BHOPAL की जनता का कलेक्टर पर से विश्वास उठता जा रहा है

भोपाल, 7 जनवरी 2026
: भारत में कलेक्टर की वैसे तो कोई ड्यूटी नहीं लगाई जाती लेकिन मध्य प्रदेश में जनसुनवाई और टाइम लिमिट की मीटिंग, इन दोनों को कलेक्टर की ड्यूटी माना जाता है। भोपाल के कलेक्टर श्री कौशलेंद्र विक्रम सिंह, अपनी ड्यूटी नहीं निभा रहे हैं। नतीजा भोपाल की जनता का कलेक्टर पर से विश्वास उठता जा रहा है। 

लोग 9-9 महीने से कलेक्ट्रेट के चक्कर लगा रहे हैं

आज प्रख्यात पत्रकार श्री अली अख्तर की एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई है जिसमें उन्होंने बताया है कि लोग 9-9 महीने से कलेक्ट्रेट के चक्कर लगा रहे हैं लेकिन उनकी प्रॉब्लम सॉल्व नहीं हो रही है। उनकी शिकायतों को धमकी देकर बंद करवाया जा रहा है। खास तौर पर सीवेज, पाइपलाइन और बिजली के संबंध में शिकायत करने वालों के साथ ऐसा हो रहा है। श्री अख्तर ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि, हर मंगलवार को कलेक्टोरेट में होने वाली जनसुनवाई महज खानापूर्ति बन गई है। यहां शिकायतें दर्ज तो हो रही हैं, लेकिन समाधान के बिना ही बंद कर दी जा रही हैं। स्थिति यह है कि एक ही समस्या के लिए लोगों को कई-कई बार जनसुनवाई में आना पड़ रहा है।

भोपाल में जनसुनवाई यानी ऑफलाइन सीएम हेल्पलाइन

मध्य प्रदेश में जनसुनवाई की मूल अवधारणा यह है कि कलेक्टर स्वयं सभी विभागों के प्रमुख अधिकारियों को साथ लेकर बैठेंगे और जहां तक संभव होगा समस्याओं का तत्काल समाधान किया जाएगा। भोपाल में ऐसा कुछ नहीं होता। यहां पर जनसुनवाई का मतलब है ऑफलाइन सीएम हेल्पलाइन। पब्लिक जाकर अपना आवेदन देती है, पब्लिक के आवेदन को सीएम हेल्पलाइन में अपलोड कर दिया जाता है। बाकी सारा काम वैसा ही होता है जैसा सीएम हेल्पलाइन की शिकायतों के मामले में होता है। यह शिकायत कलेक्टर ने अपलोड करवाई है, इस बात का भी प्रिविलेज नहीं मिलता।

रहवासी मोहल्लों की सीवेज समस्या, आवासीय क्षेत्रों में पानी की पाइपलाइन टूटने, सड़क निर्माण में देरी, बिजली बिलों की गलत वसूली और सरकारी योजनाओं में पेंडिंग फाइल जैसी शिकायतें महीनों से लंबित हैं। शिकायतकर्ता बताते हैं कि वे हर मंगलवार कलेक्टोरेट पहुंचते हैं, लेकिन सिर्फ आश्वासन लेकर लौटना पड़ता है। उनकी समस्या का समाधान नहीं होता है। 

कौशलेंद्र विक्रम सिंह तो साप्ताहिक समीक्षा बैठक भी नहीं लेते

भारतीय प्रशासनिक सेवा के धुरंधर अधिकारी श्री कौशलेंद्र विक्रम सिंह तो साप्ताहिक समीक्षा बैठक भी नहीं लेते। भोपाल का कलेक्टर होने के नाते यह उनकी ड्यूटी है कि वह सप्ताह में एक बार सभी अधिकारियों को बुलाकर समीक्षा करें और अगले सप्ताह के लिए टारगेट सेट करें। सिस्टम ऐसे ही चलता है लेकिन भोपाल में साप्ताहिक समीक्षा बैठक के लिए जिला पंचायत की मुख्य कार्यपालन अधिकारी को अधिकृत कर दिया जाता है। साल 2025 की 52 साप्ताहिक टाइम लिमिट की मीटिंग के फोटो वीडियो देख लीजिए। कलेक्टर की खाली कुर्सी सबसे ज्यादा दिखाई देगी। 
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