दतिया उपचुनाव में भाजपा की हार के 25 कारण

Updesh Awasthee
भोपाल समाचार, 3 अगस्त 2026:
राजनीति के बुजुर्ग कहते हैं कि चुनाव में हर या जीत का कोई एक कारण नहीं होता, 25 कारण होते हैं। तो चलिए दतिया उपचुनाव में भारतीय जनता पार्टी की हार के 25 कारण गिनते हैं। देखते हैं पब्लिक क्या बोल रही है और राजनीति के धुरंधर क्या निष्कर्ष निकाल रहे हैं:- 

धर्मेंद्र प्रधान के लिए लड़के-लड़कियों पर लाठी चार्ज का असर 

दतिया में Gen Z आगे ग्रुप के बच्चों को लड़का-लड़की कहा जाता है। वह दिल्ली में प्रदर्शन कर रहे थे और इसका दतिया पर कोई असर नहीं था लेकिन जब बच्चों पर लाठी चार्ज हुआ, आंसू गैस के गले फोड़े गए और बाद में पता चला कि किसी बंदूक से फायरिंग भी हुई थी, तो इसका असर दतिया में भी दिखाई दिया। होनहार अभ्यर्थियों के पेरेंट्स की कोई पार्टी नहीं होती। उनका बच्चा ही उनकी पार्टी होता है। जब उन्होंने देखा कि पेपर लीक के मामले में सरकार गलती नहीं मान रही और लाठी मार रही है, तो बात बदल गई। 2 लाख में से मात्र 5 हजार मतदाता इस बात से प्रभावित हुए लेकिन दतिया के चुनाव में यह संख्या बड़ी है क्योंकि जीत हार का अंतर सिर्फ 6000 है। 

दतिया में पब्लिक ने E20 का जवाब दिया है

दतिया के उपचुनाव में E20 फैक्टर भी काम कर रहा था। केंद्रीय मंत्री श्री नितिन गडकरी मीडिया के सामने कितनी भी चतुराई पूर्ण बात कर लें लेकिन पब्लिक के बीच में एक नॉरेटिव सेट हो गया है। पब्लिक ने एथेनॉल के लिए श्री नितिन गडकरी को ही बयान देते हुए सुना है। उनको नहीं पता कि पेट्रोलियम मंत्री कौन है, उनको सिर्फ इतना पता है कि भारत में एथेनॉल के प्रमोटर श्री नितिन गडकरी हैं। E20 मोटर वाहनों के लिए कितना सही है और कितना गलत, पब्लिक को यह तो नहीं पता लेकिन जब भी चलती गाड़ी कोई झटका खाती है, सुबह स्टार्ट नहीं होती, जल्दी सर्विस मांगने लगती हैं, या इंजन में कुछ भी होता है तो इसके लिए लोग E20 को ही जिम्मेदार मानते हैं। सोशल मीडिया पर वीडियो अपलोड करने वालों को नोटिस दिया जा सकता है लेकिन यदि जनता चुनाव में निगेटिव वोटिंग करेगी तो...? पॉलिटिकल गॉसिप है कि E20 के कारण 10000 के आसपास वोट प्रभावित हुए हैं। मानना है तो मानो नहीं तो अगले चुनाव में देख लेंगे। 

थोपा गया प्रत्याशी भाजपा कार्यकर्ता ना तो पहले स्वीकार करते थे और ना अब

भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता एवं बिना कोई पद लिए हमेशा महत्वपूर्ण बन रहे, श्री हरिहर निवास शर्मा कहते हैं कि, शिवपुरी विधानसभा में जब यशोधरा जी, लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए ग्वालियर चली गई और शिवपुरी में उपचुनाव हुए। तभी प्रत्याशी चयन कुछ इसी प्रकार से हुआ था। सरकार ने पूरी ताकत लगा दी थी लेकिन कांग्रेस के प्रत्याशी की जीत हुई थी। निष्कर्ष यह की थोपा गया प्रत्याशी भाजपा के कार्यकर्ता ना तो पहले स्वीकार करते थे और ना अब स्वीकार करते हैं। सर्व मान्य तथ्य है कि जीत तभी होती है, जब कार्यकर्ता पूरे मन से भिड़े। 

मामा को स्टार प्रचारक नंबर वन बनाते तो जीत जाते?

मध्य प्रदेश के आकांक्षी मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान की PR Team का अपना संगीत बज रहा है। सोशल मीडिया पर बताया जा रहा है दतिया के बसई में पूर्व मुख्यमंत्री व मामा जी शिवराज सिंह चौहान जी की एक चुनावी सभा ने परिणाम को चौकाने लाईक कर दिया था! बसई क्षेत्र में 17254 मत डले जिनमें भाजपा को 10078 बोट मिले! इसका मतलब हुआ कि यदि दतिया के विधानसभा उपचुनाव में मामा को स्टार प्रचारक नंबर वन बनाने, पूरी दतिया में घुमाते तो भाजपा की ऐतिहासिक जीत होती। जबकि दूसरा एंगल यह है कि, बसई लोधी बेल्ट है। कैबिनेट मंत्री प्रहलाद सिंह और पिछोर के विधायक प्रीतम सिंह लोधी का इस क्षेत्र में व्यक्तिगत प्रभाव है। शिवराज सिंह की सभा में दोनों शामिल थे। सभा के बाद और वोटिंग तक, यहां लोधी वाद चला।

