PM REPORT - भाजपा विधायक चिंतामणि मालवीय ने विधानसभा में हंगामा क्यों किया, पढ़िए

Bhopal Samachar
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मध्य प्रदेश की विधानसभा में 18 मार्च मंगलवार को उज्जैन जिले की आलोट विधानसभा से भाजपा विधायक चिंतामणि मालवीय ने अचानक हंगामा कर डाला। जो बात मुख्यमंत्री, प्रदेश अध्यक्ष, संगठन महामंत्री, अमित शाह और राष्ट्रीय अध्यक्ष के कान में कही जानी चाहिए थी, उस बात को विधानसभा में उठाकर मुद्दा बना दिया। आइए भाजपा विधायक श्री चिंतामणि मालवीय द्वारा विधानसभा में उठाए गए मुद्दे का पोस्टमार्टम करके देखते हैं, इसके अंदर क्या है। 

MLA चिंतामणि मालवीय ने विधानसभा में कौन सा मुद्दा उठाया

आलोट विधानसभा के विधायक श्री चिंतामणि मालवीय ने विधानसभा में बजट पर बोलते हुए कहा- उज्जैन का किसान बहुत डरा और परेशान है। क्योंकि, सिंहस्थ के नाम पर उसकी जमीन पहले केवल 3-6 महीनों के लिए अधिग्रहित की जाती थी लेकिन आज उन्हें स्थायी अधिग्रहण का नोटिस दिया गया है। पता नहीं किस अधिकारी ने यह विचार रखा है कि, स्पिरिचुअल सिटी (आध्यात्मिक नगरी) बनाएंगे। मैं बताना चाहता हूं कि स्प्रिचुअलिटी किसी सिटी में नहीं रहती है। सिंहस्थ का मुख्य विचार ही तंबू में है। क्या हम 4 हजार हेक्टेयर भूमि में कंक्रीट के भवन बनायेंगे? जिन्होंने सब कुछ त्याग दिया है, संयास ग्रहण कर लिया है, घर-परिवार-पैसा-संपत्ति त्याग दी, उनको आप भवनों में बिठाने का काम कर रहे हैं, मुझे लगता है कि यह बहुत गलत हो जायेगा। 

चिंतामणि मालवीय का कांग्रेस ने भी समर्थन नहीं किया

इस बीच तराना विधानसभा से कांग्रेस पार्टी के विधायक महेश परमार ने डॉ चिंतामणि मालवीय को यह मुद्दा उठाने के लिए धन्यवाद दिया और कांग्रेस पार्टी के विधायक श्री सतीश सिकरवार और अनिल जैन से अपील की कि वह इस मुद्दे पर डॉक्टर चिंतामणि मालवीय का समर्थन करें, लेकिन कांग्रेस के दोनों विधायकों ने डॉ मालवीय का समर्थन नहीं किया। यह देखकर कांग्रेस विधायक महेश परमार भी अपनी सीट पर बैठ गए। 

विधानसभा में स्थानीय विधायक ने जवाब दिया

इस मुद्दे पर विधानसभा में उज्जैन उत्तर के विधायक श्री अनिल जैन कालूहेड़ा ने जवाब दिया। उज्जैन सिंहस्थ का आयोजन इसी विधानसभा क्षेत्र में होता है। इसी विधानसभा क्षेत्र में परमानेंट कंस्ट्रक्शन की प्लानिंग की जा रही है। उज्जैन की स्पिरिचुअल सिटी भी इसी विधानसभा क्षेत्र में बनेंगी। श्री अनिल जैन ने बताया कि, 2016 में उज्जैन में तूफान और बाढ़ आई थी। आग लग गई थी। उस दौरान पंडालों के अंदर न फायर ब्रिगेड पहुंच पाई, न एम्बुलेंस पहुंच पाई थी। उज्जैन में 2016 में त्राहिमाम हो गया था। बाढ़, आंधी, तूफान के बीच पूरे उज्जैन की जनता पंडालों में जाकर सेवा के काम करना चाहती थी। लोगों को पंडालों में भोजन देने, जिनके कपड़े गीले हो गए थे, उनको कपडे़ देने, उज्जैन का पूरा समाज आगे आया था, लेकिन पंडालों तक पहुंच नहीं पा रहा था। क्योंकि, अत्यधिक बारिश, कच्ची सड़क होने की वजह से, वहां किसी तरह के वाहन की सुविधा नहीं थी। इसलिए हमारी सरकार ने फैसला लिया है कि सभी पंडालों तक एप्रोच रोड बनाई जाए। 

