भोपाल समाचार, 5 मार्च 2026: मध्य प्रदेश के सरकारी कर्मचारियों को होली के पहले गुड न्यूज़ मिली थी। सरकार ने महंगाई भत्ता बढ़ा दिया था, लेकिन अब प्रोबेशन पीरियड वाले कर्मचारियों के लिए बुरी खबर है। हाई कोर्ट के आदेश के बाद भी सरकार ने 100% वेतन नहीं देने का मन बना लिया है। सरकार के पास एरियर के रूप में 400 करोड़ का पेमेंट करने के लिए पैसा ही नहीं है। इसलिए सरकार ने फाइनल किया कि मामले को सुप्रीम कोर्ट ले जाया जाएगा।
कमलनाथ हैं, इस टंटे की जड़
कमलनाथ सिर्फ 15 महीने मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। उन्होंने नियम बना दिया कि नवनियुक्त कर्मचारियों को पूरा वेतन नहीं दिया जाएगा। 3 साल के प्रोबेशन पीरियड में पहले साल 70%, दूसरे साल 80% और तीसरे साल 90% वेतन दिया जाएगा। सर्विस कंफर्म हो जाने के बाद 100% वेतन मिलेगा। इस प्रकार कर्मचारियों को पूर्व की तुलना में नुकसान होना शुरू हो गया। इसके बाद मध्य प्रदेश में सत्ता परिवर्तन हुआ। श्री शिवराज सिंह चौहान मुख्यमंत्री बने लेकिन वह मामलों को टालने में काफी माहिर हैं। उन्होंने इस मामले में कोई फैसला नहीं लिया। नतीजा, कर्मचारी सरकार के खिलाफ हाईकोर्ट चले गए।
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने क्या डिसीजन दिया था
कर्मचारियों की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए, जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस दीपक खोत की डिवीजन बेंच ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया। हाईकोर्ट ने प्रोबेशन पीरियड में सरकारी कर्मचारियों का वेतन कम देने के नियम को न केवल गलत, बल्कि भेदभावपूर्ण और नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ माना।
कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में स्पष्ट रूप से कहा-
जब कर्मचारियों से पूरा काम लिया जा रहा है, तो उन्हें पूरा वेतन भी मिलना चाहिए।
इस फैसले का सबसे मजबूत आधार प्रदेश में एक ही पद के लिए दो अलग-अलग नियमों का होना भी था। परिपत्र में मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग (MPPSC) से नियुक्त कर्मचारियों और कर्मचारी चयन मंडल से भर्ती कर्मचारियों के लिए अलग-अलग नियम बनाए गए थे।
MPPSC से चयनित कर्मचारियों के लिए प्रोबेशन पीरियड केवल 2 साल का था और उन्हें पहले साल से ही पूरा वेतन दिया जा रहा था। वहीं, कर्मचारी चयन मंडल से भर्ती कर्मचारियों को 4 साल के प्रोबेशन और कटौती वाले वेतन का सामना करना पड़ रहा था। हाईकोर्ट ने इसे समानता के अधिकार का खुला उल्लंघन माना और 12 दिसंबर 2019 के परिपत्र को तत्काल प्रभाव से निरस्त कर दिया।
सरकार सुप्रीम कोर्ट में किस आधार पर जाएगी
हाई कोर्ट के इस आदेश के खिलाफ सरकार के पास सुप्रीम कोर्ट जाने का काफी स्ट्रांग पॉइंट है। वह कह सकती है कि एमपीपीएससी और कर्मचारी चयन मंडल भोपाल द्वारा आयोजित भर्ती परीक्षा में अंतर होता है।
MPPSC में प्रारंभिक परीक्षा, मुख्य परीक्षा और इंटरव्यू इस प्रकार तीन चरण होते हैं।
MPESB द्वारा आयोजित परीक्षा में केवल लिखित परीक्षा होती है। और रिजल्ट के आधार पर नियुक्ति मिल जाती है।
सीधी सरल बात है कि डिप्टी कलेक्टर और पटवारी में अंतर होता है। दोनों के लिए एक नियम लागू नहीं कर सकते।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला कुछ भी हो लेकिन इस ग्राउंड पर सरकार को तत्काल राहत मिल जाएगी। हाईकोर्ट के आदेश का पालन नहीं करना पड़ेगा और 400 करोड रूपए बच जाएंगे। दरअसल, समस्या 100% वेतन देने की नहीं है बल्कि पुराने बकाया के भुगतान की है। 400 करोड रुपए खर्च होंगे, बजट डिस्टर्ब होगा और इसके बदले में वोट भी नहीं मिलेंगे।

.webp)