AIIMS BHOPAL मध्य प्रदेश के हर ब्लॉक में कैंसर प्राथमिक केंद्र और जिले में कीमोथेरेपी सेंटर

Bhopal Samachar
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All India Institute of Medical Sciences Bhopal के डॉक्टरों की यह टीम नहीं टाटा मेमोरियल के साथ मिलकर पहले मध्य प्रदेश और फिर पूरे देश में कैंसर के इलाज के लिए बड़ा नेटवर्क तैयार करने का काम शुरू कर दिया है। मध्य प्रदेश के प्रत्येक ब्लॉक में कैंसर प्राथमिक केंद्र खोले जाएंगे। प्रत्येक जिले में कीमोथेरेपी की सुविधा होगी। जहां कैंसर के मरीजों की संख्या ज्यादा होगी वहां पर एपेक्स सेंटर खोले जाएंगे और मध्य प्रदेश के 6 बड़े शहरों में टर्शियरी सेंटर शुरू किए जाएंगे। 

मध्य प्रदेश के 70% कैंसर मरीजों को उनके घर के आसपास इलाज मिलेगा

एम्स के डॉक्टरों के मुताबिक देश में 70% कैंसर के मरीज गांव और छोटे शहरों में रहते हैं, लेकिन इलाज की 95% सुविधाएं बड़े शहरों तक सीमित है। करीब 80% मरीजों में कैंसर तब पकड़ में आता है, जब वह गंभीर हो चुका होता है। इस असमानता को दूर करने के लिए एम्स भोपाल के डॉ. शशांक बंसल, डॉ. अंकित जैन, डॉ. सैकत दास और डॉ. केतन मेहरा ने देश के अन्य संस्थानों के साथ मिलकर यह मॉडल बनाया है। इस पर देश में सबसे पहले एम्स भोपाल में काम हो रहा है। एम्स भोपाल-टाटा मे​मोरियल के साथ इसका एपेक्स सेंटर बनाकर पूरे प्रदेश में इसका संचालन करेगा। यह सेंटर हर​ जिला मुख्यालय में बनाए जाएंगे। इसके लिए डॉक्टरों की ट्रेनिंग भी होगी। गांवों में भी प्राथमिक कैंसर केंद्र बनेंगे।

इलाज की चार स्तरों में व्यवस्था 

एपेक्स सेंटर : एम्स या टाटा मेमोरियल जैसे अस्पताल। यहां जटिल सर्जरी, जेनेटिक टेस्टिंग, रिसर्च और डॉक्टरों की ट्रेनिंग होगी।
हब (टर्शियरी सेंटर) : टियर-2 शहरों में होंगे, जहां बड़ी सर्जरी, रेडियोथेरेपी, कीमोथेरेपी और आईसीयू सुविधा मिलेगी।
जिला स्तरीय केंद्र : जांच, सामान्य सर्जरी, कीमोथेरेपी और पल्लियेटिव केयर उपलब्ध होगा।
प्राथमिक कैंसर केंद्र : स्क्रीनिंग, जनजागरूकता, बेसिक जांच और शुरुआती इलाज।

भारत के हर 10 में व्यक्ति को कैंसर का खतरा

भारत में हर 9 में से 1 व्यक्ति को जीवन में कैंसर हो सकता है। तंबाकू और धुएं के कारण गांवों में कैंसर के मामले ज्यादा हैं। सरकारी बजट का सिर्फ 2% हिस्सा कैंसर पर खर्च होता है। छोटे शहरों में जागरूकता, जांच और इलाज की स्थिति कमजोर है। स्थानीय डॉक्टर अक्सर कैंसर पहचान नहीं पाते और जब तक जांच होती है, 70% मरीज आखिरी स्टेज में पहुंच जाते हैं। 

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