रद्दी कागज ने सरकारी नौकरी छीन ली: मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का लैंडमार्क जजमेंट

Updesh Awasthee
जबलपुर, 20 अगस्त 2026:
सरकारी नौकरी के लिए डॉक्यूमेंट लगते समय बहुत ध्यान रखना चाहिए। एक युवक ने सरकारी नौकरी प्राप्त करने के लिए एक ऐसा डॉक्यूमेंट लगा दिया जिसकी जरूरत ही नहीं थी। मतलब वह एक तरह से रद्दी कागज था। इस डॉक्यूमेंट के कारण उसकी नौकरी चली गई। हाई कोर्ट ऑफ़ मध्य प्रदेश ने इस मामले में लैंडमार्क जजमेंट दिया है, जो पूरे देश भर में उदाहरण बनेगा। 

क्या है पूरा मामला?

यह विवाद सतना जिले के जनपद पंचायत सोहावल के अंतर्गत आने वाली ग्राम पंचायत मेदनीपुर का है। राज्य सरकार ने राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (नरेगा) के तहत अनुबंध के आधार पर 'ग्राम रोजगार सहायकों' की भर्ती के लिए 10 नवंबर 2009 को दिशा-निर्देश जारी किए थे। इसके तहत ग्राम पंचायत मेदनीपुर ने 15 फरवरी 2010 को एक सार्वजनिक विज्ञापन जारी कर आवेदन आमंत्रित किए, जिसमें आवेदन जमा करने की अंतिम तिथि 5 मार्च 2010 निर्धारित की गई थी। 

तैयार की गई मेरिट सूची में याचिकाकर्ता शंखपाल नामदेव को पहला स्थान और प्रतिवादी नंबर 6 को दूसरा स्थान मिला था। इस मेरिट के आधार पर जनपद पंचायत सोहावल के मुख्य कार्यपालन अधिकारी (CEO) ने 28 जुलाई 2010 को शंखपाल नामदेव को नियुक्ति पत्र जारी किया और उन्होंने 30 जुलाई 2010 को अपना कार्यभार संभाल लिया। 

शिकायत और जालसाजी का खुलासा

नियुक्ति के बाद, सूची में दूसरे स्थान पर रहे प्रतिवादी नंबर 6 ने एक शिकायत दर्ज कराई। शिकायत में आरोप लगाया गया कि याचिकाकर्ता ने आवेदन जमा करने की अंतिम तिथि (5 मार्च 2010) बीत जाने के बाद अपना फॉर्म जमा किया था और ग्राम पंचायत के आवक रजिस्टर (receipt register) में हेरफेर कर पिछली तारीख यानी 4 मार्च 2010 दर्ज करवा दी गई थी। 

इस धोखाधड़ी का अकाट्य सबूत आवेदन के साथ संलग्न दस्तावेजों में ही मिल गया। ग्राम पंचायत के आवक रजिस्टर के अनुसार याचिकाकर्ता का आवेदन 4 मार्च 2010 को प्राप्त हुआ दिखाया गया था, लेकिन आवेदन के साथ संलग्न 'रेडिक्स कंप्यूटर कॉलेज' का अनुभव प्रमाणपत्र खुद 9 मार्च 2010 को जारी किया गया था। इस स्पष्ट गणितीय और कालानुक्रमिक विसंगति (chronological impossibility) के आधार पर, जनपद पंचायत के CEO ने 17 फरवरी 2011 को याचिकाकर्ता की नियुक्ति रद्द कर दी और प्रतिवादी नंबर 6 को कार्यभार संभालने का निर्देश दिया।

लंबी कानूनी लड़ाई

याचिकाकर्ता ने इस रद्दीकरण के खिलाफ कलेक्टर, सतना के समक्ष अपील दायर की, जिसे कलेक्टर ने 4 फरवरी 2012 को खारिज कर दिया। इसके बाद याचिकाकर्ता ने उच्च न्यायालय का रुख किया (W.P. No. 2978/2012)। हाईकोर्ट ने 19 जुलाई 2012 को कलेक्टर के आदेश को रद्द करते हुए मामले को वापस इस निर्देश के साथ भेजा कि वे ग्राम पंचायत के आवक रजिस्टर की प्रामाणिकता की गहन जांच करें।

हाईकोर्ट के निर्देशानुसार कलेक्टर ने विस्तृत जांच की और 15 नवंबर 2012 को दिए अपने आदेश में निष्कर्ष निकाला कि अंतिम तिथि बीत जाने के बाद याचिकाकर्ता को अनुचित लाभ पहुंचाने के लिए रजिस्टर में 4 मार्च 2010 की जाली प्रविष्टि की गई थी। इस आदेश को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता शंखपाल नामदेव ने हाईकोर्ट में वर्तमान रिट याचिका (W.P. No. 1827 of 2013) दायर की थी। 

