जबलपुर, 9 जुलाई 2026: हाई कोर्ट आफ मध्य प्रदेश द्वारा एक पुलिस कर्मचारियों के मामले में लैंडमार्क जजमेंट दिया गया है। हाई कोर्ट ने कहा कि यदि किसी मामले में, पुलिस द्वारा केस फाइल किया गया और विभाग द्वारा जांच की गई। न्यायालय में पुलिस अपराध साबित नहीं कर पाई अथवा गवाह पलट गए तो इसके कारण विभाग द्वारा की गई जांच और जांच के आधार पर की गई कार्रवाई को ऑटोमेटेकली निरस्त नहीं माना जा सकता। विद्वान न्यायाधीश श्री दीपक खोत की एकलपीठ ने विभागीय कार्रवाई को वैध ठहराते हुए पुलिस कर्मचारी को बर्खास्त किए जाने के आदेश को निरस्त करने से इनकार कर दिया।
घटना की पृष्ठभूमि: महिला यात्री के साथ आपराधिक व्यवहार
मामला वर्ष 2017 का है। आरक्षक रामपाल अहिरवार पर आरोप था कि उसने ऑटो में सफर कर रही एक महिला को चाकू दिखाकर धमकाया। शिकायत के अनुसार महिला द्वारा स्कार्फ हटाने से इनकार करने पर वर्दीधारी आरक्षक ने उसके साथ अभद्र व्यवहार किया और डराया-धमकाया। महिला की शिकायत पर सिविल लाइंस थाना पुलिस ने उसके खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धाराओं 294, 323, 506 तथा आर्म्स एक्ट के तहत मामला दर्ज किया था। विभागीय जांच में आरोपों को गंभीर मानते हुए 6 अगस्त 2018 को आरक्षक को सेवा से बर्खास्त कर दिया गया।
निर्दोष घोषित होना और कोर्ट द्वारा सजा ना देना, दोनों में अंतर है
याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि आपराधिक न्यायालय द्वारा दोषमुक्त किए जाने के बाद विभागीय बर्खास्तगी भी समाप्त कर दी जानी चाहिए। वहीं, राज्य शासन की ओर से कहा गया कि आरोपी को न्यायालय से पूर्ण रूप से निर्दोष नहीं माना गया, बल्कि पीड़िता के अदालत में अपने बयान से मुकर जाने के कारण उसे संदेह का लाभ मिला। जबकि विभागीय जांच के दौरान पीड़िता ने जिरह में आरोपी की पहचान करते हुए उसके खिलाफ आरोपों की पुष्टि की थी।
विभाग की जांच का अपना महत्व
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि आपराधिक मुकदमे में दोष सिद्ध करने के लिए संदेह से परे प्रमाण आवश्यक होते हैं, जबकि विभागीय जांच में संभावनाओं की प्रबलता के आधार पर निर्णय लिया जाता है। इसलिए दोनों कार्यवाहियां स्वतंत्र हैं और एक का परिणाम दूसरे पर स्वत: लागू नहीं होता।
अदालत ने कहा कि अनुशासित बल के सदस्य से उच्च स्तर के आचरण की अपेक्षा की जाती है। ऐसे में विभागीय जांच के आधार पर की गई बर्खास्तगी उचित और वैध है तथा उसमें हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता। याचिका को इसी आधार पर खारिज कर दिया गया।

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