श्री हरसिद्धि परवरिया माता मन्दिर की कथा - dharti-Ke-Rang

मध्यप्रदेश में श्री हरसिद्धि माता मंदिर तरावली, उज्जैन एवं रायसेन में स्थित है। विदिशा और रायसेन के लोग माँ हरसिद्धि माता को अपनी कुलदेवी के रूप में पूजते हैं। इस कारण यहाँ के लोगों के लिए यह विशेष आस्था का केंद्र है। ऐसी मान्यता चली आ रही है कि यदि कोई हिंदू परिवार का सदस्य हरसिद्धि माता का प्रसाद ग्रहण कर लेता है तो उसे हर साल देवी के दर्शन करने अपने परिवार सहित यहाँ आकर दरबार में पूजा अर्चना कर प्रसाद चढ़ाना पड़ता है। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है।

रायसेन से करीब 14 किलोमीटर दूर परवरिया गांव में माँ हरसिद्धि माता के दरबार है। कहा जाता है कि उज्जैन के राजा विक्रमादित्य अपने वाहनों के कारवां के साथ बैलगाड़ी से हरसिद्धि माता की प्रतिमा लेकर जा रहे थे। विदिशा से होकर जैसे ही उनके वाहनों का कारवां रायसेन जिले के परवरिया गांव पहुंचा तो एक किले के नजदीक नीम के पेड़ के नीचे हरसिद्धि माता की प्रतिमाएं लेकर वे रुक गए। सुबह जब रवाना होने लगे तो बैल गाड़ी के पहिये की धुरी टूट गयी। जिसे बदलने के बाद बैलगाड़ी चलाई तो बैलगाड़ी पलट गयी। जिसके कारण राजा विक्रमादित्य ने माता हरसिद्धि की तीन पिंडी रूपी प्रतिमाएं वहीं चबूतरे पर धार्मिक विधि-विधान, हवन पूजन कर विराजित कर दी।

बस तभी से यह मंदिर प्रसिद्ध होता चला गया। यहाँ हर साल नवरात्रि वार्षिक महिला भी लगता है। जो करीब एक महीने तक चलता है और जिसे देखने विदिशा, रायसेन, भोपाल, सीहोर से लोग परिवार सहित माता के दरबार में पहुँचकर पूजा अर्चना करते हैं। कई लोग तो मंदिर परिसर में ही दाल-बाटी और लड्डू चूरमा का प्रसाद तैयार करके माता को भोग भी लगाते हैं। इस मंदिर की खास बात यह है कि मंदिर परिसर में बाटियाँ सेंकने के लिए एक अलग ही स्थान बना हुआ है जहाँ जाकर सभी श्रद्धालु अपनी बाटियाँ सेक लेते हैं।