जबलपुर, 22 जून 2026: मप्र स्कूल शिक्षा विभाग (DPI) में शिक्षकों की भर्ती के दौरान आरक्षण नियमों के पालन को लेकर एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया। हाल ही में जबलपुर हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। यह मामला न केवल एक शिक्षक की नौकरी बचाने से जुड़ा है, बल्कि यह Vertical and Horizontal reservation rules in MP Teacher recruitment की जटिलताओं और उनके गलत क्रियान्वयन को भी उजागर करता है।
Supreme Court Guidelines on Vertical and Horizontal Reservation in Madhya Pradesh
मध्य प्रदेश के स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा भर्ती प्रक्रिया में आरक्षण कानूनों को लागू करने में लगातार अनियमितताएं देखी जा रही हैं। सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) ने सौरभ यादव बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2021), इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ (1992) और आर.के. सभरवाल बनाम पंजाब राज्य (1995) जैसे दर्जनों ऐतिहासिक मामलों में स्पष्ट मार्गदर्शी नियम (Guidelines) दिए हैं।
संविधान के अनुच्छेद 16(4) के तहत OBC, SC, ST और 16(6) के तहत EWS को मिलने वाले आरक्षण को Vertical Reservation (सोशल आरक्षण) कहा जाता है। वहीं, अनुच्छेद 16(1) और 15(3) के तहत दिव्यांगों और महिलाओं को मिलने वाला आरक्षण Horizontal Reservation (स्पेशल आरक्षण) कहलाता है। इन दोनों प्रकार के आरक्षणों को लागू करने के लिए न्यायपालिका ने स्पष्ट सिद्धांत तय किए हैं, जिनका पालन करना अनिवार्य है।
MP Education Department reservation policy irregularities and Merit Concerns
सुप्रीम कोर्ट के सिद्धांतों के अनुसार, यदि कोई आरक्षित वर्ग (Social Reservation) का अभ्यर्थी Unreserved (अनारक्षित) वर्ग के कट-ऑफ के बराबर अंक प्राप्त करता है, तो उसका चयन अनारक्षित पद पर होना चाहिए। इसके बाद, यदि उसके अंक अपनी सोशल कैटेगरी के बराबर हैं, तो वह वहां चयनित होगा, और सबसे अंत में उसे स्पेशल (Horizontal) आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए। लेकिन MP DPI Commissioner द्वारा इन नियमों को दरकिनार करते हुए, अधिक अंक वाले अभ्यर्थियों को भी उनकी मूल कैटेगरी के स्पेशल आरक्षण पदों पर ही सीमित कर दिया गया है। High Court ने कई याचिकाओं में इन त्रुटियों को सुधारने के निर्देश दिए हैं, क्योंकि यह सीधे तौर पर मेधावी छात्रों के अधिकारों का हनन है।
Rahul Patel Damoh MP Primary Teacher termination case: A Detailed Overview
हाल ही में जिला दमोह के राहुल पटेल (OBC दिव्यांग) का मामला चर्चा में आया है। राहुल की नियुक्ति 30 मार्च 2023 को प्राथमिक शिक्षक के रूप में हुई थी। नियुक्ति के समय उनके पास 2014 का 45% स्थाई विकलांगता प्रमाण पत्र था, लेकिन विभाग द्वारा दोबारा जांच कराने पर विकलांगता 40% से कम पाई गई। इसके आधार पर DEO Damoh ने उन्हें सेवा पृथक (Termination) करने का नोटिस जारी कर दिया।
राहुल पटेल ने तर्क दिया कि उनकी OBC रैंक 2417 है और उनके 108.68 अंक हैं, जो कई चयनित OBC (Open) अभ्यर्थियों से अधिक हैं। उन्होंने मांग की कि उनकी नियुक्ति को दिव्यांग कोटा से हटाकर OBC (Open) कैटेगरी में शिफ्ट किया जाए, जैसा कि संगीत कुमार जैन के मामले में EWS कोटे के लिए किया गया था।
Violation of Natural Justice and Constitutional Rights in Teacher Recruitment
शिक्षा विभाग ने राहुल पटेल के जवाब पर विचार किए बिना ही समय सीमा से पहले Termination Order जारी कर दिया। इसके खिलाफ याचिकाकर्ता ने APS Law Associates के माध्यम से याचिका क्रमांक 18535/2024 दाखिल की। इस याचिका में सेवा समाप्ति के आदेश को संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 16, 21 और The Rights of Persons with Disabilities (RPwD) Act, 2016 के तहत चुनौती दी गई।
जस्टिस विशाल धगट की खंडपीठ के समक्ष अधिवक्ताओं ने तर्क दिया कि विभाग ने Principles of Natural Justice (प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत) को दरकिनार करते हुए एक 'Non-speaking order' (बिना स्पष्ट आधार वाला आदेश) जारी किया है, जो सुप्रीम कोर्ट के स्थापित फैसलों का उल्लंघन है।
Jabalpur High Court order on primary teacher termination and Re-evaluation
सुनवाई के बाद, हाईकोर्ट ने विभाग की कार्रवाई को असंवैधानिक मानते हुए 24 जून 2024 के सेवा समाप्ति आदेश को रद्द (Quashed) कर दिया। कोर्ट ने मामले को वापस जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) को भेजते हुए निर्देश दिया है कि याचिकाकर्ता के मामले पर Merit के आधार पर पुनः विचार किया जाए।
माननीय न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि अभ्यर्थी का चयन आरक्षण का लाभ लिए बिना (Open Merit से) संभव था, तो उसकी सेवा समाप्त करना उचित नहीं है। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर और हितेंद्र कुमार गोह्लानी ने प्रभावी पैरवी की। रिपोर्ट: उपदेश अवस्थी (विधि पत्रकार एवं सलाहकार)।

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