भोपाल समाचार, 19 जुलाई 2026: मध्यप्रदेश शासन, आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (MP EOW) आर्थिक अपराधियों को पड़कर सजा दिलाने वाली नहीं बल्कि करोड़ों रुपए की काली कमाई करने वाले अधिकारियों को बचाने वाली एजेंसी बन गई है। मध्य प्रदेश राज्य ग्रामीण सड़क विकास प्राधिकरण के तत्कालीन मैनेजर SL SURYAVANSHI के मामले में यह बात प्रमाणित होती है। EOW उन्हें 16 साल में दूसरी बार क्लोजर रिपोर्ट पेश की और दूसरी बार कोर्ट ने यह कहते हुए क्लोजर रिपोर्ट को खारिज कर दिया की जांच अभी तक पूरी नहीं हुई है।
Questions Raised Over EOW Probe: No Conclusion in 16 Years, Closure Report Filed
ऐसे मामलों के कारण भ्रष्टाचार के खिलाफ सरकार की मंशा पर सवाल खड़े हो जाते हैं। आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ का गठन इसलिए किया गया था क्योंकि पुलिस विभाग के अधिकारी आर्थिक अपराधों के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं रखते थे। ऐसी स्थिति में आर्थिक अपराध करने वाला अपराधी बड़ी आसानी से कानूनी कार्रवाई से बच के निकल जाता था। फिर पुलिस रिश्वत लेने के लिए भी बदनाम हुआ करती थी। EOW में ऐसे अधिकारियों की नियुक्ति की गई देना प्रशासन और आर्थिक अपराध के बारे में अच्छी जानकारी होती है लेकिन आज की तारीख में EOW एक ऐसी एजेंसी बन गई है, जो आर्थिक अपराध करने वालों को बचाने का काम करती है।
एसएल सूर्यवंशी के खिलाफ सन 2010 में आए से अधिक संपत्ति का मामला दर्ज किया गया था। EOW कोई पुलिस थाना नहीं है जो प्राथमिक सूचना के आधार पर रिपोर्ट दर्ज कर ली जाए। यहां पर शिकायत की पुष्टि की गई और अपराध पाए जाने पर मामला दर्ज किया जाता है। 2010 में मामला दर्ज हुआ इसका मतलब, शिकायत में मामला दर्ज करने के लिए पर्याप्त प्रमाण मौजूद थे। शिकायत में 5 करोड़ 26 लाख रुपए की संपत्ति की डिटेल दी गई थी। EOW ने जांच करने के बाद 27 सितंबर 2012 को, न्यायालय के समक्ष क्लोजर रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए बताया कि, हमसे गलती हो गई है। एसएल सूर्यवंशी और उनकी पत्नी के नाम तो केवल 28 लाख 85000 की संपत्ति है। FIR में जो बाकी संपत्ति लिखी गई है, जिसका मूल्य 4 करोड़ के आसपास है वह सब श्री सूर्यवंशी के ससुर साहब, सासू मां, उनकी अपनी माता जी और उनके साले साहब के नाम दर्ज है और उन लोगों ने उक्त संपत्ति को खुद की कमाई से खरीदा है।
कोर्ट ने क्लोजर रिपोर्ट को ध्यान से देखा। कोर्ट को क्लोजर रिपोर्ट का अध्ययन करने में लगभग 5 महीने का समय लगा। शिकायत, FIR और क्लोजर रिपोर्ट में संलग्न जांच रिपोर्ट को पढ़ने के बाद न्यायालय ने कहा कि FIR में संपत्तियों की जो लिस्ट दी गई है, उसकी पूरी जांच नहीं हुई है। यह कहते हुए क्लोजर रिपोर्ट को खारिज कर दिया गया। मतलब साफ था कि कोर्ट ने EOW की गड़बड़ी को पकड़ लिया है लेकिन लोगों का विश्वास EOW जैसी संस्था पर बना रहे इसलिए इसका खुलासा नहीं किया, बल्कि गलती को सुधारने का मौका दिया।
EOW ने गलती तो नहीं सुधारी बल्कि वक्त का इंतजार किया और 14 साल बाद पुरानी जानकारी के आधार पर नई क्लोजर रिपोर्ट बनाई और फिर से कोर्ट में प्रस्तुत कर दी। कोर्ट ने इस बार भी EOW की पोल नहीं खोली बल्कि क्लोजर रिपोर्ट को खारिज कर दिया। इस प्रकार न्यायालय ने एक बार फिर EOW को अपनी गलती सुधारने का मौका दिया है।
क्लोजर रिपोर्ट में गड़बड़ क्या है
- EOW उन्हें बताया कि श्री सूर्यवंशी की पत्नी को उनके मायके से 8.90 लाख रुपए के गिफ्ट मिले हैं लेकिन यह नहीं बताया कि उनके मायके वालों के पास 8.90 लाख रुपए कहां से आए। मतलब सोर्स आफ इनकम क्या है?
- EOW ने प्रॉपर्टी का मूल्यांकन रजिस्ट्री में दर्ज मूल्य के आधार पर किया है। जबकि इन्वेस्टिगेशन में बाजार मूल्य का भी पता लगाया जाना चाहिए था। मतलब जब प्रॉपर्टी की रजिस्ट्री की गई तब प्रॉपर्टी की मार्केट वैल्यू क्या थी। क्योंकि रजिस्ट्री में हमेशा गवर्नमेंट रेट पर ही मूल्य का उल्लेख किया जाता है। ब्लैक मनी का लेनदेन कैश में ही होता है।
- EOW ने अपनी इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट में यह जरूर लिख दिया कि श्री सूर्यवंशी की मां और ससुराल वालों ने अपनी कमाई से प्रॉपर्टी खरीदी है लेकिन यह नहीं बताया कि वह लोग ऐसा कौन सा काम करते थे जो इतनी सारी प्रॉपर्टी बना ली।
कुल मिलाकर मामला मनी लांड्रिंग का हो सकता है। ब्लैक मनी को फैमिली मेंबर्स के नाम पर प्रॉपर्टी में इन्वेस्ट किया गया, लेकिन EOW वाले किसी भी तरह से श्री सूर्यवंशी को क्लीन चिट देना चाहते हैं। यदि श्री सूर्यवंशी क्लीन है और EOW ईमानदार है तो फिर न्यायालय ने उनकी क्लोजर रिपोर्ट पर दूसरी बार सवाल क्यों उठाया। रिपोर्ट: उपदेश अवस्थी (विधि पत्रकार एवं सलाहकार)।

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