छठी शताब्दी का कालखंड था, जब आर्यावर्त की पावन धरा पर नाग राजाओं का आधिपत्य था। उनकी राजधानी सरसेड़ (वर्तमान मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में स्थित) अपनी प्राकृतिक छटा और आध्यात्मिक ऊर्जा के लिए विख्यात थी। चारों ओर से विंध्य की पर्वत शृंखलाओं से घिरी यह भूमि 'शिवोऽहम्' के स्वर से गुंजायमान रहती थी।
उस समय के शासक नागराजा शांतिदेव भगवान आशुतोष के अनन्य भक्त थे। इसी काल में भगवान भोलेनाथ स्वयं धरा फाड़कर स्वयंभू रूप में प्रकट हुए। महादेव के इस विग्रह के ऊपर एक विशाल चट्टान इस प्रकार स्थित थी, मानो साक्षात् शेषनाग अपने प्रभु के ऊपर छाया कर रहे हों। यह दृश्य देखकर श्रद्धालुओं के मुख से अनायास ही फूट पड़ता था "नमामि शमीशान निर्वाण रूपं, विभुं व्यापकं ब्रह्म वेद स्वरूपम्।"
इस मंदिर की महिमा अनूठी थी। पहाड़ की गोद में पत्थरों को काटकर बनाया गया यह देवालय नाग राजाओं की अटूट श्रद्धा का केंद्र था। मंदिर के निकट ही पहाड़ पर पाँच दिव्य जल-कुण्ड निर्मित हैं। आश्चर्य की बात यह थी कि भीषण ग्रीष्म ऋतु में भी इन कुण्डों का जल कभी नहीं सूखता है, मानो स्वयं वरुण देव, महादेव के अभिषेक हेतु सदैव तत्पर रहते हों।
मंदिर के समीप ही प्रथम पूज्य भगवान गणेश का भी प्राचीन मंदिर स्थित है। वहीं एक रहस्यमयी प्राचीन गुफा भी है, नाग शासक इसी गुफा के मार्ग से सीधे अपने किले से शिव साधना हेतु मंदिर तक पहुँचते थे। समय बीतता गया, पर महादेव का चमत्कार नहीं थमा। यहाँ की वह विशाल चट्टान, जो शिवलिंग के ऊपर छत्र की तरह है, आज भी जीवंत है। प्रत्येक पाँच वर्ष में वह चट्टान एक इंच ऊपर उठ जाती है। प्राचीन समय में जहाँ भक्त केवल लेटकर ही परिक्रमा (दण्डवत) कर पाते थे, आज वहाँ इतनी जगह बन गई है कि श्रद्धालु सुगमता से बैठकर होकर पूजा-अर्चना और परिक्रमा कर सकते हैं। यह बढ़ती हुई चट्टान शिव की अनंत महिमा का प्रमाण है।
राजा शांतिदेव ने ही महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर यहाँ मेले का आयोजन प्रारंभ किया था, जहाँ शिव-पार्वती के विवाह का उत्सव अत्यंत धूमधाम से मनाया जाता था। आज भी, सदियां बीत जाने के बाद भी, सावन के महीने और महाशिवरात्रि पर यहाँ श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है।
शिवधाम सरसेड़ आज भी उन नाग राजाओं के धर्म और अटूट विश्वास का प्रतीक बना हुआ है, जहाँ पत्थरों में इतिहास बोलता है और कण-कण में शंकर का वास है।
उद्घोष: यह कथा लोकश्रुतियों पर आधारित है।

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