मध्य प्रदेश की सबसे ब्यूटीफुल महिला पुलिस अधिकारी के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज

Updesh Awasthee
भोपाल, 21 अगस्त 2026
: सोशल मीडिया ट्रेंड के हिसाब से मध्य प्रदेश की सबसे ब्यूटीफुल महिला पुलिस अधिकारी CSP नेहा पच्चीसिया के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज हो गया है। इससे पहले हाई कोर्ट द्वारा उनकी याचिका को खारिज कर दिया गया था। इससे पहले उनको पावरलेस और उनके ड्राइवर को सस्पेंड कर दिया गया था। 

नेहा पच्चीसिया राज्य पुलिस सेवा के खिलाफ क्या मामला दर्ज हुआ है

राज्य पुलिस सेवा की महिला अधिकारी नेहा पच्चीसिया (DSP- उप पुलिस अधीक्षक) के खिलाफ हुई शिकायतों के बाद जबलपुर रेंज की एडिशनल एसपी अनु बेनीवाल द्वारा विभागीय जांच की गई। उनकी रिपोर्ट प्रस्तुत किए जाने के बाद आपराधिक मामला दर्ज किया गया। हम यहां पर धाराएं और उनका विवरण दे रहे हैं:- 
1. धारा 61: आपराधिक षड्यंत्र (Criminal Conspiracy)
अपराध: जब दो या दो से अधिक व्यक्ति किसी अवैध कार्य को करने या करवाने के लिए सहमत होते हैं, अथवा किसी ऐसे कार्य को जो अवैध नहीं है लेकिन उसे अवैध साधनों द्वारा करने या करवाने के लिए सहमत होते हैं, तो ऐसी सहमति को 'आपराधिक षड्यंत्र' कहा जाता है।
दंड प्रावधान:
धारा 61(2)(क): यदि षड्यंत्र ऐसे गंभीर अपराध को करने के लिए है जो मृत्युदंड, आजीवन कारावास या 2 वर्ष या उससे अधिक की अवधि के कठिन कारावास से दंडनीय हो (और संहिता में उस षड्यंत्र के दंड के लिए कोई स्पष्ट उपबंध न हो), तो अपराधी को उसी प्रकार दंडित किया जाएगा मानो उसने उस अपराध का दुष्प्रेरण (Abetment) किया था। 
धारा 61(2)(ख): इसके अतिरिक्त अन्य किसी भी प्रकार के आपराधिक षड्यंत्र में शामिल होने वाले व्यक्ति को 6 महीने तक का कारावास (दोनों में से किसी भी भांति का), या जुर्माना, या दोनों से दंडित किया जा सकता है।

2. धारा 198: लोक सेवक द्वारा कानून के निर्देश की अवज्ञा (Disobedience of law by public servant)
अपराध: जब कोई लोक सेवक (Public Servant) जानते हुए कानून के किसी ऐसे निर्देश की अवज्ञा करता है जो उसके आचरण के ढंग को विनियमित करता है, और उसका आशय या ज्ञान यह हो कि इस अवज्ञा से वह किसी व्यक्ति को क्षति (Injury) पहुँचाएगा।
दंड प्रावधान: इसके लिए अपराधी को सादा कारावास, जिसकी अवधि 1 वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माना, या दोनों से दंडित किया जाता है।

3. धारा 199: जांच के दौरान लोक सेवक द्वारा निर्देश की अवज्ञा (Disobedience of direction under law)
अपराध: लोक सेवक होते हुए कानून के निर्देशों की जानते हुए निम्नलिखित रूप से अवज्ञा करना:
(क) जांच या अन्वेषण (Investigation) के उद्देश्य से किसी व्यक्ति को किसी स्थान पर उपस्थित होने के निषेध संबंधी कानूनी निर्देश की अवज्ञा करना।
(ख) जांच के तौर-तरीकों को विनियमित करने वाले कानून के निर्देशों की इस प्रकार अवज्ञा करना जिससे किसी व्यक्ति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़े।
(ग) महिलाओं व बच्चों से संबंधित गंभीर संज्ञेय अपराधों (जैसे धारा 64, 65, 66, 67, 68, 70, 71, 74, 76, 77, 79, 124, 143, 144 आदि) के संबंध में कानून के तहत दी गई किसी सूचना (FIR) को लेखबद्ध करने में असफल रहना।
दंड प्रावधान: इसके तहत दोषी पाए जाने पर लोक सेवक को कठिन कारावास, जो न्यूनतम 6 महीने और अधिकतम 2 वर्ष तक का हो सकेगा, और साथ ही जुर्माना भी भुगतना होगा। 

4. धारा 308(7): गंभीर अभियोग की धमकी देकर उद्दापन/वसूली (Extortion under threat of accusation of offense)
अपराध: किसी व्यक्ति को स्वयं उसके विरुद्ध या किसी अन्य व्यक्ति के विरुद्ध यह झूठा आरोप लगाने के भय में डालना कि उसने कोई ऐसा गंभीर अपराध किया है (या करने का प्रयत्न किया है) जो मृत्युदंड, आजीवन कारावास, या 10 वर्ष तक के कारावास से दंडनीय है; या यह धमकी देना कि उसने किसी अन्य व्यक्ति को ऐसा अपराध करने के लिए उकसाया है, और इस भय के माध्यम से उद्दापन (Extortion/वसूली) करना।
दंड प्रावधान: इसके तहत अपराधी को 10 वर्ष तक का कठिन कारावास और जुर्माना लगाया जाता है।

5. धारा 318(4): छल और बेईमानी से संपत्ति का परिदान (Cheating and dishonestly inducing delivery of property)
अपराध: किसी व्यक्ति के साथ छल (Cheating) करना और उसे बेईमानी से इस बात के लिए उत्प्रेरित (Induce) करना कि वह कोई संपत्ति किसी व्यक्ति को सौंप (परिदत्त) दे, या किसी मूल्यवान प्रतिभूति (Valuable Security) या हस्ताक्षरित/मुद्रांकित चीज को (जिसे मूल्यवान प्रतिभूति में बदला जा सके) पूर्णतः या अंशतः रचे, बदले या नष्ट करे।
दंड प्रावधान: इसके तहत अपराधी को 7 वर्ष तक का कारावास (दोनों में से किसी भी भांति का) और जुर्माना भुगतना होगा। 

डिस्क्लेमर: यह केवल एक प्राथमिक सूचना है, जो थाने में दर्ज की गई है। इसके आधार पर इन्वेस्टिगेशन किया जाएगा और यदि पुलिस इन्वेस्टिगेशन में अपराध पाया जाता है, तब न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा। इसका मतलब हुआ कि विभागीय जांच में दोषी पाए गए हैं परंतु विभागीय जांच के आधार पर जो आपराधिक मामले दर्ज किए गए हैं, इसका निर्धारण अभी शेष है।

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