नई दिल्ली, 27 मई 2026: प्रॉपर्टी के मामले में अक्सर धोखाधड़ी की जाती है। ऐसा इसलिए किया जाता है क्योंकि प्रॉपर्टी की धोखाधड़ी को सामान्य तौर पर सिविल मामला समझ जाता है। यदि पुलिस थाने में आपराधिक मामला दर्ज कर भी लिया जाए तब भी ऐसे मामले को दीवानी मामले की तरह ट्रीट किया जाता है लेकिन आज सुप्रीम कोर्ट ने इस पैटर्न को बदल दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस प्रकार के आर्थिक अपराधों में ढिलाई ठीक नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने प्रॉपर्टी धोखाधड़ी के आरोपी की अग्रिम जमानत को रद्द करते हुए कठोर कार्रवाई के संदेश दिया।
The Backstory: करोड़ों का सौदा और 'डबल गेम'
यह विवाद लखनऊ के महानगर एक्सटेंशन स्थित एक आवासीय संपत्ति (C-24, E-Park) से जुड़ा है।शिकायतकर्ता सौरभ अग्रवाल का आरोप है कि आरोपी मोनिका द्विवेदी, उनके बेटे अभिषेक और बेटी अभिलाषा ने खुद को इस संपत्ति का संयुक्त स्वामी बताया। 8 जनवरी 2024 को 4.30 करोड़ रुपये में सौदा तय हुआ, जिसमें से सौरभ अग्रवाल ने 3.55 करोड़ रुपये का भुगतान कर दिया। आरोप है कि भारी रकम लेने के बावजूद, आरोपियों ने 24 जून 2024 को गुपचुप तरीके से इस संपत्ति को किसी तीसरे पक्ष (पंकज मोहन मिश्रा) के नाम रजिस्टर्ड कर दिया। जब सौरभ अग्रवाल ने अपने पैसे वापस मांगे, तो उन्हें धमकी दी गई।
कानूनी कार्यवाही का सफर
शुरुआत में अलीगंज थाने में FIR दर्ज हुई, जिसे बाद में महानगर थाना (FIR No. 0002/2025) में स्थानांतरित कर दिया गया। आरोपियों पर धोखाधड़ी (420), जालसाजी (467, 468), आपराधिक साजिश (120-B) और धमकी (506) की धाराएं लगाई गईं। आरोपी पक्ष ने मामले को खारिज करने के लिए हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की परंतु हाई कोर्ट ने उनकी याचिका को खारिज कर दिया, क्योंकि आरोपियों के खिलाफ पहले से ही कई मामले दर्ज हैं। फिर उन्होंने अग्रिम जमानत के लिए जिला एवं सत्र न्यायालय में अप्लाई किया परंतु उनकी एप्लीकेशन को रिजेक्ट कर दिया गया।
इसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की। 6 अक्टूबर 2025 को इलाहाबाद हाईकोर्ट (लखनऊ बेंच) ने मोनिका द्विवेदी को अग्रिम जमानत दे दी। हाईकोर्ट का तर्क था कि एग्रीमेंट रजिस्टर्ड नहीं था और यह मामला दीवानी (Civil Nature) का प्रतीत होता है।
दोनों पक्षों के तर्क (Arguments)
शिकायतकर्ता (सौरभ अग्रवाल) के वकील ने तर्क दिया कि यह एक सुनियोजित आर्थिक अपराध (Economic Offence) है। आरोपी आदतन अपराधी हैं और जांच के दौरान फरार रहे हैं, इसलिए उन्हें जमानत नहीं मिलनी चाहिए।
आरोपी (मोनिका द्विवेदी) का तर्क था कि यह केवल अनुबंध का उल्लंघन (Breach of Contract) है। चूंकि शिकायतकर्ता ने FIR में पैसे की वापसी मांगी है, इसलिए यह एक दीवानी विवाद है।
Court's Observations: सुप्रीम कोर्ट की विशेष टिप्पणियाँ और निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि जमानत देते समय केवल सतही तथ्यों को देखा गया। कोर्ट ने कहा कि एग्रीमेंट का 'रजिस्टर्ड' न होना धोखाधड़ी के आपराधिक तत्व को खत्म नहीं करता। केवल इसलिए कि सिविल उपचार (Civil Remedy) उपलब्ध है, इसका मतलब यह नहीं कि आपराधिक कार्यवाही नहीं हो सकती। कोर्ट ने आश्चर्य जताया कि हाईकोर्ट ने आरोपी के पुराने आपराधिक रिकॉर्ड (Criminal Antecedents) पर चुप्पी साधे रखी, जबकि पिछली याचिकाओं में खुद हाईकोर्ट ने इसका उल्लेख किया था।
कोर्ट ने पाया कि आरोपी जांच के दौरान सहयोग नहीं कर रहे थे और उनके खिलाफ कुर्की (Coercive steps) की नौबत आ गई थी।
Final Verdict: SC Cancels Bail in Property Fraud Case
न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया की पीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए कहा कि हाईकोर्ट ने मामले के गंभीर पहलुओं और आरोपी के क्राइम रिकॉर्ड की अनदेखी की है। स्पष्ट किया कि आर्थिक अपराधों में, जहां बड़ी रकम और जनता का विश्वास शामिल हो, वहां अग्रिम जमानत देने में अत्यधिक सावधानी बरतनी चाहिए। इसी के साथ मोनिका द्विवेदी की Anticipatory Bail रद्द कर दी गई। अब लखनऊ पुलिस द्वारा मोनिका को गिरफ्तार किया जाएगा।
संबंधित व्यक्ति और संस्थान:
शिकायतकर्ता: सौरभ अग्रवाल।
आरोपी: मोनिका द्विवेदी।
स्थान: महानगर एक्सटेंशन, लखनऊ।
अदालत: भारत का उच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India)।
कानूनी धाराएं: IPC की धारा 420, 467, 468, 471, 506, 120-B

.webp)