MP NEWS- महिला को शिक्षक नहीं बनने दिया, हाईकोर्ट में 3 बार जीती

इंदौर।
यह मामला प्रशासनिक हठधर्मिता का उदाहरण बन गया। 34 साल की महिला 56 साल की उम्र तक न्याय के लिए लड़ती रही। हाईकोर्ट ने तीन बार उसके हक में फैसला दिया परंतु सरकार ने उसे संविदा शिक्षक के पद पर नियुक्ति नहीं दी। तीसरी बार केस हारने के बाद भी सरकार ने हाईकोर्ट में कहां की नियुक्ति नहीं दी जा सकती और हाईकोर्ट को मानना पड़ा। 

हाई कोर्ट के एडवोकेट आनंद अग्रवाल ने बताया कि सन 1993 में मध्य प्रदेश सरकार ने औपचारिक शिक्षण केंद्र स्थापित किए थे। इन्हीं केंद्रों में शिक्षकों की नियुक्तियां की गई थी। याचिकाकर्ता स्मिता श्रीवास्तव भी प्रशिक्षक के पद पर नियुक्त की गई थी। सन 1999 में शासन ने सभी केंद्रों को बंद कर दिया और प्रशिक्षकों को संविदा शाला शिक्षक वर्ग 3 के पद पर प्राथमिकता से नियुक्त किया गया। 

कर्मचारियों के समायोजन के समय स्मिता श्रीवास्तव की उम्र 34 साल थी। संविदा शिक्षक बनने के लिए परीक्षा पास करना अनिवार्य था। स्मिता ने परीक्षा पास कर ली लेकिन शासन ने उन्हें संविदा शिक्षक के पद पर नियुक्त नहीं किया। 2014 में सिंगल बेंच 2016 में कोर्ट की डबल बेंच ने स्मिता को नियुक्ति देने के आदेश दिए परंतु आदेश का पालन नहीं किया गया। 2017 में फिर से संविदा शिक्षक भर्ती हुई। हाईकोर्ट में फिर से नियुक्ति के आदेश दिए लेकिन शासन ने स्मिता को नियुक्ति नहीं दी। आदेश के खिलाफ अपील कर दी। 

इस पूरी प्रक्रिया के दौरान 34 साल की स्मिता श्रीवास्तव की उम्र 56 साल हो गई। हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने शासन की अपील को खारिज कर दिया लेकिन मध्यप्रदेश में संविदा शाला शिक्षक के पद समाप्त हो गए हैं इसलिए हाईकोर्ट ने शासन पर ₹100000 की कॉस्ट लगाई और नेगेटिव टिप्पणी के साथ प्रकरण का निराकरण कर दिया। मध्य प्रदेश की महत्वपूर्ण खबरों के लिए कृपया MP NEWS पर क्लिक करें.