महाबली रावण के जीवन से सम्बन्धित अनेक रोचक कथाएँ हमें पढ़ने के लिए प्राप्त होती रहती हैं। एक ऐसी ही रोचक कथा महर्षि वाल्मीकि कृत रामायण के उत्तरकाण्ड के अठारहवें सर्ग में पढ़ने को प्राप्त होती है।
एक बार, वेदवती ने जब अग्रि में प्रवेश कर लिया तो रावण पृथ्वी पर आया। यहाँ आने के लिए उसने पुष्पक विमान का उपयोग किया। वह उशीरबीज नामक देश में आया। उसने वहाँ देखा कि राजा मरुत्त देवताओं के साथ बैठकर यज्ञ कर रहे थे। यज्ञ कराने में प्रमुख भूमिका बृहस्पति के भाई, धर्म के ज्ञाता ब्रह्मर्षि संवर्त निभा रहे थे। वहाँ सम्पूर्ण देवता भी उपस्थित थे-
संवर्तो नाम ब्रह्मर्षि साक्षाद् भ्राता बृहस्पते:।
याजयामास धर्मज्ञ: सर्वैर्देवगणैवृत्त:।।३।।
(वाल्मीकि रामायण, उत्तरकाण्ड, सर्ग १८-३)
राक्षस रावण को जीतना कठिन था क्योंकि उसे ब्रह्मा का वरदान प्राप्त था, अत: सभी देवता भयभीत हो गये और सभी ने तिर्यग योनि में प्रवेश कर लिया। इन्द्र मोर बने, धर्मराज कौआ बने और कुबेर गिरगिट हो गये तथा वरुण ने हंस का रूप धारण कर लिया-
इन्द्रो मयूर: संवृत्तो धर्मराजस्तु वायस:।
कृकलासो धनाध्याक्षो हंसञ्च वरुणोऽभवत्।।५।।
(वाल्मीकिरामायण उत्तरकाण्ड सर्ग १८-५)
हे राम! सुनो इस प्रकार कई देवताओं ने अलग-अलग रूप धारण कर लिया। रावण का प्रवेश यज्ञ मंडप में ऐसा था जैसे कोई अपवित्र श्वान, यज्ञ स्थान में प्रवेश कर रहा हो। वहाँ पहुँचकर रावण ने राजा मरुत्त से कहा कि तुम मेरे साथ युद्ध करो या अपनी पराजय स्वीकार कर लो। यह बात सुनकर मरुत्त ने रावण से उसका परिचय पूछा तो उसने अपने आपको कुबेर का छोटा भाई निरुपित किया। रावण को आश्चर्य हुआ कि उसका नाम सुनकर भी मरुत्त को कोई भय नहीं हुआ। इसलिए रावण मरुत्त के व्यवहार से प्रसन्न हो गया। रावण बड़े गर्व से कहता है उसने अपने बड़े भाई कुबेर को रणभूमि में पराजित करके उससे पुष्पक विमान छीन लिया है। मरुत्त कहते हैं कि वास्तव में आप धन्य हैं, जो बड़े भाई से युद्ध कर उन्हें पराजित कर दिया। उनका विमान भी अधिकारपूर्वक ले लिया। तीनों लोकों में तुम जैसा पुरुष नहीं है। तुम्हारे जैसा कार्य करने वाले मैंने कभी नहीं देखे हैं। तुम बुद्धिहीन हो और यहाँ से जीवित नहीं जा सकते हो। मैं अपनी तीक्ष्ण बाणों से तुम्हें यमलोक पहुँचा दूँगा।
श्रुतपूर्वं हि न मया भाषसे यादृशं स्वयम्।
तिष्ठेदानीं न मे जीवन प्रति यास्यसि दुर्मते।।९।।
(वाल्मीकिरामायण-उत्तरकाण्ड सर्ग १८-३ १/२)
