मध्य प्रदेश ओबीसी आरक्षण विवाद: हाईकोर्ट में तीखी बहस, सरकार का रुख साफ

Updesh Awasthee
जबलपुर, 24 मई 2026:
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर खंडपीठ में आज ओ.बी.सी. आरक्षण से संबंधित 91 प्रकरणों (cases) की अंतिम सुनवाई हुई। जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस भगवती प्रसाद शर्मा की खंडपीठ के समक्ष चल रही इस कार्यवाही में उस वक्त तनाव बढ़ गया जब कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई जुलाई के अंतिम सप्ताह में तय करने का विचार किया। इसका कड़ा विरोध करते हुए ओबीसी वर्ग के वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर ने अदालत को बताया कि इस कानूनी देरी के कारण प्रदेश के लगभग 35 हजार अभ्यर्थियों का भविष्य प्रभावित हो रहा है। उन्होंने कहा कि नियुक्तियों के इंतजार में अब तक 20 से अधिक अभ्यर्थी आत्महत्या कर चुके हैं और पिछले 7 वर्षों से 35 से अधिक सरकारी विभागों की भर्तियों में 13% ओबीसी और 13% सामान्य वर्ग के पद 'होल्ड' पर रखे गए हैं। 

Supreme Court Order on MP OBC Reservation Case and Special Bench Instructions 

अधिवक्ताओं ने माननीय सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के 18 फरवरी 2026 के आदेश का हवाला दिया। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से हाईकोर्ट के सभी स्थगन आदेशों (stay orders) को रिक्त करने की बात कही थी। हालांकि, मध्य प्रदेश सरकार ने स्थगन हटाने पर असहमति जताई थी, जिसके बाद सर्वोच्च न्यायालय ने 19 फरवरी 2026 को आदेश दिया कि एक Special Bench (विशेष बेंच) गठित कर तीन महीने के भीतर इन प्रकरणों का निराकरण किया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया था कि हाईकोर्ट सुनवाई के दौरान 'Interim Orders' (अंतरिम आदेशों) के निरस्तीकरण पर भी विचार करे। इस पर हाईकोर्ट ने कटाक्ष करते हुए सवाल पूछा कि आखिर "स्टे किस बात का है?"

MP Government Stand on 27 Percent OBC Reservation Law and Recruitment Roster Stay 

बहस के दौरान यह स्पष्ट किया गया कि वर्तमान में कुछ भर्ती विज्ञापनों और Recruitment Roster (भर्ती रोस्टर) पर स्टे है, न कि आरक्षण के कानून पर। सरकार की ओर से पैरवी कर रहे सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता के.एम. नटराज ने दलील दी कि कोर्ट को केवल अंतिम सुनवाई (Final Hearing) करनी चाहिए, न कि अंतरिम आदेशों को रद्द करने पर विचार। इस दलील पर हाईकोर्ट ने भी असहजता व्यक्त की और कहा कि "जब कानून पर स्टे नहीं है तो भर्तियां की जा सकती हैं"। इसके जवाब में सरकार ने रुख साफ किया कि पदों को तभी 'अन्होल्ड' किया जाएगा जब प्रकरणों का पूर्ण निराकरण हो जाएगा। 

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