कांग्रेस के LLB प्रदेश अध्यक्ष ने जातिवाद की राजनीति में हाई कोर्ट को भी घसीट लिया

Updesh Awasthee
भोपाल, 10 मार्च 2026
: कांग्रेस पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष श्री जीतू पटवारी ने जातिवाद की राजनीति में हाई कोर्ट को भी घसीट लिया है। जबकि उन्होंने खुद कानून की पढ़ाई की है। उनकी घोषणा के अनुसार उनके पास BA-LLB की डिग्री है। उनको मालूम है कि हाईकोर्ट के निर्णय से यदि कोई असंतुष्ट है तो प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं करता बल्कि सुप्रीम कोर्ट में अपील करता है। जबकि श्री पटवारी ने मामले को आदिवासी जाति से जोड़ दिया। हम इस न्यूज़ आर्टिकल में आपको बताएंगे कि किस प्रकार से कानून का पालन हुआ और किस प्रकार से कानून का उल्लंघन किया जा रहा है:- 

कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी का आपत्तिजनक बयान

कांग्रेस पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष श्री जीतू पटवारी (LLB) ने आज प्रेस कांफ्रेंस आयोजित करके कहा कि, एक आदिवासी व्यक्ति, क्राइम क्या छुपाया, आपस में तू-तू में-में हुई थी, वह इंगित नहीं किया गया। बेसिक ऐसा कोई क्रीम नहीं था, जिससे अपराध छुपाने से चुनाव पर प्रभाव पड़ता। फिर भी चुनाव शून्य घोषित किया जा सकता था लेकिन एक हारे हुए प्रत्याशी को फिर से विधायक घोषित कर देना, न्यायपालिका पर बहुत बड़ा प्रश्न चिन्ह खड़ा करता है। 

जीतू पटवारी के बयान का पोस्टमार्टम

हाईकोर्ट में चुनाव याचिका दाखिल की गई थी। इसके तहत हारे हुए प्रत्याशी श्री रामनिवास रावत ने बताया था कि, श्री मुकेश मल्होत्रा के खिलाफ छह आपराधिक मामले दर्ज हैं जबकि उन्होंने अपने घोषणा पत्र में सिर्फ दो आपराधिक मामलों का विवरण प्रस्तुत किया है। सवाल तो बनता है कि जब कांग्रेस पार्टी के शासनकाल में बनाए गए लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के तहत सभी अपराधों की घोषणा करना अनिवार्य है, तो फिर मुकेश मल्होत्रा को सभी अपराधों की जानकारी देने में क्या आपत्ती थी। पैदल चलने वाला व्यक्ति यदि गलती करे तो उसके पैर में मोच आई है लेकिन यदि फ्लाइट उड़ने वाला पायलट गलती करे तो कई लोगों की जान चली जाती है। माननीय विधायक जैसे महत्वपूर्ण पद पर चुनाव लड़ने से पहले कानून का पालन करने में क्या प्रॉब्लम थी। 

अब कानून की बात

लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 84 के तहत यदि चुनाव याचिका दाखिल करने वाला प्रत्याशी यह कहता है कि, यदि निर्वाचित विधायक अपने घोषणा पत्र में जानकारी को नहीं छुपाता तो उसको मिलने वाले वोट की संख्या कम हो जाती, और याचिका दाखिल करने वाला प्रत्याशी जीत जाता। 

यदि निर्वाचित विधायक का वकील, न्यायालय में इस दावे का खंडन नहीं कर पता है, तो न्यायालय को धारा 101 के तहत हारे हुए प्रत्याशी को विजेता घोषित करना पड़ता है। श्री जीतू पटवारी को कोर्ट में कैसे हार गए अपने नेता मुकेश मल्होत्रा से बात करनी चाहिए कि उन्होंने कोर्ट में इस दावे का खंडन क्यों नहीं किया।

इसका संबंध कानून से है जो संसद द्वारा बनाया गया है। हाईकोर्ट ने अपनी तरफ से कुछ नहीं किया। यह कानून उस समय बनाया गया जब संसद में कांग्रेस पार्टी के सांसदों की संख्या सबसे ज्यादा थी। यानी यदि पॉलिटिकल स्टेटमेंट देना हो तो, इस बात को ऐसे कहा जाएगा - "यह कानून कांग्रेस ने बनाया है"। यदि श्री जीतू पटवारी को इस कानून से कोई आपत्ति है तो वह अपने नेता राहुल गांधी को कहें कि वह इस कानून के खिलाफ संसद में आवाज़ उठाएं और संशोधन करवाएंगे। कांग्रेस पार्टी द्वारा बनाए गए कानून में हाई कोर्ट को यह अधिकार नहीं दिया गया है कि वह, दर्ज किए गए अपराध की समीक्षा करे। कानून में केवल इतना लिखा है कि यदि किसी प्रत्याशी ने जानकारी छुपी तो उसे अयोग्य घोषित कर दिया जाए। 

जीतू पटवारी क्या इस मामले को भी न्यायपालिका पर प्रश्न चिन्ह बताएंगे? 

गुजरात की धोलका विधानसभा सीट से भूपेंद्र सिंह चूडासमा (भाजपा नेता) चुनाव जीत गए थे। उनके सामने चुनाव हारने वाले कांग्रेस के प्रत्याशी ने गुजरात हाईकोर्ट में चुनाव याचिका दाखिल की। हाई कोर्ट ने न केवल चुनाव शून्य घोषित किया बल्कि चुनाव हारने वाले कांग्रेस के प्रत्याशी को विजेता घोषित किया। बिल्कुल वैसे ही जैसे विजयपुर में किया गया है।

हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ प्रेस कॉन्फ्रेंस, न्यायालय की अवमानना है

यहां एक बात और स्पष्ट कर देना चाहिए कि, हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ किसी भी प्रकार की प्रेस कॉन्फ्रेंस करना अथवा किसी भी माध्यम से कोई भी बयान जारी करना, न्यायालय की अवमानना की श्रेणी में आता है। यदि कोई व्यक्ति हाई कोर्ट के फैसले से संतुष्ट नहीं है तो वह सुप्रीम कोर्ट में अपील कर सकता है, बयान बाजी नहीं कर सकता। पॉलिटिकल मामलों में, जनता को बताना जरूरी होता है तो केवल इतना बताया जाता है कि हम अपील करने जा रहे हैं।
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