मध्य प्रदेश का निमाड़ प्राचीन काल में बेहद समृद्ध और आधुनिक क्षेत्र हुआ करता था लेकिन फिर शत्रुओं के आक्रमण और राज परिवारों में अंतर्कलह के कारण सब कुछ नष्ट होता चला गया और एक दिन ऐसा आया जब प्रजा के पास अन्न और धन कुछ भी नहीं बचा। तब राजा उदयादित्य के अनुरोध पर एक महान तपस्वी महर्षि द्वारा 9 दिनों का श्रीसूक्त अनुष्ठान किया गया जिससे एक शिला प्रकट हुई। इस प्रकार मध्य प्रदेश के सबसे प्राचीन महालक्ष्मी मंदिर की स्थापना हुई। यह भारत के सबसे प्राचीन पांच महालक्ष्मी मंदिरों में से एक है। यह भारत का एकमात्र मंदिर है जहां लक्ष्मी के साथ श्री हरि विष्णु भी विराजमान है इसलिए इस मंदिर को महालक्ष्मी-नारायण धाम भी कहा जाता है। इसके कारण निमाड़ में एक बार फिर समृद्धि लौट आई और पिछले 1000 वर्षों में निमाड़ पर किसी भी प्रकार का बड़ा शत्रु आक्रमण, संक्रामक रोग अथवा प्राकृतिक आपदा नहीं आई। आज ऐसे दिव्य मंदिर की कथा पढ़िए:-
प्रथम अध्याय:
शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं, विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्। लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं, वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥
हे भक्तजनों! अब मैं आपको उस परम पवित्र कथा का श्रवण कराता हूँ, जो मध्य प्रदेश के खरगोन (पश्चिम निमाड़) जिले की पावन धरा पर स्थित ऊन (ऊन बुजुर्ग) गांव के श्री महालक्ष्मी मंदिर की महिमा का बखान करती है। प्राचीन काल में नर्मदा के दक्षिण में स्थित यह निमाड़ प्रदेश घने वनों और ऋषियों के आश्रमों से सुशोभित था। उस समय 'ऊँ' (Oon) नगरी धर्म, विद्या और व्यापार का एक महान केंद्र थी। इस स्थान का संबंध द्वापर युग और भगवान कृष्ण के समय से भी है। यहाँ के नारायण कुंड स्थान पर माता महालक्ष्मी और भगवान विष्णु का विवाह संपन्न हुआ था।
द्वितीय अध्याय:
लगभग 1000 वर्ष पूर्व (11वीं शताब्दी) में मालवा के प्रतापी परमार राजा उदयादित्य और उनके पुत्र राजा बल्लाल ने इस क्षेत्र में धर्म की ध्वजा फहराई। राजा उदयादित्य परम भक्त थे। उन्होंने स्वप्न में माता के निर्देश पाकर इस भव्य मंदिर का निर्माण परमार कालीन वास्तुकला में करवाया, जिसकी तुलना विश्व प्रसिद्ध खजुराहो के मंदिरों से की जाती है। यहाँ 12 मंदिरों का समूह था, जिसमें महालक्ष्मी मंदिर आज भी अपनी दिव्यता के साथ अडिग खड़ा है। इसी भूमि पर जब चेदिराज शिशुपाल माता की इच्छा के विरुद्ध उनसे विवाह करने पहुँचा, तब माता ने क्रोधित होकर उसका वध कर दिया था।
तृतीय अध्याय:
माता के तीन दिव्य स्वरूपों का रहस्य इस कॉलिंग रुपाणीमंदिर की सबसे बड़ी और अनूठी विशेषता माता के तीन प्रहरों में तीन रूप हैं।
प्रातः काल: माता एक कोमल बालिका (बाल रूप) के रूप में दर्शन देती हैं, जो नई आशा का प्रतीक है।
मध्याह्न (दोपहर): माता एक तेजस्वी युवती (युवा रूप) के रूप में दिखाई देती हैं, जो शक्ति और समृद्धि का प्रतीक है।
सायंकाल: संध्या आरती के समय माता का स्वरूप एक वृद्धा (मातृ रूप) जैसा शांत और गंभीर हो जाता है, जो करुणा और संरक्षण का प्रतीक है।
माता की यह प्रतिमा एक ही पत्थर से बनी है और षड्भुजा (6 भुजाओं वाली) है। वर्ष 2023 में जब माता का पुराना चोला (आवरण) हटा, तब माता का यह मूल प्राचीन स्वरूप भक्तों के सम्मुख प्रकट हुआ। माता के दाहिने हाथों में अंकुश, कमल और धन वर्षा मुद्रा है; और बाएं हाथों में चक्र, वरद मुद्रा एवं कलश सुशोभित है।
चतुर्थ अध्याय:
इस मंदिर को "तिरछी महालक्ष्मी" या "करवट वाली लक्ष्मी" भी कहा जाता है। लोक कथा है कि स्थापना के कुछ समय बाद एक रात्रि भीषण गर्जना हुई और माता की प्रतिमा स्वयं तिरछी (करवट लिए हुए) हो गई। पुजारियों ने उसे सीधा करने का बहुत प्रयास किया, किंतु माता ने स्वप्न में दर्शन देकर कहा कि वे इसी रूप में यहाँ भक्तों के कष्ट हरने हेतु विराजमान रहना चाहती हैं। यहाँ भक्तों की श्रद्धा के दो अनूठे स्तंभ हैं:
उल्टा स्वास्तिक: भक्त अपनी मनोकामना पूर्ति हेतु मंदिर की दीवार पर उल्टा स्वास्तिक बनाते हैं और इच्छा पूरी होने पर उसे सीधा करने पुनः आते हैं।
सिंदूर चोला: यह देश का एकमात्र ऐसा महालक्ष्मी मंदिर है, जहाँ माता को सिंदूर का चोला चढ़ाया जाता है।
पंचम अध्याय:
कार्तिक अमावस्या (दीपावली) के दिन यहाँ का वैभव देखते ही बनता है। मध्यरात्रि के बाद माता को स्वर्ण मुकुट पहनाकर विशेष श्रृंगार किया जाता है। मान्यता है कि इस दिन माता के वाहन उल्लू के भी दर्शन होते हैं।
जो भक्त सच्चे मन से यहाँ आकर प्रार्थना करता है, उसकी झोली माता कभी खाली नहीं रहने देतीं। जो भी मनुष्य इस दिव्य कथा का पाठ या श्रवण करता है, उसे न केवल धन-धान्य की प्राप्ति होती है, बल्कि उसके जीवन में धर्म, संतोष, सदाचार और माता महालक्ष्मी की अक्षय कृपा बनी रहती है।
॥ इति श्री कमलापुत्रोपदेशविरचितं ॥
॥ महालक्ष्मीदिव्यकथासम्पूर्णम् ॥
॥ जय माँ महालक्ष्मी ॥

