BIG NEWS: भोपाल के अजय दुबे की याचिका पर दिल्ली हाई कोर्ट का NGT को नोटिस, इतनी फीस क्यों लेते हो

Updesh Awasthee
Delhi HC Notice to NGT
नई दिल्ली, 18 अप्रैल 2026
: भारत के प्रसिद्ध आरटीआई (RTI) और पर्यावरण कार्यकर्ता अजय दुबे, निवासी भोपाल ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) द्वारा आवेदनों और अपीलों पर ली जाने वाली "अत्यधिक फीस" के खिलाफ दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। इस रिट याचिका (Writ Petition) ने देश के न्यायिक हलकों में एक नई बहस छेड़ दी है कि क्या पर्यावरण संरक्षण जैसे जनहित के मामलों में न्याय पाना अब आम नागरिक की पहुंच से बाहर होता जा रहा है? दिल्ली हाई कोर्ट ने NGT को नोटिस जारी करके पूछा है कि वह पर्यावरण संरक्षण के मामलों में इतनी फीस क्यों लेते हैं।

न्याय की महंगी कीमत: ₹8,200 का भुगतान और 'एक्सेस टू जस्टिस' पर सवाल

याचिकाकर्ता अजय दुबे ने अदालत को बताया कि मध्य प्रदेश के सिंगरौली जिले में महान एनर्जेन लिमिटेड (Mahan Energen Ltd.) जो कि अडानी कॉर्पोरेशन लिमिटेड (Adani Corporation Limited) की सहायक कंपनी है, के एक कोयला खनन प्रोजेक्ट को दी गई पर्यावरण मंजूरी को चुनौती देने के दौरान उन्हें केवल शुरुआती स्तर पर ही लगभग ₹8,200 की भारी-भरकम फीस चुकानी पड़ी।

याचिका में मुख्य रूप से NGT (प्रैक्टिस और प्रोसीजर) रूल्स, 2011 के नियम 12(2) और 12(2A) को चुनौती दी गई है। इन नियमों के तहत NGT में किसी भी आवेदन या अपील के लिए ₹1,000 की फीस और हर 'विविध आवेदन' (Miscellaneous Application) के लिए ₹500 की फीस अनिवार्य है। इसके अलावा, NGT द्वारा ऑनलाइन फाइलिंग के बावजूद ₹100 प्रति 25 पेज की दर से वसूले जा रहे "प्रिंटिंग चार्ज" को भी अवैध और असंवैधानिक बताया गया है।

संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन?

अजय दुबे की ओर से पेश वकील मृगांक प्रभाकर ने याचिका में तर्क दिया है कि यह भारी फीस संरचना संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन और न्याय तक पहुंच का अधिकार) का उल्लंघन करती है। याचिका में कहा गया है कि जहाँ सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में जनहित याचिकाओं (PIL) और 'हेबियस कॉर्पस' (Habeas Corpus) के लिए फीस नाममात्र या शून्य है, वहीं NGT जैसे ट्रिब्यूनल में पर्यावरण की रक्षा के लिए लड़ने वाले नागरिकों पर ऐसा वित्तीय बोझ डालना उन्हें न्याय मांगने से हतोत्साहित करता है।

सिंगरौली कोयला ब्लॉक: 'नो-गो एरिया' और एलीफेंट कॉरिडोर का विवाद

इस पूरी कानूनी लड़ाई की जड़ में सिंगरौली का वह विवादित कोयला खनन प्रोजेक्ट है, जिसे घने जंगलों और हाथी गलियारे (Elephant Corridor) के बीच मंजूरी दी गई है। याचिका के अनुसार:
  • यह प्रोजेक्ट 1397.54 हेक्टेयर के घने जंगल में फैला है।
  • यह इलाका सरकार की अपनी नीति के अनुसार 'नो-गो एरिया' (No-Go Area) में आता है, जहाँ खनन की अनुमति नहीं होनी चाहिए।
  • साइट इंस्पेक्शन रिपोर्ट (SIR) में भी माना गया है कि यहाँ 'साल' (Sal) के बेहतरीन जंगल हैं और यह क्षेत्र वन्यजीवों के लिए बेहद संवेदनशील है।

विशेषज्ञों की चेतावनी को किया गया दरकिनार?

