मुलताई और मंदसौर की तरह भोपाल में भी फायरिंग की स्थिति थी लेकिन सीएम ने सूझबूझ से काम लिया

Updesh Awasthee
भोपाल, 30 जुलाई 2026:
मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में 28 और 29 जुलाई को जो कुछ हुआ वह अभूतपूर्व था लेकिन ऐसा मध्य प्रदेश में पहली बार नहीं हो रहा था। इससे पहले दिग्विजय सिंह सरकार के समय मुलताई और शिवराज सिंह सरकार के समय बरेली एवं मंदसौर में इसी प्रकार के उग्र प्रदर्शन हो चुके थे। जवाब में पुलिस ने फायरिंग की और कई किसान मारे गए। भोपाल में भी बिलकुल वैसी ही स्थिति बनने वाली थी, लेकिन सीएम डॉ मोहन यादव ने सूझबूझ से काम लिया। 

मुलताई, मंदसौर और नर्मदापुरम के किसान आंदोलन में अंतर

दिग्विजय सिंह सरकार के समय 12 जनवरी 1998 को मुलताई में किसानों पर फायरिंग की गई। 19 किसानों की मौत हुई और बाद में पांच घायल किसानों की भी मौत हुई। इस प्रकार कुल 24 किसानों की मौत हुई। इसको मुलताई गोलीकांड के नाम से जाना जाता है। यहां किसान संघर्ष समिति के आह्वान पर भारी बारिश और ओलावृष्टि से बर्बाद हुए किसान क्षतिपूर्ति मुआवजा मांग रहे थे। मतलब उनका नुकसान हो चुका था और वह अपनी लागत वापस मांग रहे थे। प्राकृतिक आपदा में सरकार से मदद मांग रहे थे। 

जून 2017 में प्याज की बंपर पैदावार के कारण मंडी में किसानों को लागत भी नहीं मिल रही थी। किसान सरकार से क्षतिपूर्ति मांग रहे थे। मतलब जो नुकसान हुआ है केवल वह मांग रहे थे। मंदसौर में 1 जून से आंदोलन शुरू हुआ और 6 जून को फायरिंग हुई जिसमें पांच किसानों की मौके पर और एक किसान की इलाज के दौरान मौत हो गई। याद रखिए यहां पर भी किसान, सरकार से सिर्फ इतनी मांग कर रहे थे कि जो नुकसान हो गया है, उसकी भरपाई कर दीजिए। प्रॉफिट ना हो लेकिन लागत तो वापस मिल जाए। 

जुलाई 2026 में मध्य प्रदेश के नर्मदापुरम बेल्ट में मूंग दाल की बंपर पैदावार हुई। इस बार किसानों को कोई घाटा नहीं हुआ था। खुले बाजार में कम कीमत मिल रही थी, जबकि सरकारी समर्थन मूल्य अधिक था। सरकार प्रत्येक किसान से सरकारी समर्थन मूल्य पर 25% मूंग खरीद रही थी लेकिन किसान चाहते थे कि, उनकी 100% मूंग दाल सरकारी दर पर सरकार द्वारा खरीदी जाए। इस बार मूंग दाल के किसानों को किसी प्राकृतिक आपदा का सामना नहीं करना पड़ा था। ना ही ऐसी स्थिति थी कि उनकी लागत भी नहीं निकल पा रही है। इस बार लड़ाई प्रॉफिट की थी। खुले बाजार में बेचने पर प्रॉफिट बहुत कम था, जबकि सरकारी रेट में प्रॉफिट डबल हो रहा है। 

इन तीनों आंदोलन में एक और बड़ा अंतर है। मुलताई और मंदसौर के किसान बेहद गरीब थे। इसमें छोटे किसानों की संख्या बहुत ज्यादा थी जबकि नर्मदापुरम के किसान, मध्य प्रदेश के सबसे धनवान किसान हैं। कुछ किसानों को तो आप जमीदार भी कह सकते हैं। इनके पास सैकड़ो एकड़ जमीन है, आलीशान बंगले और लक्जरी गाड़ियां हैं। कहने का मतलब यह, मुलताई और मंदसौर के किसान, घाटा सहन करने की स्थिति में नहीं थे। 

