बेलेम की गर्म हवा में इस हफ्ते वादे-वादे की बारिश हो रही है। हर देश चिल्ला रहा, "अरे, हमारा नेट-ज़ीरो तो फिक्स्ड, बस थोड़ा टाइम दो!" लेकिन एक रिपोर्ट आई है, जो सीधा दिल पर चाकू चला दिया। सब जानते हैं, पर आंखें बंद करके मजे ले रहे हैं।
दुनिया को बचाना है तो 1 बिलियन हेक्टेयर ज़मीन चाहिए
यूनिवर्सिटी ऑफ मेलबर्न वाले भाईयों ने Land Gap Report 2025 निकाली, जो चिल्ला रही: दुनिया भर के देश उत्सर्जन काटने की बजाय "ज़मीन पर जुगाड़" लगाए बैठे हैं। मतलब, पुराने जंगल बचाओ मत, नए पेड़ लगाओ, बायो-एनर्जी से सब सॉल्व हो जाएगा। रिपोर्ट बोलती है, अगर ये प्लान्स रियल में चलाने हैं, तो दुनिया को 1 बिलियन हेक्टेयर ज़मीन चाहिए, यानी पूरा ऑस्ट्रेलिया। लेकिन भाई, ये ज़मीन कहां से लाएंगे? जवाब साफ: सबसे पहले आदिवासियों, छोटे किसानों और लोकल कम्युनिटी की रोटी पर लात मारेगी। अरे, ये तो फुल अनफेयर गेम हो गया!
जंगल बचाओ या जुगाड़ लगाओ? रिपोर्ट ने खोला राज़
रिपोर्ट दो बड़े होल्स पॉइंट आउट कर रही: "लैंड गैप" और "फॉरेस्ट गैप"। पहला होल – देश ज़मीन से कार्बन सोखने के सपने देख रहे, लेकिन रियल लाइफ में ये हो ही नहीं सकता। दूसरा – COP28 दुबई वाले जंगल बचाने के वादे? वो तो प्लान्स से गायब हो गए।
अगर pledges ऐसे ही चले, तो 2030 तक हर साल 4 मिलियन हेक्टेयर जंगल साफ! और 16 मिलियन हेक्टेयर ज़मीन बर्बाद, टोटल 20 मिलियन हेक्टेयर का "फॉरेस्ट गैप"।
कर्ज़ का जाल, टैक्स का खेल, ट्रेड का धंधा: असली विलेन कौन?
रिपोर्ट कहती, जंगल न बचने का बहाना "फंडिंग कम है" नहीं, असली गड़बड़ वैश्विक इकॉनमी का सिस्टम है, जो डेवलपमेंट और एनवायरनमेंट को एक-दूसरे से लड़वा देता। रिसर्चर केट डूली बोलतीं, "भारी कर्ज़ और इंडस्ट्री-फ्रेंडली पॉलिसीज़ देशों को मजबूर करतीं कि जंगल बेचो, इकॉनमी बचाओ। लेकिन लॉन्ग रन में वही जंगल इकॉनमी की जान बचाते हैं।"
कैमरून देख लो – IMF के प्रेशर में लकड़ी, कोको, कॉटन बढ़ाओ की शर्तों ने 20 साल में जंगलों का सत्यानाश कर दिया। रिपोर्ट चिल्लाती: डेब्ट रिलीफ रिफॉर्म्स फटाफट लाओ, तो देश जंगलों को ब्रिद लगने देंगे।
टैक्स पर भी फुल अटैक – इल्लीगल फाइनेंशियल फ्लो और क्रॉस-बॉर्डर टैक्स एवेजन डेवलपिंग कंट्रीज़ से बिलियन्स उड़ा ले जा रहे, जो एनवायरनमेंट पर लग सकते थे। ब्राज़ील का वेल्थ टैक्स आइडिया? वो तो हर साल 200-500 बिलियन डॉलर जुटा सकता।
ट्रेड रूल्स पर तो रिपोर्ट ने तड़का लगा दिया। अभी तो सिर्फ इल्लीगल टिंबर रोकने तक सीमित, लेकिन रियल प्रॉब्लम "लीगल" फार्मिंग और माइनिंग है, जो जंगल निगल रही। सॉल्यूशन? ट्रेड पॉलिसीज़ को कमोडिटी ट्रेडर्स से हटाओ, छोटे किसानों और सस्टेनेबल फूड सिस्टम्स पर फोकस करो।
सिग्नल क्लियर: जंगल गए, तो नेट-ज़ीरो भी गया
रिपोर्ट की को-ऑथर केट हॉर्नर वार्निंग देतीं, "अगर क्लाइमेट क्राइसिस पर रियल प्रोग्रेस चाहिए, तो पहले वो इकॉनमिक स्ट्रक्चर चेंज करो जो ब्लॉक कर रहा। मुश्किल है, लेकिन इम्पॉसिबल नहीं, यार।"
क्लाइमेट स्टोरी का बॉटमलाइन
COP30 की बहसों के बीच Land Gap Report 2025 एक मिरर है, जो दिखा रहा: जलवायु वादे सिर्फ पेड़ लगाने से नहीं चलेंगे। डेब्ट के बोझ तले दबे देशों को डेवलपमेंट vs जंगल का चॉइस न दो। रियल डील ये – डेवलपमेंट और एनवायरनमेंट एक ही कॉइन के दो साइड। जब तक दुनिया ये कबूल न करे, कोई COP हमें उस फ्यूचर तक नहीं ले जाएगा, जहां धरती फ्री ब्रिद ले सके।
रिपोर्ट: निशांत सक्सेना, संपादन: उपदेश अवस्थी।

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