SUPREME COURT ने चुनाव में SC ST को आरक्षण देने से इनकार किया, अंबेडकर एडवोकेट्स एसोसिएशन की याचिका खारिज

Updesh Awasthee
नई दिल्ली, 22 जनवरी 2026
: सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के वकीलों को आरक्षण देने से इनकार कर दिया है। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि जब तक संसद, कानून में संशोधन नहीं कर देती तब तक न्यायालय इस बारे में कोई आदेश जारी नहीं कर सकता है। यह मामला राज्य बार काउंसिलों और भारतीय बार काउंसिल (BCI) से संबंधित है। 

यूनिवर्सल डॉ. अंबेडकर एडवोकेट्स एसोसिएशन बनाम भारत संघ 

यह मामला 'यूनिवर्सल डॉ. अंबेडकर एडवोकेट्स एसोसिएशन बनाम भारत संघ' (W.P.(C) No. 6/2026) के रूप में सामने आया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति विपुल पंचोली की खंडपीठ ने इस याचिका पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि बार काउंसिल में आरक्षण का प्रावधान केवल कानूनी संशोधन (statutory amendment) के माध्यम से ही किया जा सकता है।

याचिकाकर्ता की प्रमुख मांगें:
याचिकाकर्ता यूनिवर्सल डॉ. अंबेडकर एडवोकेट्स एसोसिएशन ने एडवोकेट्स एक्ट, 1961 की धारा 3(2)(b) के तहत 'आनुपातिक प्रतिनिधित्व' की व्याख्या इस तरह करने की मांग की थी कि इसमें अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य हाशिए के समुदायों का प्रतिनिधित्व शामिल हो।

• वैकल्पिक तौर पर, उन्होंने मांग की थी कि जब तक उचित कानून नहीं बन जाता, तब तक इन समुदायों के लिए सीटें आरक्षित की जाएं या 'को-ऑप्शन' (सह-चयन) और पंजीकरण शुल्क में कटौती जैसे उपाय अपनाए जाएं।

अदालत की महत्वपूर्ण टिप्पणियां और बयान: सुनवाई के दौरान जब याचिकाकर्ता की वकील वरिष्ठ अधिवक्ता एन.एस. नप्पिनई ने महिलाओं और दिव्यांगों के लिए पिछले फैसलों का हवाला दिया, तो पीठ ने कड़ा रुख अपनाया।

1. कानूनी बाधा और मैंडेमस: अदालत ने कहा, “यह विवाद का विषय नहीं है कि ऐसा आरक्षण केवल कानून में संशोधन के माध्यम से ही प्रदान किया जा सकता है। स्पष्ट प्रावधान के अभाव में हम 'मैंडेमस' (mandamus) जारी करने में कठिनाई महसूस कर रहे हैं।”
2. आम सहमति बनाम कानून: महिला वकीलों के साथ समानता के तर्क पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने टिप्पणी की, “बड़ी मुश्किल से हम ऐसा माहौल बना पाए हैं जहाँ महिला वकीलों के लिए आम सहमति बनी है, अन्यथा पूरा कानूनी जगत...।” उन्होंने जोर दिया कि SC/ST आरक्षण के लिए संसद द्वारा एडवोकेट्स एक्ट में व्यापक संशोधन की आवश्यकता होगी।
3. वक्त की कमी: सीजेआई ने यह भी कहा कि इस चरण पर निर्देश देना "बहुत देर" (too late) हो चुका है, क्योंकि कई राज्यों में बार काउंसिल के चुनाव प्रक्रिया में हैं। 

वर्तमान स्थिति और भविष्य का रास्ता: अदालत ने अपने आदेश में दर्ज किया कि तेलंगाना बार काउंसिल और भारतीय बार काउंसिल पहले ही इस मामले को सक्षम अधिकारियों के पास ले जा चुके हैं और यह मुद्दा 'सक्रिय विचाराधीन' (active consideration) है। 

अंत में, अदालत ने याचिकाकर्ता को यह स्वतंत्रता दी है कि वे उचित उपचार के लिए सक्षम प्राधिकारी से संपर्क कर सकते हैं। साथ ही, सीजेआई ने स्पष्ट किया कि यदि भविष्य में उपयुक्त संशोधन नहीं किए जाते हैं, तो याचिकाकर्ता उचित समय पर पुनः अदालत का दरवाजा खटखटा सकते हैं।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले ने गेंद अब संसद और बार काउंसिल के पाले में डाल दी है। अब देखना यह होगा कि क्या विधायिका एडवोकेट्स एक्ट में संशोधन कर इस सामाजिक प्रतिनिधित्व की मांग को पूरा करती है या नहीं। रिपोर्ट: विधि संवाददाता
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