भारत का मूलमंत्र दुनिया की समझ में आ रहा है - My Blog by Dr Raghvendra Sharma

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अयोध्या के श्री राम मंदिर निर्माण और श्री रामलला की मूर्तियों के प्राण प्रतिष्ठा समारोह ने दुनिया भर में आस्था एवं उमंग का वातावरण निर्मित कर दिया है। देश-विदेश के न्यूज़ एंड एंटरटेनमेंट चैनल राम मंदिर की भव्यता और दिव्यता पर चर्चा कर रहे हैं। जब बात राम मंदिर की चल रही है तो फिर रामराज का विषय भी चर्चाओं का केंद्र बन चुका है। भारत के भीतरी क्षेत्रों में ही नहीं अपितु बाहर भी शोध हो रहे हैं, कि रामराज कैसा था। क्यों भारत में बार-बार आदर्श राजसत्ता के रूप में रामराज का उदाहरण प्रस्तुत किया जाता है। क्यों भारत की और उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकारों ने अयोध्या के पुनर्निर्माण में अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। 

विश्व बिरादरी भी अयोध्या तथा राम मंदिर पर टकटकी लगाए हुए है

इन सभी परिदृष्यों का अवलोकन करने के पश्चात विश्व भर के लोग यह मानने लगे हैं कि भारतीयों के मन में समानता, सदाचार, परोपकार, क्षमा और सहयोग जैसे सकारात्मक मूल्यों का भाव रामराज में व्याप्त आचार व्यवहार से ही पल्लवित हुआ है। अतः यह माना जा सकता है कि विश्व भर में रहने वाले सनातनी तो राम मंदिर को श्रद्धा और विश्वास के साथ निहार ही रहे हैं, इससे बढ़कर बात यह है कि विभिन्न धर्मों, मतों, संप्रदायों की विश्व बिरादरी भी अयोध्या तथा राम मंदिर पर टकटकी लगाए हुए है। 

ऐसे शुभ प्रसंग के बीच इस प्रकार का आचरण मन को व्यथित करता है

यहां एक बात का उल्लेख करना आवश्यक प्रतीत होता है, वह यह कि कांग्रेस एवं उसके सहयोगी दलों ने श्री रामलला की मूर्तियों के प्राण प्रतिष्ठा समारोह को लेकर नकारात्मक रवैया अपना रखा है। यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण एवं अफसोस की बात है। 22 जनवरी को प्रस्तावित प्राण प्रतिष्ठा समारोह के अलावा हर स्थान और विषय के लिए इन राजनीतिक दलों तथा उनके नेतृत्वकर्ताओं के पास पर्याप्त समय है लेकिन अयोध्या जाने को लेकर ये सभी लोग घोषित तौर पर अस्पृश्यता का भाव बनाए हुए हैं। ऐसे शुभ प्रसंग के बीच राजनेताओं का इस प्रकार का आचरण मन को व्यथित करता है। जबकि देश भर में उक्त उत्सव को लेकर भारी उत्साह और उमंग का वातावरण निर्मित है। कोई गांव, कस्बा, नगर, जिला अथवा राज्य ऐसा शेष नहीं, जहां अयोध्या स्थित श्री राम मंदिर के उद्घाटन समारोह को लेकर धार्मिक अनुष्ठान और सामाजिक समारोह आयोजित ना हो रहे हों। इन्हें देखकर कहीं भी ऐसा लगता है क्या, कि अयोध्या में होने जा रहे महा उत्सव केवल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, भारतीय जनता पार्टी अथवा विश्व हिंदू परिषद के ही हैं। 

अयोध्या के पुनरुद्धार और श्री राम मंदिर निर्माण का श्रेय

यह बात और है कि उपरोक्त संगठन अपने प्रादुर्भाव काल से ही हिंदू एवं हिंदुत्व के लिए संघर्ष करते आए हैं। चूंकि केंद्र और उत्तर प्रदेश में सरकारें भी भारतीय जनता पार्टी की ही हैं, तो उनके द्वारा राम मंदिर एवं अयोध्या के पुनरुद्धार में बढ़-चढ़कर सहयोग किया जाना स्वाभाविक ही है। ऐसे में यदि जनसाधारण ही अयोध्या के पुनरुद्धार और श्री राम मंदिर निर्माण का श्रेय भारतीय जनता पार्टी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिंदू परिषद को देता दिखाई दे रहा है तो इसमें गलत भी क्या है? जो जैसा करता है वह वैसा ही पाता है। यदि जनता जनार्दन राष्ट्रीय स्तर पर संघ, भाजपा और विहित को अपना स्नेह और आशीर्वाद प्रदान कर रहे हैं तो यह इन संगठनों के सदाचार और सदकृत्यों का ही प्रतिफल है। 

