क्रिमिनल केस में आरोपी को जमानत का और पुलिस को रिमांड का अधिकार: Section 187 – Police custody / remand

Updesh Awasthee
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 में धारा 187 के तहत बाद ही अच्छा प्रावधान किया गया है। एक तरफ पुलिस को रिमांड का अधिकार बढ़ा दिया गया है। पुलिस अधिकारी चाहे तो रिमांड की अवधि को अपने हिसाब से कस्टमाइज कर सकते हैं। वहीं दूसरी ओर आरोपी का अधिकार दिया है कि यदि पुलिस ने निश्चित टाइम लिमिट के भीतर जांच पूरी नहीं की तो आरोपी को ऑटोमेटेकली जमानत मिल जाएगी। फिर पुलिस, आरोपी की जमानत का विरोध नहीं कर सकती।

Section 187 of the Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita (BNSS), 2023

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 187 उस प्रक्रिया से संबंधित है जब पुलिस द्वारा किसी सीरियस क्रीम का इन्वेस्टिगेशन (अन्वेषण - जिसे सामान्य भाषा में जांच कहते हैं) 24 घंटे के भीतर पूरा नहीं किया जा सकता है। यह धारा पूर्ववर्ती CrPC की धारा 167 का स्थान लेती है और इसमें पुलिस हिरासत (Police Custody) के संबंध में महत्वपूर्ण परिवर्तन किए गए हैं। BNSS की धारा 187 के मुख्य प्रावधान निम्नलिखित हैं:

1. 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के समक्ष पेशी
यदि किसी व्यक्ति को गिरफ्तार किया गया है और पुलिस जांच 24 घंटे के भीतर पूरी नहीं हो पाती है, तो पुलिस अधिकारी को उस व्यक्ति को निकटतम न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करना अनिवार्य है।
2. मजिस्ट्रेट द्वारा अभिरक्षा (Remand) की शक्ति
जब अभियुक्त को मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया जाता है, तो मजिस्ट्रेट उसे आगे की हिरासत में रखने के लिए अधिकृत कर सकता है। हिरासत दो प्रकार की हो सकती है:
  • पुलिस अभिरक्षा (Police Custody)
  • न्यायिक अभिरक्षा (Judicial Custody)
3. पुलिस हिरासत की अवधि में बड़ा बदलाव
BNSS की धारा 187 के तहत पुलिस हिरासत के नियमों में एक बड़ा बदलाव किया गया है:
मजिस्ट्रेट अधिकतम 15 दिनों तक की पुलिस हिरासत की अनुमति दे सकता है।
महत्वपूर्ण बदलाव: पहले पुलिस हिरासत केवल गिरफ्तारी के शुरुआती 15 दिनों के भीतर ही ली जा सकती थी। लेकिन धारा 187(2) के तहत प्रावधान किया गया है कि, अब यह 15 दिनों की पुलिस हिरासत (पुलिस रिमांड) कुल 40 दिनों या 60 दिनों की अवधि के दौरान कभी भी (एक बार में या टुकड़ों में) ली जा सकती है।

4. Default Bail और अधिकतम अवधि

यदि पुलिस निर्धारित समय सीमा के भीतर जांच पूरी करके आरोप पत्र (Charge Sheet) दाखिल नहीं करती है, तो अभियुक्त 'डिफॉल्ट बेल' का हकदार हो जाता है। जांच पूरी करने की अधिकतम अवधि इस प्रकार है:
  • 90 दिन: उन अपराधों के लिए जिनकी सजा मृत्युदंड, आजीवन कारावास या कम से कम 10 वर्ष का कारावास है।
  • 60 दिन: अन्य सभी अपराधों के मामले में।
यदि यह अवधि बीत जाती है और अभियुक्त जमानत देने के लिए तैयार है, तो उसे जमानत पर रिहा कर दिया जाएगा। 
इसका मतलब हुआ कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के तहत यह प्रावधान कर दिया गया है कि, गिरफ्तार किए गए हर व्यक्ति को एक निर्धारित अवधि के बाद जमानत का अधिकार प्राप्त हो जाएगा। उसको अनिश्चितकाल के लिए जेल में बंद नहीं रखा जा सकता है। 