याचिका में प्रस्तुत दस्तावेजों के अनुसार, इस कोल ब्लॉक का एक बड़ा हिस्सा आरक्षित वन क्षेत्रों (RF Nos. 371, 372 और 373) में आता है, जो हाथी गलियारे (Elephant Corridor) का हिस्सा हैं। महत्वपूर्ण तथ्य निम्नलिखित हैं:
  • SIR की प्रतिकूल रिपोर्ट: फरवरी 2024 में की गई साइट इंस्पेक्शन रिपोर्ट (SIR) में विशेषज्ञों ने स्पष्ट चेतावनी दी थी कि यहाँ का जंगल 0.5 से 0.6 घनत्व वाला 'साल' (Sal) का बेहतरीन प्राकृतिक जंगल है।
  • खनन पर रोक की सिफारिश: शुरुआती रिपोर्ट में कहा गया था कि इस संवेदनशील क्षेत्र में ओपन-कास्ट माइनिंग करना 'पर्यावरण के अनुकूल' नहीं होगा और इससे 'कार्बन सिंक' (Carbon Sink) का भारी नुकसान होगा।
  • नीतिगत उल्लंघन: याचिकाकर्ता का तर्क है कि 2011-12 की सरकारी नीति के अनुसार, उच्च घनत्व वाले ऐसे जंगलों को 'नो-गो एरिया' (No-Go Area) घोषित किया गया था, जहाँ खनन पूरी तरह प्रतिबंधित होना चाहिए।

अचानक 'U-Turn' और 'In-Principle' मंजूरी का रहस्य

अजय दुबे ने अपनी याचिका में आरोप लगाया है कि जहाँ फरवरी 2024 की रिपोर्ट खनन के खिलाफ थी, वहीं जुलाई 2024 में गठित एक नई सब-कमेटी ने अचानक 'U-Turn' ले लिया। इस समिति की सिफारिश पर 24 सितंबर 2024 को पर्यावरण मंत्रालय (MoEFCC) ने प्रोजेक्ट को 'इन-प्रिंसिपल स्टेज-1' मंजूरी दे दी। याचिका में इस जल्दबाजी और प्रक्रिया को "संवैधानिक जिम्मेदारी का त्याग" करार दिया गया है।

NGT के 'हिडन चार्जेस' और न्याय का महंगा मॉडल

याचिकाकर्ता ने दिल्ली हाई कोर्ट के समक्ष NGT की कार्यप्रणाली पर भी कड़े सवाल उठाए हैं। याचिका के अनुसार:
कंपलसरी ऑनलाइन फाइलिंग: NGT में अब केवल ऑनलाइन फाइलिंग होती है, जहाँ सॉफ्टवेयर के माध्यम से एडवांस में भारी फीस वसूल ली जाती है, अन्यथा केस रजिस्टर ही नहीं होता।
प्रिंटिंग चार्जेस का बोझ: ऑनलाइन फाइलिंग के बावजूद, NGT के रजिस्ट्रार जनरल के 2019 के आदेश के अनुसार प्रति 25 पेज पर ₹100 का प्रिंटिंग शुल्क वसूला जा रहा है, जिसका NGT एक्ट में कोई प्रावधान नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट से तुलना: याचिका में तर्क दिया गया है कि जहाँ सुप्रीम कोर्ट में 'हेबियस कॉर्पस' याचिकाओं पर फीस शून्य है और PIL पर केवल ₹500 है, वहीं NGT में एक पर्यावरण कार्यकर्ता को ₹8,200 सिर्फ शुरुआत में ही चुकाने पड़ रहे हैं।

संविधान का अनुच्छेद 48A और राज्य की जिम्मेदारी

वकील मृगांक प्रभाकर के माध्यम से दायर इस याचिका में अनुच्छेद 48A का हवाला दिया गया है, जो राज्य को पर्यावरण और वन्यजीवों की रक्षा करने का निर्देश देता है। याचिका में कहा गया है कि यदि आम नागरिकों के लिए पर्यावरण की रक्षा की लड़ाई इतनी महंगी बना दी जाएगी, तो कोई भी व्यक्ति आगे आने का साहस नहीं करेगा, जो कि 'एक्सेस टू जस्टिस' के मूल अधिकार का हनन है।

The 'Prayers: क्या चाहते हैं याचिकाकर्ता अजय दुबे?