प्राचीन काल में तंबू नहीं होते थे तब साधु संत कहां निवास करते थे

विधानसभा में हंगामा करने वाले भाजपा विधायक डॉ चिंतामणि मालवीय ने जोर देकर कहा था कि, "सिंहस्थ का मुख्य विचार ही तंबू में है।" हमने इस मुख्य विचार पर रिसर्च की है। यह रिसर्च इसलिए की क्योंकि भारत में तंबू तो मुगलों के साथ आए थे। मुगल शासन काल से पहले जब उज्जैन में सिंहस्थ आयोजन होता था। तब साधु संत कहां रहते थे। एक प्राचीन पुस्तक के अध्याय "उज्जैन सिंहस्थ: प्राचीन साधु आवास" में हमें मिला कि, हजारों सालों तक आम जनता को इसके बारे में पता ही नहीं था। केवल सिद्ध साधु ही शिप्रा नदी के किनारे आया करते थे। 

तो क्या डॉ मालवीय झूठ बोल रहे हैं

डॉ मालवीय जिस सिंहस्थ की बात कर रहे हैं। उसका प्रारंभ मराठा शासक छत्रपति शाहूजी महाराज के प्रतिनिधि राणोजी शिंदे ने किया था। डॉ मालवीय को याद ही होगा कि, बाजीराव पेशवा जब उत्तर की विजय से वापस लौट रहे थे, तब उन्हें पता चला कि मुगलों ने यहां पर एक प्राचीन शिव मंदिर (महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग) को तोड़ दिया है परंतु ज्योतिर्लिंग अभी भी सुरक्षित है। बाजीराव पेशवा ने युद्ध में सेना के लिए पड़ाव और ठहराव के काम के लिए विशेषज्ञ राणोजी शिंदे को प्राचीन मंदिर के जीर्णोद्धार के लिए उज्जैन में छोड़ दिया था। उन्होंने ही नासिक महाराष्ट्र जाकर, वहां आने वाले तपस्वियों को उज्जैन के लिए आमंत्रित किया था। वह ऋषिकेश या प्रयागराज जाकर भी साधुओं को आमंत्रित कर सकते थे परंतु उन्हें इसके बारे में शायद पता ही नहीं था। मराठा होने के कारण अपने क्षेत्र के बारे में उन्हें ज्यादा जानकारी थी। यह उज्जैन के धार्मिक वैभव को वापस लाने के अभियान का प्रथम चरण था। उस समय राणोजी के पास अत्यधिक धन नहीं था और फिर वह स्वयं विशेषज्ञ थे। बाजीराव पेशवा की सेना तंबू में ही ठहराव करती थी। इसलिए उन्होंने आमंत्रित तपस्वियों के विश्राम के लिए तंबू लगाए। यह पहली बार था जब उज्जैन में मेले का आयोजन किया गया। इससे पहले तक उज्जैन सिंहस्थ केवल शैव संप्रदाय के साधुओं का स्नान का पर्व था।

उज्जैन सिंहस्थ: प्राचीन साधु आवास

ताम्रपाषाण काल में शिप्रा नदी के किनारे परिष्कृत शहरी नियोजन, पक्की ईंटों के घर, विस्तृत जल निकासी व्यवस्था और संभावित रूप से बड़े गैर-आवासीय भवन जैसे अन्न भंडार और सार्वजनिक स्नानघर थे। हालाँकि, प्रदान किए गए अंशों में महलों या मंदिरों का कोई निर्णायक प्रमाण नहीं है। अर्थात जब उज्जैन में भव्य मंदिर नहीं था तब शिप्रा नदी में स्नान के लिए आने वाले साधु संतों की सेवा हेतु परमानेंट इंफ्रास्ट्रक्चर था। उज्जैन एक जीवित प्राचीन शहर है। यहां पुराना इंफ्रास्ट्रक्चर टूटा गया और नया बनता गया। इसलिए पुराने इंफ्रास्ट्रक्चर की अवशेष नहीं मिलते। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसा कुरुक्षेत्र में महाभारत के युद्ध के अवशेष नहीं मिलते। या फिर हल्दीघाटी में हल्दीघाटी के युद्ध की अवशेष नहीं मिलते।