मुलताई, मंदसौर और नर्मदापुरम के किसान आंदोलन में समानता

सरकारी रिपोर्ट के अनुसार मुलताई में प्रदर्शन कर रहे किसानों ने पहले पथराव शुरू किया और फिर वाहनों पर हमला कर दिया। कुछ वाहनों में आग लगा दी। जवाब में पुलिस ने लाठी चार्ज, आंसू गैस और बाद में फायरिंग की। न्यायिक जांच में तत्कालीन किसान नेता, पुलिस की फायरिंग को नियम विरुद्ध साबित नहीं कर पाए। जबकि पुलिस ने इसको आत्मरक्षा में की गई फायरिंग साबित किया। 
मंदसौर में भी मुलताई की तरह किसानों ने पहले पथराव किया और फिर वाहनों में तोड़फोड़ की। जवाब में पुलिस ने लाठी चार्ज, आंसू गैस और बाद में फायरिंग की। यह मामला संसद तक पहुंचा। जनता, और विपक्ष सब किसानों के साथ थे, लेकिन न्यायिक जांच आयोग के सामने किसानों के नेता, पुलिस द्वारा की गई फायरिंग को नियम विरुद्ध साबित नहीं कर पाए। 
नर्मदापुरम के किसानों ने पुलिस द्वारा लगाए गए 1-2 नहीं बल्कि 22 बैरिकेड तोड़े। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल का 40% ट्रैफिक ब्लॉक हो गया। इमरजेंसी मेडिकल सेवाएं तक बाधित हो गई थी। गुरु पूर्णिमा के धार्मिक आयोजन नहीं हो पाए। प्रदर्शनकारी न्यू मार्केट जैसे संवेदनशील इलाके में पहुंच गए थे और सीएम हाउस से मात्र 500 मीटर की दूरी पर थे। कानून और व्यवस्था की गंभीर स्थिति बन गई थी। भारतीय न्याय संहिता की धारा 163 का खुला उल्लंघन हो रहा था। यह सब कुछ लाठी चार्ज और आंसू गैस की फायरिंग के लिए पर्याप्त था। 

सीएम डॉ मोहन यादव की सूझबूझ

मध्य प्रदेश का इतिहास पलट कर देख लीजिए, 1998 की दिग्विजय सिंह सरकार से लेकर 2017 में शिवराज सिंह सरकार तक जब-जब इस प्रकार की किसान आंदोलन हुए। प्रदर्शनकारियों ने पुलिस के निर्देशों का उल्लंघन किया, तब तब लाठीचार्ज हुआ है। 2012 को रायसेन के बरेली में फायरिंग हुई और कर्फ्यू भी लगाया गया, लेकिन 2026 में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। हल्की-फुल्की धक्का-मुक्की के अलावा पुलिस ने, हल्का बल तक प्रयोग नहीं किया। इसका मुख्य कारण यह था कि मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने स्पष्ट निर्देश दिए थे कि, किसानों को कंट्रोल करना है, लेकिन बल प्रयोग नहीं करना है। यहां तक कि जब 29 जुलाई को स्थिति गंभीर हो गई थी, तब भी मुख्यमंत्री ने किसानों के नाम निर्देश नहीं, अपील नहीं, बल्कि निवेदन किया। विपक्ष को पूरी उम्मीद थी कि इस बार भी मुलताई और मंदसौर जैसा बड़ा कांड होगा, लेकिन मोहन यादव की सूझबूझ से सब कुछ शांतिपूर्वक संपन्न हो गया। 

किसानों के 12 संगठन भले ही इसको अपने आंदोलन की सफलता माने लेकिन राजनीति की किताब में इस पूरे घटनाक्रम को डॉ मोहन यादव की रणनीति और सूझबूझ की सफलता लिखा जाएगा।

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