अजय दुबे ने अपनी याचिका में दिल्ली हाई कोर्ट से निम्नलिखित प्रमुख राहतों की मांग की:
नियमों को रद्द करना: NGT (प्रैक्टिस और प्रोसीजर) रूल्स, 2011 के नियम 12(2) और 12(2A) को असंवैधानिक घोषित कर रद्द किया जाए, क्योंकि ये संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन करते हैं।
प्रिंटिंग शुल्क पर रोक: ट्रिब्यूनल के उस कार्यालय आदेश को अवैध घोषित किया जाए जिसके तहत ऑनलाइन फाइलिंग के बावजूद ₹100 प्रति 25 पेज का प्रिंटिंग चार्ज वसूला जा रहा है।
फीस वापसी (Refund): याचिकाकर्ता ने मांग की है कि सिंगरौली मामले में अब तक उनके द्वारा चुकाई गई पूरी कोर्ट फीस वापस की जाए, क्योंकि यह उनकी निजी आय से दी गई है।
अंतरिम राहत: जब तक यह याचिका लंबित है, तब तक MoEFCC और NGT को जनहित के मामलों में ऐसी अत्यधिक फीस वसूलने से रोका जाए।

'हिडन चार्जेस' का आरोप: पारदर्शिता पर सवाल

याचिका में एक गंभीर आरोप 'कन्वीनियंस फीस' (Convenience Fees) के नाम पर वसूले जा रहे "हिडन चार्जेस" को लेकर लगाया गया है। दुबे का तर्क है कि ऑनलाइन पोर्टल पर ₹600 के अलावा कुछ अतिरिक्त राशि भी जोड़ी जाती है, जिसका विवरण पोर्टल पर स्पष्ट नहीं होता और जिसके बिना आवेदन रजिस्टर नहीं होता। याचिका में इसे "बिना कानूनी अधिकार के वसूली" करार दिया गया है।

न्याय की तुलना: सुप्रीम कोर्ट बनाम NGT

याचिका में पेश वकील मृगांक प्रभाकर ने एक बहुत ही दिलचस्प तुलना अदालत के सामने रखी है:
सुप्रीम कोर्ट (SC): यहाँ 'हेबियस कॉर्पस' (Habeas Corpus) और आपराधिक याचिकाओं पर फीस शून्य (Nil) है, जबकि PIL पर केवल ₹500 है।
दिल्ली हाई कोर्ट: यहाँ PIL के लिए नाममात्र ₹100 की फीस लगती है।
NGT: यहाँ एक नागरिक को पर्यावरण जैसे संवेदनशील मुद्दे पर अपील करने के लिए शुरुआती चरण में ही ₹8,200 खर्च करने पड़ रहे हैं। दुबे का तर्क है कि पर्यावरण की रक्षा करना संविधान के अनुच्छेद 51A(g) के तहत हर नागरिक का "मूल कर्तव्य" है, और इस कर्तव्य के पालन के लिए नागरिकों पर वित्तीय बोझ डालना उन्हें न्याय से वंचित करना है।

ग्राउंड रिपोर्ट: सिंगरौली में जंगलों की कटाई और विरोध

याचिका में यह भी बताया गया है कि दिसंबर 2025 के पहले सप्ताह में जब सिंगरौली में बड़े पैमाने पर जंगलों की कटाई शुरू हुई, तब स्थानीय निवासियों और वनवासियों ने इसका कड़ा विरोध किया। इसी विरोध के बाद मामला सार्वजनिक हुआ और अजय दुबे ने कागजात जुटाकर NGT का रुख किया। याचिका में कोर्ट से मांग की गई है कि MoEFCC को सिंगरौली-सीधी-गुरु घासीदास और सीधी-सिंगरौली-पलामू हाथी गलियारों की सीमाओं को स्पष्ट रूप से अधिसूचित करने का निर्देश दिया जाए।

Delhi High Court Issues Notice to NGT Over Fee Structure, Asks Reason for Charges

यह मामला केवल अजय दुबे बनाम भारत सरकार का नहीं है, बल्कि यह भारत में 'एक्सेस टू जस्टिस' के भविष्य का निर्धारण करेगा। यदि दिल्ली हाई कोर्ट इन नियमों को बदलता है, तो यह देश भर के पर्यावरण कार्यकर्ताओं के लिए एक बड़ी जीत होगी। इससे न केवल सिंगरौली के हाथी गलियारों को बचाने की लड़ाई आसान होगी, बल्कि आने वाले समय में कोई भी साधारण नागरिक बिना किसी वित्तीय डर के पर्यावरण विनाश के खिलाफ आवाज उठा सकेगा। 
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