शिकायतकर्ता की मृत्यु हो जाए तो क्या कोर्ट आरोपी को मुक्त कर देगा, जानिए - CrPC 1973 section 256

जब कोई व्यक्ति समन मामले में मजिस्ट्रेट के समक्ष परिवाद दायर करता है, मजिस्ट्रेट सुनवाई के लिए परिवादी को बुलवाता है। अगर परिवादी स्वयं उपस्थित न हो सके तो अपने स्थान और वकील की भेज सकता है या न आने का कोई कारण है तब मजिस्ट्रेट को लिखित में बता सकता है। बहुत से ऐसे मामले होते हैं जिसमे परिवादी की मृत्यु हो जाती है या कोई कारण जो भी हैं मजिस्ट्रेट को नहीं बताता है तब मजिस्ट्रेट क्या कार्यवाही करेगा जानिए।

दण्ड प्रक्रिया संहिता,1973 की धारा 256 की परिभाषा:-

अगर कोई परिवादी बिना उचित कारण के सुनवाई के समय उपस्थित नहीं होता है तब मजिस्ट्रेट आपने स्वयंविवेकानुसार निर्णय ले सकता है आरोपी को दोषमुक्त भी कर सकता है। अगर परिवादी उपस्थित न होने का कारण स्पष्ट करता है या वकील को सुनवाई के भेजता है तब मजिस्ट्रेट या तो सुनवाई कर सकता है या अगली तारीख तक सुनवाई स्थगित कर सकता है।

परिवादी (शिकायतकर्ता) की मृत्यु होने की दशा में कार्यवाही कैसे होगी:-

1. मुनिरूद्दीन अकण्ड बनाम कासमुद्दीन मुंशी:- उक्त वाद में यह अभिनिर्धारित हुआ कि यदि परिवादी का भाई जिसका हित मामले में उतना ही है जितना कि परिवादी का था, चाहे तो वह परिवादी की मृत्यु के मामले की सुनवाई अवस्था चालू रख सकता है।

2. चाँद देवी डागा बनाम मंजू के हुमतानी :- उक्त मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा यह अभिनिर्धारित किया गया कि उच्च न्यायालय के समस्त पिटीशन के लंबित रहने के दौरान परिवादी की मृत्यु हो जाने पर उनके विधिक उत्तराधिकारी अभियोजन चालू रख सकते हैं।

3. रशीदा कमालुद्दीन सैय्यद बनाम शेख साहेब लाल मरदान:- उक्त मामले में प्रत्यर्थी ने भारतीय दंड संहिता की धारा 406 एवं 420 के अंतर्गत एफआईआर की थी। अपराध विचारण के दौरान प्रत्यर्थी की मृत्यु हो गई मृतक के पुत्रों द्वारा अभियोजन को चालू रखने की अनुमति के प्रार्थना पत्र की स्वीकार कर दिया गया, आरोपी पक्ष द्वारा इसे चुनौती दी है इस पर सुप्रीम कोर्ट ने यह अभिनिर्धारित किया कि मृतक के पुत्रों को अभियोजन चालू रखने की अनुमति वैध एवं न्यायसंगत हैं एवं भारतीय संविधान के अनुच्छेद 136 के अधीन अनुमति प्रदान के आदेश में हस्तक्षेप करने की आवश्यकता नही है। 

अर्थात उपर्युक्त निर्णय से स्पष्ट होता है कि किसी भी मामले में परिवादी की मृत्यु होने पर उसका कोई भी उत्तराधिकारी सुनवाई को आगे बड़ा सकता है। Notice: this is the copyright protected post. do not try to copy of this article)

:- लेखक बी.आर. अहिरवार (पत्रकार एवं लॉ छात्र होशंगाबाद) 9827737665
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