नई दिल्ली, 12 मार्च 2026 : सरकारी कर्मचारियों द्वारा रिश्वतखोरी के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक निर्णय दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि दो अधिकारियों ने मिलकर किसी व्यक्ति से रिश्वत की साजिश रची। इसके बाद रिश्वत वसूल की गई लेकिन कोर्ट में साजिश को साबित नहीं किया जा सकता तो जो अधिकारी पहन के पीछे था वह तो दोष मुक्त हो जाएगा लेकिन जिसने रिश्वत प्राप्त की है, उसको दंडित किया जाएगा।
Supreme Court Sends Strong Message on Corruption Trials, Each Officer Must Face Charges Individually
इस कहानी की शुरुआत सन 2010 में हुई जब पवन अग्रवाल की बिजनेस फर्म का इनकम टैक्स असेसमेंट चल रहा था। पवन अग्रवाल ने CBI को शिकायत की कि, इंस्पेक्टर बलजीत सिंह ने 5 लाख रुपए रिश्वत मांगी है और बताया है कि यदि वह रिश्वत दे देते हैं तो उनके सीनियर, जॉइंट कमिश्नर अरुण कुमार गुर्जर असेसमेंट को बिना किसी रूकावट के पूरा कर देंगे। CBI ने शिकायत का सत्यापन किया और शिकायत सही पाए जाने पर ट्रैप दल का गठन किया। प्लानिंग के तहत 29 दिसंबर 2010 को शिकायत करने वाले बिजनेसमैन पवन अग्रवाल को ₹1000 के 200 नोट दिए गए। इन नोटों के ऊपर फिनोलफथेलिन पाउडर लगा हुआ था। यह रुपए लेकर पवन अग्रवाल, जॉइंट कमिश्नर अरुण कुमार गुर्जर के ऑफिस पहुंचे जहां इंस्पेक्टर बलजीत सिंह से मुलाकात हुई। पवन अग्रवाल ने इंस्पेक्टर बलजीत सिंह को रिश्वत के रुपए दिए। इंस्पेक्टर बलजीत सिंह ने उन नोटों को लेकर अपने कोर्ट की जेब में रख लिया।
ठीक इसी समय CBI ने छापामार कार्रवाई की और इंस्पेक्टर बलजीत सिंह को पकड़ लिया। सोडियम कार्बोनेट के लिक्विड से केमिकल टेस्ट किया गया जिसकी रिपोर्ट पॉजीटिव आई। ट्रायल कोर्ट ने इंस्पेक्टर बलजीत सिंह और जॉइंट कमिश्नर अरुण कुमार गुर्जर को आईपीसी की धारा 120 बी और भ्रष्टाचार अधिनियम की धारा 7 के तहत दोषी घोषित करते हुए 4 साल कठोर कारावास की सजा सुनाई। इसके खिलाफ राजस्थान हाई कोर्ट में अपील की गई। राजस्थान हाई कोर्ट ने दोनों अधिकारियों को दोष मुक्त कर दिया और कहा की साजिश का कोई सबूत नहीं है और रिश्वत मांगे जाने का भी कोई सबूत नहीं है।
अब मामला सुप्रीम कोर्ट के सामने आया। सुप्रीम कोर्ट के सामने यह प्रश्न था कि यदि आईपीसी की धारा 120 बी के तहत साजिश प्रमाणित नहीं होती है तो क्या भ्रष्टाचार अधिनियम की धारा 7 के तहत दर्ज किया गया अपराध अपने आप खत्म हो जाता है।
जस्टिस के. विनोद चंद्रन ने कहा कि भ्रष्टाचार का मुख्य अपराध, अपराध की साजिश से अलग है और उसका अपना अस्तित्व है। यदि इंस्पेक्टर और ज्वाइंट कमिश्नर के बीच किसी प्रकार की साजिश को प्रमाणित नहीं किया जा सका है तो इसका मतलब यह नहीं होता है कि इंस्पेक्टर ने रिश्वत की मांग नहीं की और रिश्वत स्वीकार नहीं की। भ्रष्टाचार अधिनियम की धारा 7 के तहत प्रमाणित हुआ है कि इंस्पेक्टर बलजीत सिंह ने रिश्वत की मांग की थी और रिश्वत की रकम को स्वीकार किया था। जॉइंट कमिश्नर को दोष मुक्त कर दिया गया है इसलिए इंस्पेक्टर बलजीत सिंह को भी दोष मुक्त कर दिया जाए, ऐसा नहीं हो सकता।

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