Madhya Pradesh में पेंशनर्स के 16 साल से चल रहे विवाद में हाई कोर्ट का बड़ा फैसला

Updesh Awasthee
जबलपुर, 29 जनवरी 2026
: मध्य प्रदेश शासन के रिटायर्ड कर्मचारियों की पेंशन से संबंधित एक विवाद में हाई कोर्ट आफ मध्य प्रदेश द्वारा बड़ा फैसला दिया है। यह विवाद 2009 से शुरू हुआ था, 16 साल बाद फैसला हो पाया है। न्यायालय ने पहले भी निर्णय दे दिया था लेकिन सरकार को मंजूर नहीं था इसलिए मध्य प्रदेश शासन की ओर से अपील की गई थी। निर्णय माननीय न्यायमूर्ति विवेक रूसिया और माननीय न्यायमूर्ति हिमांशु जोशी की खंडपीठ द्वारा दिया गया है। इस समाचार में विवाद का कारण, वकीलों के तर्क और न्यायालय का निर्णय सहित पूरी जानकारी दी गई है। 

वृद्धा पेंशन की पेंशन निर्धारण संबंधी विवाद क्या है

मध्य प्रदेश शासन के विवाद वित्त विभाग के सर्कुलर दिनांक 03.08.2009 की व्याख्या को लेकर था। मध्य प्रदेश में सेवानिवृत्त कर्मचारियों को 80 वर्ष की आयु प्राप्त करने पर मिलने वाली 20% अतिरिक्त पेंशन की पात्रता दी गई है। सर्कुलर जारी करने वाले अधिकारी ने अपने कर्तव्य का पालन नहीं किया। इसके कारण सर्कुलर के दो अर्थ निकल गए और विवाद उपस्थित हो गया। पेंशनभोगियों का तर्क था कि 79 वर्ष पूरे करने के बाद, जैसे ही वे 80वें वर्ष में प्रवेश करते हैं (अर्थात 80वें जन्मदिन पर), वे 20% अतिरिक्त पेंशन के पात्र हो जाते हैं। इसके विपरीत, राज्य सरकार का कहना था कि अतिरिक्त पेंशन केवल 80 वर्ष की आयु पूरी करने के बाद (अर्थात 81वें वर्ष की शुरुआत से) देय होती है। 

मध्य प्रदेश राज्य सरकार के तर्क 

उप महाधिवक्ता ने तर्क दिया कि "80 वर्ष की आयु प्राप्त करना" का अर्थ 80 वर्ष की पूर्णता है, न कि केवल 80वें वर्ष में प्रवेश। उन्होंने तर्क दिया कि यदि 'प्रवेश' को ही पात्रता माना गया, तो सरकारी कर्मचारियों को 60 वर्ष की आयु पूरी करने से पहले ही सेवानिवृत्त करना होगा। उन्होंने 2011 और 2025 के स्पष्टीकरणों का भी हवाला दिया। 

पेंशनभोगियों के तर्क: 

अधिवक्ता श्रीमती सलोनी अग्निहोत्री और श्री मनीष यादव ने तर्क दिया कि पेंशनभोगी 80वें जन्मदिन पर 79 वर्ष पूरे कर लेता है और 80वें वर्ष में प्रवेश करता है, इसलिए "80 वर्ष से" शब्द का अर्थ उसी तिथि से होना चाहिए। उन्होंने गौहाटी उच्च न्यायालय (वीरेंद्र दत्त ज्ञानी मामला) और सर्वोच्च न्यायालय के कुछ निर्णयों का हवाला दिया जिसमें आयु-आधारित लाभों की उदार व्याख्या की गई थी। 

न्यायालय की महत्वपूर्ण टिप्पणी

न्यायालय ने टिप्पणी की कि जिस 'वीरेंद्र दत्त ज्ञानी' मामले का हवाला दिया जा रहा है, वह उस समय के कानून पर आधारित था जिसे बाद में केंद्र सरकार ने संशोधित कर स्पष्ट कर दिया है। न्यायालय ने यह भी कहा कि आयु की गणना में "80 वर्ष पूरे करना" एक अनिवार्य शर्त है। 

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का लैंडमार्क जजमेंट

20% और 30% की अतिरिक्त पेंशन क्रमशः 80 वर्ष और 85 वर्ष की आयु पूरी करने के बाद ही देय है, उससे पहले नहीं। विद्वान एकल न्यायाधीश द्वारा पेंशनभोगियों के पक्ष में दिए गए पिछले आदेशों को रद्द कर दिया गया और पेंशनभोगियों की मूल रिट याचिकाओं को खारिज कर दिया गया।

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि पात्रता उस महीने के अगले महीने से शुरू होगी जिसमें निर्धारित आयु पूरी की गई हो। यह निर्णय केंद्र सरकार के नियमों के अनुरूप लिया गया है जो 80 वर्ष पूर्ण होने पर ही अतिरिक्त लाभ प्रदान करते हैं।

निष्कर्ष: सर्कुलर राइटिंग कितना गंभीर विषय है 

यह मामला स्पष्ट करता है कि सर्कुलर राइटिंग बेहद गंभीर विषय है। एक शब्द की गलती कानूनी विवाद उपस्थित कर देती है। यदि सर्कुलर में "80 वर्ष की आयु प्राप्त करना" के स्थान पर 80 वर्ष की आयु पूरी करना और 81 में वर्ष में प्रवेश करना" लिखा होता तो विवाद की स्थिति नहीं बनती। न्यायालय की समक्ष जो विवाद प्रस्तुत हुआ था उसका न्याय हाईकोर्ट द्वारा कर दिया गया है लेकिन मध्य प्रदेश शासन को उस अधिकारी को भी दंडित करना चाहिए, जिसने दो अर्थ वाला सर्कुलर जारी करके विवाद पैदा कर दिया। 
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