नरोत्तम मिश्रा के समर्थकों ने साथ नहीं दिया 

आंकड़े बताते हैं कि, दतिया में नरोत्तम मिश्रा और उनके नजदीकी लोगों के पोलिंग बूथ से भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशी चुनाव हार गए। यह बात अपने आप में प्रमाण की तरह प्रस्तुत की जा रही है। नरोत्तम मिश्रा चुनाव प्रचार तो कर रहे थे परंतु भाजपा के प्रत्याशी के लिए वोट नहीं मांग रहे थे। औपचारिक प्रचार करना एक बात होती है, चुनाव में प्रत्याशी के लिए काम करना दूसरी बात होती है। रिजल्ट आने से पहले ही यह बात कही जाने लगी थी की नाव उत्तम मिश्रा के समर्थकों ने चुनाव में आशुतोष तिवारी का साथ नहीं दिया। 

आशुतोष तिवारी ने कार्यकर्ताओं को महत्व नहीं दिया

दतिया उपचुनाव के दौरान यह बात भी कई बार सामने आई। भारतीय जनता पार्टी ने मुख्यमंत्री सहित पूरी कैबिनेट को चुनाव मैदान में उतार दिया था। पार्टी के बड़े नेताओं की फौज थी लेकिन भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशी ने भारतीय जनता पार्टी के लोकल कार्यकर्ताओं को महत्व नहीं दिया। इसका मतलब समझना होगा। लोकल का कार्यकर्ता, पार्टी के प्रत्याशी से महत्व चाहता है। इसलिए ताकि यदि वह जीत जाएगा तो चुनाव के समय किया गया व्यक्तिगत वादा याद दिलाया जा सके। आशुतोष तिवारी ने जनता के बीच में अपनी छवि बनाने का तो काफी अच्छा प्रयास किया लेकिन दतिया के कार्यकर्ताओं के साथ व्यक्तिगत संवाद नहीं किया। उनका व्यक्तिगत स्तर पर कोई आश्वासन नहीं दिया। यहां तक की कई कार्यकर्ताओं को चाय पानी भी नहीं पूछा। जबकि दतिया में तो चुनाव के समय पेट्रोल और होटल भी पूछना पड़ता है। 

राजा आदमी बढ़िया है

सरकारी कर्मचारियों की ओपिनियन में यह बात भी निकाल कर आ रही है। कर्मचारियों का कहना है कि राजा (घनश्याम सिंह) आदमी बढ़िया है। सबसे बात की और सबको समय दिया, जबकि भाई साहब (आशुतोष तिवारी) के पास समय ही नहीं था। वह तो विधानसभा की परिक्रमा पर निकले थे, हाथ जोड़, अभिवादन किया, REEL बनाई और आगे बढ़ गए। अपना वोट पक्का ही नहीं किया। कई लोगों ने इस बात को दोहराया कि पार्टी अलग बात है, लेकिन राजा आदमी बढ़िया है। उसमें कोई घमंड नहीं है। राज परिवार तो दूर की बात नेता जैसी बात भी नहीं है।

दतिया चुनाव में हार के अन्य कारण:- 

  • पब्लिक ने कांग्रेस के प्रत्याशी को चुना था और इस बार भी कांग्रेस को ही चुना। 2023 में दतिया में राजेंद्र भारती नहीं कांग्रेस पार्टी की जीत हुई थी, आज भी कांग्रेस पार्टी की जीत हुई है, क्योंकि जनता का भाजपा से मोहभंग हो गया। 
  • दतिया में भाजपा ने जातिवाद के आधार पर चुनाव प्रचार किया। प्रत्याशी आशुतोष शर्मा, ब्राह्मण समाज को अपने पक्ष में करने में सफल नहीं हो पाए।
  • कांग्रेस प्रत्याशी का पूरा परिवार और रिश्तेदार चुनाव मैदान में थे, लेकिन भाजपा प्रत्याशी का परिवार और रिश्तेदार अनुपस्थित थे। 
  • यह मोहन यादव सरकार का फर्स्ट सेमेस्टर था। मोहन यादव सरकार को अपनी नीतियों की समीक्षा करनी चाहिए। 
  • भाजपा ने बांकीपुर में कायस्थ की जगह कायस्थ को ही टिकट दिया और दतिया में ब्राह्मण की जगह ब्राह्मण को ही दिया। फिर भी क्यों हारी ?  उत्तर है- जनता को चेहरा चाहिए मोहरा नहीं। : Dr. Navneet Mishra
भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल दतिया में उसे तरह मोर्चा नहीं ले पाए, जैसे कि कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने लिया। पटवारी छाए हुए थे, जबकि खंडेलवाल का पता ही नहीं चल रहा था। 
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