नई दिल्ली, 9 मार्च 2026 : कक्षा 10 में 92% लकार अपने स्कूल का टॉपर और कक्षा 12 की परीक्षा से पहले IIT-JEE एडवांस्ड परीक्षा पास कर लेने वाले स्टूडेंट का, परीक्षा में एक जरा सी गलती के कारण करियर बर्बाद हो गया। उसके ऊपर 2 साल का प्रतिबंध लगा दिया गया है। इसका मतलब हुआ कि, IIT-JEE एडवांस्ड परीक्षा पास करने का उसको कोई लाभ नहीं मिलेगा। क्योंकि, अगले 2 साल तक वह 12वीं पास नहीं कर पाएगा और उसको कॉलेज में एडमिशन ही नहीं मिलेगा।
घटना का विवरण:
सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत हुआ यह मामला बेंगलुरु के एक प्रतिशत प्राइवेट स्कूल में पढ़ने वाले 12वीं कक्षा के विद्यार्थी से संबंधित है। चीफ जस्टिस विभु बाखरू और जस्टिस सी.एम. पूनाचा की खंडपीठ ने फैसला सुनाया। घटना 17 फरवरी, 2025 की है, जब विद्यार्थी अपनी फिजिकल एजुकेशन की बोर्ड परीक्षा देने श्री राम ग्लोबल स्कूल, बोम्मेनहल्ली (परीक्षा केंद्र) पहुँचा था। परीक्षा शुरू होने के मात्र 25 मिनट बाद, निरीक्षक (Invigilator) ने उसकी जेब में एक मोबाइल फोन देखा। फोन को तुरंत जब्त कर लिया गया। हालांकि, छात्र को एक नया प्रश्न पत्र और उत्तर पुस्तिका देकर परीक्षा पूरी करने दी गई और उसे बाद की अन्य परीक्षाओं में बैठने की अनुमति भी मिली।
CBSE की जांच और कठोर दंड:
परीक्षाओं के बाद, 9 अप्रैल 2025 को एक जांच समिति गठित की गई। जांच में पाया गया कि हालांकि मोबाइल में परीक्षा से संबंधित कोई आपत्तिजनक सामग्री नहीं थी और छात्र ने नकल के लिए इसका उपयोग नहीं किया था, लेकिन मोबाइल रखना ही नियमों का उल्लंघन था। CBSE ने अपनी नई गाइडलाइंस (20 जनवरी 2025) के तहत इसे 'Category-3' (अनफेयर मीन्स - UFM) का मामला माना और विद्यार्थी की वर्तमान परीक्षा के साथ-साथ अगले वर्ष की परीक्षा को भी रद्द कर दिया।
कानूनी लड़ाई: दोनों पक्षों के तर्क
छात्र का पक्ष: विद्यार्थी के वकील ने तर्क दिया कि वह एक मेधावी छात्र है, जिसने 10वीं में 92% अंक प्राप्त किए थे और IIT-JEE एडवांस्ड परीक्षा भी पास कर ली है। उसका कहना था कि वह देरी से केंद्र पहुँचा था और हड़बड़ी में गलती से मोबाइल जेब में ही रह गया। उन्होंने 'शुचि मिश्रा बनाम भारत सरकार' मामले का हवाला देते हुए 'संदेह का लाभ' (Benefit of Doubt) देने की मांग की।
CBSE का पक्ष: बोर्ड ने दलील दी कि मोबाइल एक इलेक्ट्रॉनिक उपकरण है जिससे पेपर लीक होने या परीक्षा में गड़बड़ी का उच्च जोखिम रहता है। बोर्ड के अनुसार, जून 2024 की गवर्निंग बॉडी मीटिंग में नियमों में संशोधन किया गया था, जिसमें मोबाइल रखने को गंभीर श्रेणी (Category-3) में रखा गया है, चाहे उसका उपयोग किया गया हो या नहीं।
न्यायालय का फैसला और न्यायाधीश की टिप्पणी:
इससे पहले एक एकल न्यायाधीश ने छात्र के पक्ष में फैसला सुनाया था, जिसे CBSE ने इस अपील (WA No. 1532 of 2025) के माध्यम से चुनौती दी थी। सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि:
- जब CBSE जैसी विशेषज्ञ संस्था ने नियमों को सोच-समझकर संशोधित किया है, तो कोर्ट को उसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
- अदालत ने कहा कि शुचि मिश्रा का मामला 2024 के नए नियमों से पहले का था, इसलिए इस मामले में उसे आधार नहीं बनाया जा सकता।
- जस्टिस पूनाचा ने उल्लेख किया कि नियमों के अनुसार, परीक्षा केंद्र में मोबाइल लेकर प्रवेश करना ही दंड के लिए पर्याप्त है।
Dream of IIT in Trouble: IIT-JEE Advanced Qualifier Faces Career Setback Over Small Mistake
निष्कर्ष: अदालत ने एकल न्यायाधीश के आदेश को दरकिनार करते हुए CBSE की अपील स्वीकार कर ली। इस फैसले से यह साफ हो गया है कि परीक्षाओं में अनुशासन और तकनीक के दुरुपयोग को रोकने के लिए बनाए गए नियमों का पालन अनिवार्य है, चाहे छात्र कितना भी मेधावी क्यों न हो।
विशेष जानकारी: रिपोर्ट के अनुसार, छात्र ने अपनी सफाई में कहा था कि तलाशी (frisking) के दौरान भी मोबाइल को नहीं पकड़ा गया और तलाशी करने वाले अधिकारी की लापरवाही के कारण उसकी एक सामान्य गलती, अपराध की श्रेणी में आ गई। इस काम के लिए उसको नहीं बल्कि तलाशी लेने वाले अधिकारी को दंडित किया जाना चाहिए। लेकिन कोर्ट ने इस तर्क को दंड से बचने के लिए पर्याप्त नहीं माना।

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