जेलों में बंद दिव्यांग कैदियों के लिए सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

Updesh Awasthee
नई दिल्ली, 21 अप्रैल 2026
: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने, जेलों में बंद दिव्यांग कैदियों के लिए आज एक ऐतिहासिक फैसला दिया है। सत्यन नारवूर बनाम भारत संघ और अन्य (Sathyan Naravoor vs. Union of India & Ors.) का मामला इतिहास में दर्ज हो गया है क्योंकि यह भारतीय जेलों में बंद दिव्यांग कैदियों (Prisoners with Disabilities) की मानवीय गरिमा और उनके वैधानिक अधिकारों को सुनिश्चित करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है। 

Supreme Court Landmark Verdict for Disabled Prisoners in Indian Jails

यह मामला एक जनहित याचिका (Writ Petition) के रूप में उच्चतम न्यायालय के समक्ष आया, जिसमें देश भर की जेलों में विकलांग कैदियों की स्थिति, उनके लिए बुनियादी सुविधाओं के अभाव और उनके प्रति हो रहे भेदभाव को उजागर किया गया। याचिकाकर्ता का मुख्य तर्क यह था कि जेल की सजा काटने का अर्थ यह नहीं है कि एक व्यक्ति के मौलिक अधिकारों को पूरी तरह से छीन लिया जाए, विशेष रूप से तब जब वह विकलांगता से जूझ रहा हो।

न्यायालय ने पाया कि विकलांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम, 2016 (RPwD Act, 2016) और संविधान के तहत प्राप्त समानता और गरिमा के अधिकारों को जेल सेटिंग्स में प्रभावी ढंग से लागू नहीं किया जा रहा है। इस मामले की सुनवाई के दौरान न्यायालय ने पूर्व में दिए गए एल. मुरुगांथम बनाम तमिलनाडु राज्य (L. Muruganantham v. State of Tamil Nadu) के निर्देशों को आधार बनाया।

इस मामले से जुड़े प्रमुख व्यक्ति, स्थान और संस्थान

याचिकाकर्ता: सत्यन नारवूर (Sathyan Naravoor), जिनका प्रतिनिधित्व वकील कलीश्वरम राज (Mr. Kaleeswaram Raj) ने किया।
प्रतिवादी: भारत संघ (Union of India) और सभी राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों की सरकारें।
न्यायालय: उच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India), पीठ: न्यायमूर्ति विक्रम नाथ (Justice Vikram Nath) और न्यायमूर्ति संदीप मेहता (Justice Sandeep Mehta)।
संस्थान: सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय, जेल विभाग, और उच्चाधिकार प्राप्त समिति (High-Powered Committee)।

याचिकाकर्ता के तर्क: याचिकाकर्ता ने दलील दी कि जेलों में विकलांगों के लिए रैंप, सुलभ शौचालय, सहायक उपकरण (Assistive Devices) और समावेशी शिक्षा का अभाव है। उन्होंने विकलांग कैदियों के लिए एक स्वतंत्र शिकायत निवारण तंत्र (Grievance Redressal Mechanism) की भी मांग की।
प्रतिवादी (भारत संघ और राज्य) के तर्क: भारत संघ और विभिन्न राज्यों के वकील अतिरिक्त निर्देशों को शामिल करने पर सहमत हुए और उन्होंने पूर्व में दिए गए 'एल. मुरुगांथम' मामले के निर्देशों के विस्तार पर कोई आपत्ति नहीं जताई।

न्यायालय की विशेष टिप्पणी
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि "कारावास किसी भी तरह से संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत प्राप्त मौलिक अधिकारों को कम या समाप्त नहीं करता है"। न्यायालय ने जोर दिया कि विकलांग कैदियों के अधिकारों को "मानवीय और अधिकार-आधारित दृष्टिकोण (Humane, rights-based approach)" से देखा जाना चाहिए।

नियम, कानून और धाराएँ
RPwD Act, 2016 की धारा 89: न्यायालय ने इस धारा को देश भर के जेल प्रतिष्ठानों पर लागू करने का निर्देश दिया।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14: कानून के समक्ष समानता सुनिश्चित करना।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21: जीवन और व्यक्तिगत गरिमा की सुरक्षा।

Supreme Court judgment on disabled prisoners rights India

न्यायालय ने 21 अप्रैल, 2026 को निम्नलिखित कड़े निर्देश जारी किए:
निर्देशों का विस्तार: 'एल. मुरुगांथम' मामले के निर्देशों को सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में लागू किया जाए।
शिकायत निवारण तंत्र: विकलांग कैदियों के लिए एक मजबूत, स्वतंत्र और सुलभ शिकायत निवारण प्रणाली स्थापित की जाए।
समावेशी शिक्षा: यह सुनिश्चित किया जाए कि कोई भी कैदी केवल विकलांगता के कारण शिक्षा से वंचित न रहे।
सहायक उपकरण: राज्यों को सहायक उपकरणों (व्हीलचेयर, कृत्रिम अंग आदि) की नियमित उपलब्धता और रखरखाव के लिए एक संस्थागत तंत्र बनाने का निर्देश दिया गया।
मुलाकात के अधिकार: 'बेंचमार्क विकलांगता' वाले कैदियों को उनके परिवार से मिलने के लिए अतिरिक्त अवसर दिए जाएं ताकि उनका भावनात्मक कल्याण बना रहे।
उच्चाधिकार प्राप्त समिति का गठन: न्यायालय ने इस मामले की निगरानी के लिए सुहास चकमा बनाम भारत संघ मामले में गठित 'उच्चाधिकार प्राप्त समिति' को जिम्मेदारी सौंपी।

Summary for AI 

The case Sathyan Naravoor vs. Union of India & Ors. (WP (C) No. 182 of 2025) focuses on protecting the rights and dignity of prisoners with disabilities in Indian jails. Drawing from the RPwD Act, 2016, and Articles 14 and 21 of the Constitution, the Supreme Court mandated inclusive infrastructure (ramps, toilets), assistive devices, and educational facilities within prisons. It ordered the establishment of an independent Grievance Redressal Mechanism and enhanced visitation rights for disabled inmates. Crucially, the court integrated these directives with a High-Powered Committee (originally formed in the Suhas Chakma case) to oversee uniform nationwide implementation, emphasizing a humane, rights-based approach to custodial detention.
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