हाई कोर्ट ने पुलिस अधीक्षक की कानूनी समझ पर सवाल उठाया, BNS की धारा 111 का मामला

Updesh Awasthee
जबलपुर, 1 अगस्त 2026:
भारतीय न्याय संहिता की धारा 111 के उपयोग के मामले में हाई कोर्ट आफ मध्य प्रदेश द्वारा बुरहानपुर के तत्कालीन पुलिस अधीक्षक श्री देवेंद्र पाटीदार की कानूनी समझ पर नेगेटिव टिप्पणी करते हुए, एक मामले में भारतीय न्याय संहिता की धारा 111 लगाने को कानूनन गलत बताया और इसके कारण जेल में बंद एक युवक को जमानत दे दी। 

BNS की धारा 111 कब लगा सकते हैं: हाई कोर्ट का लैंडमार्क जजमेंट

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने हाल ही में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की नई और गंभीर धारा 111 (संगठित अपराध) के उपयोग को लेकर एक महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है। न्यायमूर्ति रामकुमार चौबे की एकल पीठ ने बुरहानपुर के एक चर्चित मामले में आरोपी तन्मय को जमानत देते हुए स्पष्ट किया कि केवल आपराधिक रिकॉर्ड (Criminal Antecedents) के आधार पर किसी व्यक्ति पर संगठित अपराध की धाराएं नहीं थोपी जा सकतीं।

घटना का विवरण
कहानी की शुरुआत 20 नवंबर 2025 को दोपहर करीब 1:30 बजे होती है। शिकायतकर्ता सचिन अपने दोस्त वेदांत बागे के साथ मोटरसाइकिल से बुरहानपुर के सागर टावर, टेंपो स्टैंड के पास से गुजर रहा था। अभियोजन के अनुसार, वहां पहले से घात लगाए बैठे तन्मय, उसके साथियों मुज्जू उर्फ माया और चेतन ने उन्हें बीच रास्ते में रोक लिया। विवाद बढ़ा और हमलावरों ने सचिन के साथ मारपीट शुरू कर दी। इसी गहमागहमी के बीच, सह-आरोपी चेतन ने अपने पास रखी देसी पिस्टल से सचिन पर फायर कर दिया। गोली सचिन के पेट के बाईं ओर लगी, जिससे वह गंभीर रूप से घायल हो गया। उसे तुरंत जिला अस्पताल, बुरहानपुर में भर्ती कराया गया, जहां 22 नवंबर 2025 को पुलिस ने उसकी शिकायत पर 'देहाती नालिश' दर्ज की।

कानूनी धाराओं का जाल और पुलिस की कार्रवाई

शुरुआत में पुलिस ने अपराध क्रमांक 322/2025 के तहत भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की निम्नलिखित धाराओं में मामला दर्ज किया:
  • धारा 109(1): उकसाना (Abetment)।
  • धारा 115(2): स्वेच्छा से गंभीर चोट पहुंचाना।
  • धारा 3(5): सामान्य इरादा (Common Intention)।
  • आर्म्स एक्ट की धारा 25 और 27: अवैध हथियार का उपयोग।
लेकिन कहानी में मोड़ तब आया जब 2 दिसंबर 2025 को पुलिस अधीक्षक (SP) बुरहानपुर ने एक आदेश जारी कर मामले में BNS की धारा 111 (संगठित अपराध) जोड़ने की अनुमति दे दी। पुलिस का तर्क था कि आरोपियों का पुराना आपराधिक रिकॉर्ड है, इसलिए वे एक संगठित गिरोह की तरह काम कर रहे हैं। इसी मामले में आरोपी तन्मय 15 दिसंबर 2025 से जेल में बंद था।

अदालत में दलीलें: जब गवाह ही मुकर गया

तन्मय की ओर से पैरवी करते हुए अधिवक्ता श्री रवीनंदन द्विवेदी ने दलील दी कि तन्मय पूरी तरह निर्दोष है। उन्होंने कोर्ट को बताया कि: गोली चलाने का मुख्य आरोप चेतन पर है, जबकि तन्मय के पास कोई हथियार नहीं था। सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि ट्रायल कोर्ट में गवाही के दौरान शिकायतकर्ता सचिन (PW-1) ने अभियोजन का साथ नहीं दिया और वह 'होस्टाइल' (पक्षद्रोही) हो गया। उसने तन्मय के खिलाफ कुछ भी नहीं कहा।

सह-आरोपी चेतन, जिस पर गोली चलाने का आरोप था, उसे हाई कोर्ट पहले ही जमानत दे चुका था। वहीँ सरकारी वकील श्री रवींद्र राजपूत ने जमानत का विरोध करते हुए कहा कि आरोपियों ने पिछले 10 वर्षों में एक से अधिक अपराध किए हैं, इसलिए धारा 111 के तहत कार्रवाई जायज है।

हाई कोर्ट की अहम टिप्पणी: संगठित अपराध क्या है?

न्यायमूर्ति रामकुमार चौबे ने अपने 16 पन्नों के आदेश में BNS की धारा 111 की विस्तृत व्याख्या की। कोर्ट ने कहा कि किसी भी व्यक्ति को 'संगठित अपराधी' घोषित करने के लिए केवल पिछले केसों की लिस्ट काफी नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि धारा 111 (संगठित अपराध) के लिए आवश्यक शर्तें क्या हैं:
Continuing Unlawful Activity: पिछले 10 वर्षों में कम से कम दो ऐसी चार्जशीट दाखिल हुई हों जिन पर अदालत ने संज्ञान लिया हो।
सिंडिकेट का होना: दो या दो से अधिक व्यक्तियों का समूह जो आर्थिक या अन्य भौतिक लाभ के लिए हिंसा या धमकी का उपयोग करे। 

Devendra Patidar IPS ने क्राइम रिकॉर्ड देखकर धारा 111 लगा दी: हाई कोर्ट

कोर्ट ने पाया कि इस मामले में SP बुरहानपुर का आदेश केवल पुराने रिकॉर्ड पर आधारित था, लेकिन यह साबित करने के लिए कोई पुख्ता सबूत नहीं था कि यह हमला किसी 'क्राइम सिंडिकेट' का हिस्सा था या इसका उद्देश्य कोई आर्थिक लाभ प्राप्त करना था। कोर्ट ने चिंता जताते हुए कहा कि कई मामलों में पुलिस बिना गहराई से जांच किए बिना, केवल पुराने रिकॉर्ड देखकर धारा 111 लगा रही है, जो कानूनन सही नहीं है।

अंतिम फैसला
अदालत ने मामले की परिस्थितियों, शिकायतकर्ता के मुकरने और तन्मय की हिरासत अवधि (7 महीने से अधिक) को देखते हुए उसे जमानत देने का आदेश दिया।

आदेश की मुख्य बातें:
तन्मय को 50,000 रुपये के निजी मुचलके और इतनी ही राशि की जमानत पर रिहा किया जाए। उसे भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 480(3) के तहत निर्धारित सभी शर्तों का पालन करना होगा। यह आदेश न केवल तन्मय के लिए राहत लेकर आया, बल्कि पुलिस प्रशासन के लिए भी एक सबक है कि नए कानूनों (BNS) की गंभीर धाराओं का प्रयोग पूरी सावधानी और कानूनी मापदंडों को पूरा करने के बाद ही किया जाना चाहिए।

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