संत परंपरा में अखाड़ा शब्द का क्या तात्पर्य होता है

उज्जैन सिंहस्थ अथवा किसी भी कुंभ मेला में "अखाड़ा" शब्द का प्रयोग किया जाता है। प्राचीन काल में "अखाड़ा" का तात्पर्य एक ऐसा परमानेंट इंफ्रास्ट्रक्चर जिसमें साधु संप्रदाय सामूहिक निवास करता है। यह परमानेंट इंफ्रास्ट्रक्चर साधुओं को और तपस्वियों को प्राकृतिक प्रभाव से बचाता है। उज्जैन सिंहस्थ के दौरान शिप्रा नदी के किनारे अखाड़े की प्राचीन परंपरा है। रानो जी शिंदे के पास बजट कम था, शायद समय भी कम था, और फिर उस समय उन्हें भी नहीं पता था कि वह यहां पर परमानेंट रहेंगे। इसलिए बाजीराव पेशवा के आदेश का न्यूनतम खर्च में पालन किया जा रहा था। 

कुछ बातें डॉ मालवीय के बारे में

विधानसभा में डॉ मालवीय ने बड़ा आकर्षण भाषण दिया। उन्होंने कुछ ऐसे शब्द रहे जो हेडलाइंस बन गए, लेकिन डॉ मालवीय का भाषण उनके भूगोल और इतिहास से मैच नहीं करता है। नेताओं की पोल खोलने के लिए आजकल सुर्खियों में चल रहे एलन मस्क के AI Grok 3 ने बताया कि, चुनावी हलफनामे में उनके ऊपर जानकारी छुपाने का आरोप लगा था। उनके स्थानीय विरोधी उनके ऊपर सत्ता का दुरुपयोग करने और सरकारी योजनाओं में पक्षपात करने का आरोप लगाते हैं। कहा जाता है कि वह किसी भी सरकारी योजना का लाभ केवल अपने और अपने समर्थकों के बीच में रखने की कोशिश करते हैं। उनकी अपनी विधानसभा में जमीन आदि को लेकर कई किसानों से उनका विरोध चल रहा है। डॉ मालवीय अक्सर तीखी बयान बाजी के लिए जाने जाते हैं परंतु उनके बयान दबाव बनाने के लिए होते हैं। पूर्व में उन्हें कांग्रेस के नेताओं के खिलाफ जितने भी खुलासे किए थे, किसी में भी कोई कानूनी कार्रवाई नहीं हुई। 

conclusion

इस पोस्टमार्टम रिपोर्ट का निष्कर्ष यह है कि उज्जैन सिंहस्थ की पहचान तंबू नहीं है, अखाड़े हैं। राणोजी शिंदे ने नदी में सन्यासी साधुओं के स्नान के पर्व को कुंभ मेला में परिवर्तित किया था। उनके बाद मध्य प्रदेश में स्थापित हुई सरकारों ने कुंभ मेला को भव्य रूप दिया। वर्तमान की डॉ मोहन यादव सरकार अखाड़े के अस्तित्व को वापस स्थापित करने की कोशिश कर रही है। ऐतिहासिक रूप से इसमें कुछ भी आपत्तिजनक नहीं है। वैसे भी उज्जैन भारत के सात प्राचीन और पवित्र शहरों में से एक है। यह कोई सामान्य शहर नहीं है। महाकाल के मंदिर तक पहुंचने के लिए रास्तों का चौड़ीकरण करना पड़ता है या फिर अखाड़े के लिए कुछ किसानों की जमीनों का अधिग्रहण करना पड़ता है, तो यह अत्याचार नहीं है बल्कि व्यवस्था है। 

जहां तक डॉ मालवीय का सवाल है तो वह प्रेशर पॉलिटिक्स करते रहे। शायद यही कारण है कि जो बात उन्हें पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के साथ डिस्कस करनी चाहिए थी। उसे उन्होंने विधानसभा में उठाया। ताकि प्रेशर क्रिएट हो जाए। ✒ उपदेश अवस्थी

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