नई दिल्ली, 12 मार्च, 2026: भारत में अब कोई भी व्यक्ति लंबी बीमारी के कारण तड़प तड़प कर नहीं मरेगा। न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने स्पष्ट किया कि 'गरिमा के साथ मरने का अधिकार' संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का एक अभिन्न हिस्सा है। सुप्रीम कोर्ट ने भारत सरकार को आदेश दिया कि वह इस संबंध में कानून बनाए ताकि नागरिक को उनका अधिकार मिले और हर मामला कोर्ट तक न पहुंचे।
मामले की पूरी कहानी: एक होनहार छात्र का त्रासद हादसा
यह कहानी 20 अगस्त, 2013 को शुरू हुई, जब पंजाब यूनिवर्सिटी से बी.टेक कर रहे 20 वर्षीय हरीश राणा अपने पेइंग गेस्ट (PG) आवास की चौथी मंजिल से गिर गए। इस दुर्घटना में उन्हें 'डिफ्यूज एक्सोनल इंजरी' (diffuse axonal injury) हुई, जिसके कारण वे स्थायी रूप से 'परसिस्टेंट वेजिटेटिव स्टेट' (PVS) में चले गए। यदि आप Persistent Vegetative State - PVS नहीं जानते, तो यह "कोमा" का ठीक उल्टा होता है। इसमें भी व्यक्ति की आंखें तो खुली रहती है परंतु उसके आसपास क्या चल रहा है उसको कुछ पता नहीं चलता क्योंकि उसके मस्तिष्क का वह हिस्सा काम करना बंद कर देता है जो सोचने, समझने और महसूस करने का काम करता है। Coma में समझता है लेकिन रिएक्ट नहीं कर पाता। PVS में बॉडी अपने आप रिएक्ट करती रहती है लेकिन समझ में कुछ नहीं आता।
हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से हरीश बिस्तर पर हैं, पूरी तरह से अक्षम हैं और नली के माध्यम से पोषण प्राप्त कर रहे हैं। उनके माता-पिता (A और N) और उनके भाई-बहन (AR और BP) ने इन वर्षों में उनकी निस्वार्थ सेवा की। मामला पहले दिल्ली उच्च न्यायालय गया, जिसने जुलाई 2024 में हस्तक्षेप से इनकार कर दिया था, जिसके बाद माता-पिता ने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।
आवेदक हरीश राणा के माता-पिता के तर्क:
वकील ने तर्क दिया कि 'नैदानिक रूप से सहायता प्राप्त पोषण और जलयोजन' (CANH) कोई सामान्य देखभाल नहीं, बल्कि एक जटिल चिकित्सा प्रक्रिया है। 13 वर्षों तक बिना किसी सुधार के इस स्थिति में बने रहना मानवीय गरिमा का उल्लंघन है। माता-पिता ने कोर्ट को बताया कि हरीश न देख सकते हैं, न सुन सकते हैं और न ही किसी स्पर्श पर प्रतिक्रिया देते हैं। वृद्ध होते माता-पिता ने अपनी व्यथा व्यक्त की कि उनके बाद हरीश की देखभाल कौन करेगा।
प्रतिवादी भारत संघ और अन्य संस्थान का पक्ष:
सरकार ने इस मामले में गैर-प्रतिकूल (non-adversarial) रुख अपनाया। अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) ऐश्वर्या भाटी ने कोर्ट को मेडिकल बोर्ड की रिपोर्टों से अवगत कराया। केंद्र सरकार और उत्तर प्रदेश सरकार ने कोर्ट के निर्देशानुसार हरीश को घर पर ही उपशामक देखभाल (palliative care) और दवाएं उपलब्ध कराई थीं। सरकार ने माना कि स्थिति अपरिवर्तनीय (irreversible) है, इसलिए 'सर्वोत्तम हित' के सिद्धांत को लागू किया जा सकता है।
न्यायालय की महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ
न्यायालय ने अपने 1373 पैराग्राफ के विस्तृत फैसले में कई महत्वपूर्ण बातें कहीं। कोर्ट ने घोषित किया कि:
CANH एक 'चिकित्सा उपचार' (Medical Treatment) है, न कि केवल भोजन देना। इसलिए, इसे रोकना कानूनी रूप से 'निष्क्रिय इच्छामृत्यु' के दायरे में आता है।
मरीज का सर्वोत्तम हित (Best Interest): कोर्ट ने कहा कि सवाल यह नहीं है कि "क्या मरीज को मरना चाहिए?", बल्कि यह है कि "क्या उसे मशीनों के सहारे जबरदस्ती जीवित रखना उसके हित में है?"।
न्यायाधीशों ने हरीश के परिवार के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त की और उनके 13 वर्षों के संघर्ष को 'Resilience of Love' (प्रेम की शक्ति) का उदाहरण बताया।
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला
न्यायालय ने निम्नलिखित निर्देश जारी किए हैं:
हरीश को दी जा रही CANH और अन्य जीवन-रक्षक चिकित्सा सहायता को हटाने की अनुमति दी गई। हरीश को तत्काल AIIMS, नई दिल्ली के उपशामक देखभाल (Palliative Care) विभाग में भर्ती किया जाएगा ताकि उनका अंत दर्द रहित और गरिमापूर्ण हो सके।
Supreme Court Orders Law for ‘Right to Die with Dignity’ in India
कोर्ट ने 'कॉमन कॉज़ (2018)' के नियमों को और सरल बनाया है। अब जिला स्तर पर मुख्य चिकित्सा अधिकारियों (CMO) को डॉक्टरों का पैनल तैयार रखना होगा ताकि मेडिकल बोर्ड के गठन में देरी न हो। कोर्ट ने केंद्र सरकार से इस संवेदनशील विषय पर एक व्यापक कानून बनाने का आग्रह किया है।
अंतिम शब्द: न्यायमूर्ति विश्वनाथन ने संस्कृत श्लोक का हवाला देते हुए कहा कि 'चिंता' जलती हुई चिता से भी अधिक भयानक है, क्योंकि चिता मुर्दे को जलाती है, जबकि चिंता जीवित को। यह फैसला हरीश को और उनके परिवार को उस लंबी पीड़ा से मुक्ति दिलाएगा।
न्यूज़ रिपोर्टर उपदेश अवस्थी विधि सलाहकार भी है।

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