगार और नकद भुगतान (Work and Cash Payment)
सकारात्मक: तेलंगाना में 53.2% और आंध्र प्रदेश में 48.0% कामकाजी महिलाओं को नकद वेतन मिलता है, जो उन्हें आर्थिक रूप से स्वावलंबी बनाता है। इसके उलट, बिहार में केवल 16.5% और उत्तर प्रदेश में 21.1% महिलाओं को ही नकद भुगतान प्राप्त होता है, जो उनकी गंभीर आर्थिक निर्भरता को उजागर करता है।
3. मोबाइल फोन का निजी उपयोग (Mobile Phone Ownership)
सिक्किम में 91.6%, नागालैंड में 88.5% और केरल में 89.1% महिलाओं के पास अपना निजी फोन उपलब्ध है। लेकिन उत्तर प्रदेश में केवल 56.4%, झारखंड में 58.4% और गुजरात में 58.8% महिलाएं ही निजी मोबाइल फोन का उपयोग कर पाती हैं, जिससे उनका डिजिटल समावेशन प्रभावित हो रहा है।
4. Hygienic Menstrual Protection
सिक्किम (99.1%) और केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ (98.8%) में यह स्वच्छता दर लगभग शत-प्रतिशत के करीब है। सबसे चौंकाने वाली गिरावट उत्तर प्रदेश में देखी गई है, जहां यह स्वच्छता दर NFHS-5 के 72.9% से घटकर NFHS-6 में 69.2% पर आ गई है। इसी तरह, उत्तराखंड में भी यह दर 91.5% से गिरकर 89.8% पर सिमट गई है।
5. घरेलू हिंसा का भयावह रूप (Spousal Violence)
नागालैंड (4.0%), लद्दाख (1.9%) और सिक्किम (4.6%) ने महिलाओं के लिए बेहद सुरक्षित माहौल का प्रदर्शन किया है। इसके विपरीत, बिहार में 36.1% और तेलंगाना में 30.8% विवाहित महिलाओं को घरेलू हिंसा का सामना करना पड़ रहा है, जो बेहद चिंताजनक स्थिति है।
निष्कर्ष और नीतिगत आवश्यकताएं
NFHS-6 के परिणाम स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं कि जनधन खातों और मोबाइल क्रांति ने महिलाओं को डिजिटल और वित्तीय मंचों पर सक्रिय किया है। हालांकि, इन मंचों का वास्तविक सशक्तिकरण में बदलाव तब तक अधूरा रहेगा जब तक महिलाओं को सुरक्षित रोजगार (नकद वेतन) के अवसर नहीं मिलेंगे, संपत्ति में मालिकाना हक नहीं मिलेगा और वे अपने घरों के भीतर पूरी तरह सुरक्षित महसूस नहीं करेंगी। उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में मासिक धर्म स्वच्छता में आई गिरावट और बिहार जैसे राज्यों में अत्यधिक उच्च घरेलू हिंसा यह चेतावनी देती है कि नीति निर्माताओं को अब केवल वित्तीय समावेशन ही नहीं, बल्कि सामाजिक व्यवहार परिवर्तन और सुरक्षा पर भी विशेष ध्यान केंद्रित करना होगा।