राजा मरुत्त धनुष बाण लेकर युद्ध करने के लिये रवाना हुए तो महर्षि संवर्तन ने उनका मार्ग रोक लिया। महर्षि संवर्तन ने मरुत्त को समझाते हुए कहा कि इस समय उससे युद्ध करना उचित नहीं है। माहेश्वर यज्ञ जो इस समय चल रहा है, इसे पूर्ण करना आवश्यक है। यज्ञ में दीक्षित पुरुष क्रोध नहीं कर सकते हैं। वह राक्षस दुर्जेय है और युद्ध में किसकी विजय होगी यह बात भी संदिग्ध है। मरुत्त ने धनुष बाण त्याग दिये और यज्ञ कार्य सम्पन्न करने के लिए चल दिये।
शुक ने मरुत्त को पराजित मान कर यह स्वीकार कर लिया कि रावण विजयी हो गया है। उसने हर्ष में सिंहनाद कर दिया। रावण ने युद्ध में पधारे हुए महर्षियों का भक्षण कर लिया और सहर्ष पृथ्वी पर घूमने लगा-
तान् भक्षयित्वा तत्रस्थान् महर्षीन यज्ञमागतान्।
पितृप्तो रुधिरैस्तेषां पुन: सम्प्रययौ महीम्।।२०।।
(वाल्मीकि रामायण उत्तरकाण्ड सर्ग १८/२०)
जब रावण वहाँ से चला गया तो सभी देवता अपने स्वरूप में प्रकट हो गये। मोर बनने वाले इन्द्र ने मोर से कहा तुम सर्प से भयमुक्त हो गये हो। तुम्हारे पंख बहुत सुन्दर होंगे। मेरे सहस्र नेत्र इनको सुन्दर बना देंगे। जब वर्षा होगी तो तुम्हारी प्रसन्नता बढ़ जाएगी। कहा जाता है कि इन्द्र के इस वरदान के पूर्व मोर के पंख केवल नीले रंग के थे।
यमराज, कौआ बने बैठे थे। तब धर्मराज ने उससे कहा कि तुम्हें मृत्यु का भय नहीं होगा। मनुष्य आदि कोई भी प्राणी तुम्हारा वध नहीं करेंगे। यमलोक में आये हुए मानव जो भूख से पीड़ित हैं, उनके वंशज पृथ्वी पर तुम्हें भोजन कराएंगे तब तुम्हें तृप्ति प्राप्त होगी।
वरुण ने भी हंस को कहा तुम्हारे शरीर का रंग चन्द्रमंडल के समान शुभ्र फेन के समान सुन्दर होगा। जल का आश्रय लेकर तुम अनुपम रूप से प्रसन्न रहोगे। यही मेरा वरदान है। पूर्व में हंस के पंख का अग्रभाग नीला था। वरदान के पश्चात् वह एकदम शुभ्र हो गया।
इसके पश्चात् कुबेर ने गिरगिट को वरदान दिया। उन्होंने गिरगिट को सुवर्ण के समान सुन्दर रंग दिया। पूर्व में गिरगिट का रंग काला था। वरदान के पश्चात् वह सुनहरे रंग में परिवर्तित हो गया।
सभी पशु-पक्षियों को आशीर्वाद देकर सभी देवता यज्ञ को सम्पूर्ण कर राजा मरुत्त के साथ अपने स्वर्ग लोक को चले गए।
एवं दत्त्वा वरांस्तेभ्यस्तस्मिन् यज्ञोत्सवे सुरा:।
निवृत्ते सह राज्ञा ते पुन: स्वभवनं गता:।।
(वाल्मीकिरामायण उत्तर काण्ड सर्ग १८-३६)
इस प्रकार वरदान देकर वे देवता यज्ञोत्सव के समापन के पश्चात् सभी अपने-अपने भवनों में पधार गए।
लेखक: डॉ. नरेन्द्रकुमार मेहता
मानसश्री, मानस शिरोमणि, विद्यावाचस्पति एवं विद्यासागर
उज्जैन, मो. ९४२४५६०११५