5. अभियुक्त की उपस्थिति
मजिस्ट्रेट अभियुक्त की पुलिस अभिरक्षा तभी मंजूर करेगा जब उसे व्यक्तिगत रूप से (Physically) मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाए।
न्यायिक अभिरक्षा के विस्तार के लिए अभियुक्त को व्यक्तिगत रूप से या वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पेश किया जा सकता है।
6. विशेष मजिस्ट्रेट का अधिकार
यदि कोई न्यायिक मजिस्ट्रेट उपलब्ध नहीं है, तो अभियुक्त को कार्यकारी मजिस्ट्रेट (Executive Magistrate) के पास ले जाया जा सकता है, जिसे अधिकतम 7 दिनों तक की हिरासत देने का अधिकार है।
7. केस डायरी का प्रेषण (Transmission of Case Diary)
धारा 187(1) के अनुसार, जब पुलिस किसी अभियुक्त को मजिस्ट्रेट के सामने पेश करती है, तो उसे उस समय तक मामले के संबंध में केस डायरी (Case Diary) में दर्ज प्रविष्टियों की एक प्रति भी मजिस्ट्रेट को भेजनी अनिवार्य है। यह प्रावधान, मजिस्ट्रेट को यह तय करने में मदद करता है कि हिरासत आवश्यक है या नहीं।
8. क्षेत्राधिकार न होने पर भी शक्ति (Jurisdiction)
यदि अभियुक्त को ऐसे मजिस्ट्रेट के पास ले जाया जाता है जिसके पास उस मामले के विचारण (trial) का क्षेत्राधिकार (Jurisdiction) नहीं है, तो भी वह मजिस्ट्रेट धारा 187 के तहत अभियुक्त को अधिकतम 15 दिनों तक की हिरासत में रखने का आदेश दे सकता है। यदि उसे लगता है कि आगे की हिरासत की आवश्यकता नहीं है, तो वह अभियुक्त को उस मजिस्ट्रेट के पास भेजने का आदेश देगा जिसके पास क्षेत्राधिकार है।
9. पुलिस हिरासत (PC) के समय की सीमा
मैंने पिछले उत्तर में बताया था कि 15 दिनों की पुलिस हिरासत को टुकड़ों में लिया जा सकता है। इसमें एक महत्वपूर्ण बारीकी यह है:
  • 90 दिनों वाली अवधि के मामलों में: यह 15 दिनों की पुलिस हिरासत शुरुआती 40 दिनों के भीतर कभी भी ली जा सकती है।
  • 60 दिनों वाली अवधि के मामलों में: यह 15 दिनों की पुलिस हिरासत पूरे 60 दिनों की अवधि के दौरान कभी भी ली जा सकती है।
10. शारीरिक उपस्थिति बनाम वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (Presence vs Video Link)
पुलिस अभिरक्षा (Police Custody) के लिए अभियुक्त की भौतिक उपस्थिति (Physical Production) अनिवार्य है।
न्यायिक अभिरक्षा (Judicial Custody) के विस्तार के लिए अभियुक्त को मजिस्ट्रेट के सामने वीडियो लिंक (Electronic Video Linkage) के माध्यम से पेश किया जा सकता है।
11. आदेश के कारणों का लेखन (Recording Reasons)
धारा 187 के तहत हिरासत अधिकृत करने वाले प्रत्येक मजिस्ट्रेट के लिए यह कानूनी रूप से अनिवार्य है कि वह ऐसा करने के कारणों को लिखित रूप में दर्ज करे। यदि कोई मजिस्ट्रेट (जैसे कि द्वितीय श्रेणी मजिस्ट्रेट) जिसे उच्च न्यायालय द्वारा विशेष अधिकार प्राप्त नहीं हैं, वह हिरासत का आदेश देता है, तो उसे अपने आदेश की प्रति मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) को भेजनी होगी।
12. कार्यकारी मजिस्ट्रेट की भूमिका (Executive Magistrate)
यदि न्यायिक मजिस्ट्रेट उपलब्ध नहीं है, तो अभियुक्त को कार्यकारी मजिस्ट्रेट के पास ले जाया जा सकता है। कार्यकारी मजिस्ट्रेट अधिकतम 7 दिनों तक की हिरासत (चाहे वह पुलिस हो या न्यायिक) अधिकृत कर सकता है। इसके बाद अभियुक्त को न्यायिक मजिस्ट्रेट के पास स्थानांतरित किया जाना चाहिए।

निष्कर्ष: संक्षेप में, धारा 187 केवल हिरासत की अवधि ही नहीं बताती, बल्कि पारदर्शिता (कारणों का रिकॉर्ड), निगरानी (केस डायरी) और अभियुक्त के अधिकारों (भौतिक उपस्थिति) को भी सुनिश्चित करती है।
लेखक: उपदेश अवस्थी (विधि सलाहकार एवं पत्रकार)।

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