भोपाल, 11 अगस्त 2026: जीतू पटवारी, कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए एक अपरिपक्व व्यक्ति हैं एवं राहुल गांधी की कृपा के कारण इस पद पर हैं। जो अपनी विधानसभा का चुनाव नहीं जीत सका, वह कांग्रेस पार्टी को मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव कैसे जितवा सकता है? इस तरह की बातें कई लोग करते हैं। इन दागों की सत्यता तो 2028 में ही प्रमाणित हो पाएगी लेकिन दतिया चुनाव में जीतू पटवारी ने अपना पोटेंशियल जरूर साबित किया है।
जीतू पटवारी चतुर चुनावी रणनीतिकार
दतिया चुनाव में जीतू पटवारी ने साबित किया है कि वह एक चतुर, चुनावी रणनीतिकार हैं। दतिया में जिस तरह की नुक्कड़ स्वभाव और बड़ी सभाओं का आयोजन किया गया, जीतू पटवारी ने जिस प्रकार से मालवा की मिठास और दतिया के दबंग स्वभाव को ध्यान में रखते हुए भाषण दिए। विरोधी प्रत्याशी को अपने मंच पर आमंत्रित किया और कलेक्टर एसपी को मंच से चेतावनी देकर अपने कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाया। यह सब कुछ प्रमाणित करता है कि जीतू पटवारी ने चुनाव के दौरान केवल दतिया में कैंप नहीं किया बल्कि प्रत्याशी के चारों तरफ एक सुरक्षित घेरा बनाते हुए, प्रदेश अध्यक्ष पद का कर्तव्य निर्वाह किया है।
जीतू पटवारी ना होते तो क्या घनश्याम सिंह हार जाते?
वैसे तो यह काल्पनिक प्रश्न है लेकिन राजनीति में कल्पना, संभावना और समीक्षा को बड़ा महत्व दिया जाता है। इसमें कोई दो राय नहीं की घनश्याम सिंह की इमेज भाजपा प्रत्याशी की तुलना में काफी अच्छी थी, लेकिन दतिया में उपचुनाव था। उपचुनाव में ज्यादातर सरकारी पक्ष का पलड़ा भारी होता है। दतिया में भी ऐसा ही देखने को मिला। निर्वाचन आयोग की रिपोर्ट के अनुसार घनश्याम सिंह 6000 वोटो से चुनाव जीते हैं लेकिन लोकल सर्वे रिपोर्ट बताती है कि, कांग्रेस पार्टी को इस बार 20000 ऐसे वोट नहीं मिले, जो पिछले चुनाव में मिले थे। इस हिसाब से घनश्याम सिंह चुनाव हार जाने वाले थे लेकिन एक सही रणनीति के तहत चुनाव प्रचार के कारण कांग्रेस को यहां पर 26000 ऐसे वोट मिले जो पिछले चुनाव में नहीं मिले थे। यह दावा नहीं किया जा सकता कि नए वोट जीतू पटवारी अथवा घनश्याम सिंह का चेहरा देखकर मिले, लेकिन यह पक्का कहा जा सकता है कि, दतिया में जो कुछ हुआ यदि वह नहीं होता तो यह भी नहीं होता।
क्या दतिया चुनाव की जीत का क्रेडिट केवल जीतू पटवारी को मिलना चाहिए
प्रदेश अध्यक्ष होने के नाते हां बिल्कुल मिलना चाहिए लेकिन यहां उल्लेख करना जरूरी है की पहली बार मध्य प्रदेश में, दतिया चुनाव के दौरान ऐसा देखने को मिला जो अब से पहले कभी नहीं देखने को मिला। सामान्य तौर पर कांग्रेस पार्टी के नेता चुनाव लड़ते हैं। पहली बार दतिया में कांग्रेस पार्टी चुनाव लड़ रही थी। जीतू पटवारी ने जितने भी बाहरी नेताओं की ड्यूटी दतिया में लगाई, उन सबने अपना 100% दिया है। मतलब ऐसा लग रहा था जैसे भारतीय जनता पार्टी चुनाव लड़ रही है, उसका चुनाव चिन्ह बदल गया है। संगठन पूरा एक साथ दिखाई दे रहा था। प्रदेश अध्यक्ष और प्रत्याशी से लेकर छोटे कार्यकर्ता तक, सब एक दूसरे से घुले मिले थे। पहली बार कोई दरार दिखाई नहीं दी। हालांकि टिकट का फैसला सामूहिक सहमति से नहीं हुआ था लेकिन फिर भी नेताओं के बीच को रार दिखाई नहीं दी।
राजेंद्र भारती के बारे में क्या कहेंगे
कांग्रेस पार्टी ने उनको निष्कासित कर दिया है। प्रत्याशी ने उनके खिलाफ गंभीर आरोप लगाए थे और शायद कोई सबूत भी पेश किया था, लेकिन लोकल की रिपोर्ट कुछ और कहती है। दतिया में लोगों का मानना था कि जो व्यक्ति अपना कोर्ट केस 5 साल लंबा नहीं खींच पाया, उसकी राजनीति का पहलवान कैसे मान लें। जो खुद नहीं बच पाया वह हमको क्या बचाएगा। जो अपने बच्चों के लिए टिकट नहीं दिलवा पाया, वह हमारे बच्चे को रोजगार क्या दिलवाएगा। कुल मिलाकर दतिया में घनश्याम सिंह को टिकट मिलते ही, राजेंद्र भारती के वर्डस की वैल्यू खत्म हो गई थी। इसके बाद उन्होंने कुछ भी किया, उसका ना कोई फायदा हुआ ना नुकसान।

.webp)