याचिकाकर्ता का तर्क और कोर्ट की कड़ी टिप्पणी

याचिकाकर्ता के वरिष्ठ वकील ने तर्क दिया कि कंप्यूटर अनुभव प्रमाणपत्र (रेडिक्स कॉलेज) के लिए चयन प्रक्रिया में कोई अतिरिक्त अंक नहीं दिए गए थे। उनके अनुसार, याचिकाकर्ता के पास भोज विश्वविद्यालय का वैध कंप्यूटर डिप्लोमा पहले से था, जिसके आधार पर उनकी मेरिट (89.6%) प्रतिवादी नंबर 6 (86.44%) से अधिक थी। इसलिए, यह जाली प्रमाणपत्र चयन के लिए पूरी तरह से निरर्थक (redundant) था और इसके आधार पर पूरी नियुक्ति रद्द करना अनुचित है।

माननीय न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह ने इस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि कानून का यह स्थापित सिद्धांत है कि "धोखाधड़ी सब कुछ समाप्त कर देती है" (Fraud vitiates everything)। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब आवेदन की मूल तिथि ही जाली है और आवेदन को स्वीकार करने के लिए सार्वजनिक रिकॉर्ड (रजिस्टर) में हेरफेर किया गया है, तो पूरी चयन प्रक्रिया ही दूषित हो जाती है। 

न्यायालय ने कहा कि सार्वजनिक रोजगार में धोखाधड़ी या गलत बयानी करके प्रवेश करने वाले व्यक्ति का नौकरी पर बने रहने का कोई वैधानिक अधिकार नहीं होता। उसकी बर्खास्तगी कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं, बल्कि केवल यह घोषणा है कि उसकी नियुक्ति कभी कानूनी रूप से अस्तित्व में आई ही नहीं थी। 

हाई कोर्ट का फैसला

उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि रिट कोर्ट का अधिकार क्षेत्र केवल निर्णय लेने की प्रक्रिया की वैधता की जांच करने तक सीमित है, न कि साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन करने के लिए। कोर्ट ने याचिकाकर्ता के आचरण पर टिप्पणी करते हुए कहा कि असाधारण और न्यायसंगत अधिकार क्षेत्र का लाभ उन लोगों को नहीं दिया जा सकता जो हेरफेर किए गए सार्वजनिक रिकॉर्ड के साथ अदालत आते हैं। न्यायालय ने बिना किसी खर्च (costs) के याचिका को पूरी तरह से खारिज कर दिया। 

धोखाधड़ी और जालसाजी पर हाई कोर्ट की प्रमुख टिप्पणियाँ

माननीय न्यायालय ने सार्वजनिक रोजगार में धोखाधड़ी और हेरफेर को लेकर बेहद सख्त रुख अपनाया और निम्नलिखित महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत प्रतिपादित किए:
"धोखाधड़ी सब कुछ समाप्त कर देती है" (Fraud vitiates everything): कोर्ट ने इस कानूनी सिद्धांत (Fraus et jus nunquam cohabitant) को दोहराते हुए कहा कि धोखाधड़ी जानबूझकर किया गया एक ऐसा छल है जिसका उद्देश्य अनुचित लाभ उठाना होता है।
धोखाधड़ी से प्राप्त आदेश पूरी तरह शून्य: कोर्ट या किसी प्रशासनिक संस्था के साथ धोखाधड़ी करके हासिल किया गया कोई भी निर्णय, आदेश या नियुक्ति कानून की नजर में पूरी तरह शून्य (nullity) और अस्तित्वहीन (non-est) होती है, जिसे किसी भी अदालत में कभी भी चुनौती दी जा सकती है।
सहानुभूति या इक्विटी का कोई अधिकार नहीं: जो व्यक्ति कपट या गलत बयानी के माध्यम से सार्वजनिक सेवा में प्रवेश करता है, वह अपने पक्ष में किसी भी प्रकार की सहानुभूति (equity) का दावा नहीं कर सकता। ऐसी स्थिति में सेवा से हटाया जाना कोई सजा नहीं है, बल्कि केवल इस बात की घोषणा है कि उसकी नियुक्ति कानूनन कभी अस्तित्व में आई ही नहीं थी।
"धोखाधड़ी आवश्यकता से नहीं, बल्कि छल से तय होती है": याचिकाकर्ता का यह तर्क खारिज कर दिया गया कि कंप्यूटर अनुभव प्रमाणपत्र उसकी अंतिम मेरिट के लिए जरूरी नहीं था। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि "धोखाधड़ी इस बात से नहीं आंकी जाती कि वह कितनी आवश्यक थी, बल्कि इस बात से आंकी जाती है कि उसमें कितना छल (deceit) शामिल था"।
न्याय के लिए साफ हाथ जरूरी (Clean Hands in Equity): संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट का असाधारण और विवेकाधीन क्षेत्राधिकार उन लोगों की मदद के लिए नहीं है जो स्वयं हेरफेर किए गए सार्वजनिक रिकॉर्ड लेकर अदालत आते हैं।

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