भूखे पेट दिवाली मनाएंगे शिक्षा विभाग के 20 हजार आउटसोर्स कर्मचारी - Khula Khat

मध्यप्रदेश स्कूल शिक्षा विभाग में कार्यरत प्रदेश भर के लगभग 20 हजार आउटसोर्स कर्मचारी इस वर्ष सरकार की उपेक्षा के चलते भूखे पेट दिवाली मनाएंगे। कारण उन्हें पिछले 7 महीने से वेतन नहीं दिया गया है। एक तरफ मध्यप्रदेश सरकार नियमित कर्मचारियों को दिवाली उपहार के रूप में डीए की सौगात दे रही है तो वहीं अपने पेट में गठाने और बच्चों के अरमानों पर ताला लगाकर काम करने वाले कम्प्यूटर ऑपरेटर और सफाई कर्मचारियों को 7 महीने से वेतन न देकर उनका जबजस्त तरीके से शौषण कर रही है। 

सरकार की इस उपेक्षा से आउटसोर्स आधार पर काम करने वाले कर्मचारी हतास और निराश है तथा सरकार की भेद-भाव पूर्ण नीति को पानी पी पी कर कोश रहे हैं। अब हालात यह है कि जब पूरा देश दिवाली की खुशियां मनाएगा और अपने-अपने घरों को रंग-रोगन से सजाकर बच्चों के हाथों में उपहार व फुलझड़िया थमाएगा तब इन कर्मचारियों के बच्चे पड़ोस में रहने वाले बच्चों का कातर दृष्टि से सिर्फ मुह ताकेंगे और ललचाएंगे। 

ज्ञात हो कि मध्यप्रदेश स्कूल शिक्षा विभाग ने वर्ष 2017 में उन हाई स्कूल व हायर सेकेण्ड्री स्कूलों में आउटसोर्स आधार पर कम्प्यूटर ऑपरेटर/सहायक ग्रेड-3 व चौकीदार/सफाई कर्मचारी नियुक्त किए थे जिन स्कूलों का उन्नयन वर्ष 2012-13 के बाद किया गया था। स्कूल शिक्षा विभाग ने इन कर्मचारियों का जमकर दोहन किया। लेकिन कभी कलेक्टर दर पर मिलने वाली मामूली वेतन उन्हें समय पर नसीब नहीं हो सकी। पिछले डेढ़ साल से तो जैसे इन कर्मचारियों को सरकार ने रद्दी की टोकरी में ही डाल दिया है। अभी पिछला वेतन इन्हें मार्च माहिने में दिया गया था। तब से लेकर अब तक स्कूल शिक्षा विभाग ने मध्यप्रदेश के प्रत्येक जिले से बजट के लिए दर्जनों मांग पत्र बुलवाये, कई वीडियो कॉन्फ्रेसिंग में बजट पर चर्चा की पर नतीजा ढ़ाक के तीन पात निकला। 

जान जोखिम में डालकर किया काम

पिछले डेढ़ वर्षों में दो बार कोरोना का प्रकोप पीक पर पहुंचा। विभाग के नियमित कर्मचारियों ने इन सभी कम्प्यूटर ऑपरेटरों की जबरन ड्यूटियां कोविड सेंटरों से लेकर कोविड कॉल सेंटर और वैक्सिनेशन सेटरों तक पर लगाई। यह दिहाड़ी कर्मचारी अपनी जान जोखिम में डालकर पूरी ईमानदारी के साथ इस आशा को लेकर काम करते रहे कि उन्हें सरकार वेतन देगी, लेकिन सरकार ने इस जोखिम भरे काम के बदले उन्हेें सिर्फ प्रशंसा पत्र भेंट किये और 7 माह बीत जाने के बाद भी वेतन से मरहूम रखा। सवाल यह है कि इतनी बड़ी संख्या में कार्यरत कर्मचारियों के हितों के लिए न तो सत्ता पक्ष के जनप्रतिनिधियों ने आवाज उठाई और न विपक्ष ने इन कर्मचारियों का दर्द महसूश करने का प्रयास किया। ✒ विकास बाजपेई


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