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BHOPAL में "लोकरंग" शुरू, शिवपुरी की गीता देवी, धार के प्रताप सिंह टीम ने मन मोह लिया - MP NEWS

भोपाल.
मध्यप्रदेश शासन संस्कृति विभाग द्वारा रवींद्र भवन, भोपाल में आयोजित 'लोकरंग' उत्सव में दूसरे दिन सायं 5 बजे से होने वाली गतिविधि लोकराग में शिवपुरी, मध्यप्रदेश से पधारी सुश्री गीता देवी एवं साथियों द्वारा बुन्देली गायन की प्रस्तुति दी गयी जिसमें- आत्म निर्भर भारत खों बनाइनें, भारत महिमा गान- जौ भारत देश हमारो, जबावी लोकगीत, जीजा-साली और पति-पत्नी की हंसी मजाक एवं चौकड़िया- प्रेमी-प्रेमिका का प्रेम प्रसंग अपने चित परिचित अंदाज में प्रस्तुत किया। पश्चात् पश्चिम बंगाल से पधारे श्री बामा प्रसाद और साथियों ने बाउल गायन से दर्शकों को मंत्र मुग्ध कर दिया। 

प्रताप सिंह एवं साथी, धार द्वारा भील जनजाति के भगोरिया नृत्य

सायं 7 बजे से मुख्य मंच पर आयोजित गतिविधियों में- भीली कलाओं आधारित समवेत नृत्य प्रस्तुति हुई- जिसकी शुरुआत श्री प्रताप सिंह एवं साथी, धार द्वारा भील जनजाति के भगोरिया नृत्य से की गई, भगोरिया नृत्य में विविध पदचाप समूहन पाली, चक्रीपाली तथा पिरामिड नृत्य मुद्राएँ आकर्षण का केंद्र रहीं। श्री बनसिंह भाई चामायड़ा और साथी, गुजरात द्वारा राठवा जनजातीय नृत्य की प्रस्तुति दी गई, धान की कटाई के बाद पूर्वजों को जब धान अर्पित की जाती है और पूर्वजों के साथ देवी-देवताओं की पूजा होती है, तब इस नृत्य को किया जाता है। 

पश्चात् महाराष्ट्र से पधारे श्री अनिल कोलेकर और साथियों द्वारा धनगिरीगजा नृत्य की हुई, धनगरी गजा नृत्य महाराष्ट्र के प्रसिद्ध लोक नृत्यों में से एक है। यह नृत्य शोलापुर ज़िले की गडरिया जाति के लोगों द्वारा किया जाता है। इसी क्रम में सुश्री सोनवती मसराम और साथी, डिंडोरी द्वारा गोण्ड जनजातीय नृत्य सैला, श्री प्रकाश विष्ट एवं साथी, उत्तराखण्ड ने छपेली नृत्य की प्रस्तुति दी गई, छपेली नृत्य कुमाऊँ का पारम्परिक नृत्य है, इस नृत्य का आयोजन प्रायः ही मेलों, शादी-विवाहों और मांगलिक कार्यक्रमों में किया जाता है| यह प्रेम पूर्ण भावुक्ता की अभिव्यक्ति की सुन्दर लोक शैली है। श्री दादूलाल दांडोलिया एवं साथी, छिंदवाड़ा द्वारा भारिया जनजातीय के पारंपरिक नृत्य भड़म की हुई, भड़म- विवाह के अवसर पर किया जाने वाला यह समूह नृत्य भारियाओं का सर्वाधिक  प्रिय नृत्य है। इसमें ढोल, टिमकी और झाँझ मुख्य वाद्य यन्त्र होते हैं, टिमकी की संख्या ढोल से दोगुनी होती है। ढोल, टिमकी और झाँझ की समवेत ध्वनि दूर गरजने वाले बादलों की गंभीर घोष की तरह सुनाई देती है। थोड़े-थोड़े विश्राम के साथ यह नृत्य रात भर चलता है। 

श्री चंद्रमणि प्रधान एवं साथी, उड़ीसा द्वार गोटीपुआ नृत्य की प्रस्तुति हुई, कलाकारों द्वारा गुरुवन्दना से इस प्रस्तुति की शुरुआत की गई, यह नृत्य किशोर युवाओं द्वारा किया जाता है, इस नृत्य में कलाकार अलग-अलग आकृतियों के माध्यम से प्रस्तुति देते हैं। श्री दायाराम जांगड़े और साथी, छतीसगढ़ द्वारा पंथी नृत्य की प्रस्तुति हुई, पंथी नृत्य- छत्तीसगढ के सतनामी समुदाय का प्रमुख नृत्य है- इस नृत्य में एक मुख्य नर्तक होता है जो पहले गीत की कड़ी उठता है जिसे समूह के अन्य नर्तक दोहराते है एवं नाचते है। यह नृत्य धीमी गती के साथ सुरु होती हैए और गीत एवं मृदंग की लय के साथ गती बढ़ती है। यह वस्तुतः द्रुत गती का नृत्य है। 

श्री एच. तीर्थप्पा एवं साथी, कर्नाटक द्वारा ढोलूकुनीता नृत्य की प्रस्तुति हुई, डोलूकुनिता- नृत्यद्ध, कर्नाटक का एक प्रमुख लोकप्रिय ड्रम नृत्य है। गायन के साथ, यह कौशल की शानदार विविधता और जटिलता प्रदान करता है। बीरेश्वरा या बेरिलिंगेश्वर के पीठासीन देवता के चारों ओर बनाए मुख्य रूप से कर्नाटक के कुरुबा गोवदा द्वारा पूजा की जाती है। श्री शौकीन खान एवं साथी, राजस्थान द्वारा राजस्थान प्रसिद्द नृत्य भवई की प्रस्तुति दी गई। इस रंगारंग प्रस्तुति का समापन श्री दीपक अग्रवाल एवं साथी, उत्तप्रदेश के चरकुला नृत्य से हुआ, चरकुला नृत्य- होली या उसके दूसरे दिन रात्रि के समय गांवों में स्त्री या पुरुष स्त्री वेश धारण कर सिर पर मिट्टी के सात घड़े तथा उसके ऊपर जलता हुआ दीपक रखकर अनवरत रूप से चरकुला नृत्य करता है। और पुरुष नगाड़ों, ढप, ढोल, वादन के साथ रसिया गायन करते हैं।

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