महात्मा गांधी के स्वप्न को संघ सरकार कर रहा है 

स्मरण रहे कि एक समय महात्मा गांधी रामराज की स्थापना को लेकर पहल किया करते थे। वे सदैव कहते रहे कि रामराज की परिकल्पना ही इस देश को एकरूपता और सदाशयता के भाव में बांधकर रख सकती है। वर्तमान में उक्त स्वप्न को साकार करने का कार्य राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संरक्षण में भारतीय जनता पार्टी की नरेंद्र मोदी सरकार करती दिखाई दे रही है। लेकिन सपना तो हमारे पूर्वजों का ही साकार हो रहा है ना! और फिर श्री राम तो हैं ही संपूर्ण सनातन के। फिर क्या भाजपा और क्या कांग्रेस? सभी को बढ़-चढ़कर श्री रामलला की मूर्तियों के प्राण प्रतिष्ठा समारोह में भाग लेना चाहिए। 

यह इसलिए भी आवश्यक है, क्योंकि विश्व की आशा भरी निगाहें भारतीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी में नेतृत्व की संभावनाएं तलाश रही हैं। और ज्यादा स्पष्ट करके लिखा जाए तो यह सम्मान केवल नरेंद्र मोदी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अथवा विश्व हिंदू परिषद का न होकर समूचे भारत का ही है। यह भी ध्यान देने योग्य तथ्य है कि एकमात्र भारत देश ही है, जिसकी वर्तमान नरेंद्र मोदी सरकार समूचे विश्व में रामराज की कल्पना को साथ लेकर सब का साथ, सबका विकास और सब का विश्वास की बात कर रही है। 

जहां तक रामराज की बात है तो कौन नहीं जानता कि यही वह राज्य सत्ता व्यवस्था है जिसकी सकारात्मक विचारधारा के चलते किष्किंधा और लंका को जीता तो जाता है। वहां के अतिवादी शासको का नाश भी किया जाता है। फिर भी उन देशों अथवा राज्यों पर श्री राम अथवा उनके शासकीय सूत्र कब्जा नहीं करते। बल्कि वहां की सत्ता के सूत्र उस देश के नैसर्गिक उत्तराधिकारियों को ही सहर्ष सौंप देते हैं। 

यानि रामराज की संकल्पना है कि विश्व को जीतो, मगर अस्त्रों - शस्त्रों की बजाय प्यार से। साथ में यह संदेश भी राम मंदिर निर्माण और रामराज की स्थापना में निहित है कि देश के भीतर और बाहर अथवा पड़ोस में, जहां पर भी लोग अतताइयों अर्थात आतंकवादियों, विस्तार वादियों से परेशान है, वहां न्यायोचित दखल दिया जाए और वैश्विक जनमानस को राक्षसी प्रवृत्तियों से मुक्ति दिलाकर सत्ता के सूत्र वहीं के योग्य देशवासियों को सौंप दिए जाएं। इसी को कहते हैं वसुधैव कुटुंबकम अर्थात समस्त विश्व एक परिवार का भाव। बड़े ही संतोष की बात है कि भारत का यह मूलमंत्र दुनिया की समझ में आ रहा है। यही वजह है कि सनातनियों के साथ ही पूरा विश्व अयोध्या के पुनरुद्धार और रामलला के भव्य मंदिर के उद्घाटन समारोह को निसंदेह प्रशंसात्मक दृष्टि से निहार रहा है। तो फिर हम सभी भारतवंशियों का दायित्व बन जाता है कि हम इस महा उत्सव के प्रति सकारात्मक आचरण अपनाएं। ताकि समूचे विश्व को यह संदेश दिया जा सके कि रामराज की संकल्पना विश्व में साकार हो, इस भाव में समूचा भारत भारतीयता और सनातन धर्म एक है। 

विश्व के कोने-कोने में बसे सभी भारतवंशियों और सनातन धर्मियों को अयोध्या स्थित श्री राम मंदिर के भव्य निर्माण, श्री राम लाल की दिव्यतम मूर्तियों के प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव एवं पावन अयोध्या नगरी के पुनः प्रकटीकरण की अनेक अनेक बधाइयां। 
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