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डिस्पोजल पेपर कप में चाय-कॉफी पीना चाहिए या नहीं, IIT खड़गपुर की रिसर्च रिपोर्ट पढ़िए

drink tea-Coffee in a disposable paper cup, right or wrong: Read the research report of IIT

नई दिल्ली। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी द्वारा प्लास्टिक के खिलाफ अभियान के शुरू करने के बाद से कागज के डिस्पोजल का काफी प्रचलन में है। कोरोनावायरस संक्रमण काल में लोग पेपर कप का उपयोग कर रहे हैं क्योंकि लोगों का मानना है कि यह यूज एंड थ्रो होते हैं, वायरस के ट्रांसफर होने का खतरा खत्म हो जाता है लेकिन भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT), खड़गपुर के एक ताजा अध्ययन कि निष्कर्ष कुछ और ही है। आइए पता लगाते हैं कागज के डिस्पोजल कप स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है या नहीं।

क्या आप जानते हैं, पेपर कप के अंदर प्लास्टिक या सह-पॉलिमर्स की परत होती है

पेपर कप में तरल पदार्थों को रोकने के लिए आमतौर पर जल-रोधी परत चढ़ायी जाती है। यह परत प्रायः प्लास्टिक या फिर सह-पॉलिमर्स से बनी होती है। जब कप में गर्म पेय पदार्थ डाले जाते हैं तो कप को बनाने में उपयोग की गई परत से सूक्ष्म प्लास्टिक कणों का क्षरण होता है, जो अंततः उस पेय पदार्थ में घुल जाते हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि सूक्ष्म प्लास्टिक कण आयन, विषाक्त भारी धातुओं – पैलेडियम, क्रोमियम, कैडमियम और अन्य जैविक तत्वों के वाहक के रूप में कार्य करते हैं।

क्या डिस्पोजल पेपर कप में गर्म चाय-कॉफी जहरीली हो जाती है

इस अध्ययन से पता चला है कि गर्म तरल पदार्थों के संपर्क में आने से 15 मिनट के भीतर सूक्ष्म प्लास्टिक कणों से बनी परत नष्ट हो जाती है। यह अध्ययन आईआईटी, खड़गपुर के सिविल इंजीनियरिंग विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर, डॉ सुधा गोयल के नेतृत्व में उनके शोध छात्रों वेद प्रकाश रंजन और अनुजा जोसेफ द्वारा किया गया है।यह अध्ययन शोध पत्रिका जर्नल ऑफ हैजार्ड्स मैटेरियल्स में प्रकाशित किया गया है।

कागज के एक डिस्पोजल कप में कितने खतरनाक माइक्रोन होते हैं

डॉ सुधा गोयल ने बताया कि “हमारे अध्ययन से पता चला है कि 15 मिनट तक पेपर कप में यदि 100 मिलिलीटर गर्म पेय पदार्थ (85-90 डिग्री सेल्सियस) रखा जाता है तो 25 हजार माइक्रोन (10 माइक्रोमीटर से 1000 माइक्रोमीटर) आकार के सूक्ष्म प्लास्टिक कण उत्सर्जित होते हैं। यदि कोई व्यक्ति दिन भर में पेपर कप में तीन बार गर्म पेय पीता है, तो वह करीब 75 हजार सूक्ष्म प्लास्टिक कणों को निगल रहा है। इन कणों की एक खास बात यह है कि ये नग्न आंखों से दिखाई नहीं देते।”

आईआईटी खड़कपुर में रिसर्च कैसे की गई
इस अध्ययन के दौरान शोधकर्ताओं ने प्लास्टिक कप में तरल पेय के उपयोग के कारण होने वाले हानिकारक सूक्ष्म कणों के रिसाव का अध्ययन दो तरीकों से किया है। सर्वप्रथम, 85-90 डिग्री सेल्सियस पर गर्म विशुद्ध पानी को पेपर कपों में डाला गया और फिर उन कपों में सूक्ष्म प्लास्टिक कणों एवं अन्य आयनों के रिसाव का अध्ययन किया गया है। 

दूसरी प्रक्रिया में, पेपर कपों को गुनगुने पानी (30-40 डिग्री सेल्सियस) में डाला गया और फिर जल-रोधी परत को सावधानीपूर्वक अलग कर लिया गया। अलग की गई प्लास्टिक परत को 85-90 डिग्री सेल्सियस पर गर्म विशुद्ध पानी के संपर्क में 15 मिनट तक रखा गया और फिर उसके भौतिक, रासायनिक एवं यांत्रिक गुणों का अध्ययन किया गया है। शोधकर्ताओं ने प्लास्टिक परत के गर्म पानी के संपर्क में आने से पहले और बाद, दोनों स्थितियों का अध्ययन किया है। 

मिट्टी के बर्तनों के उपयोग को लेकर पूछे गए एक सवाल के जवाब में आईआईटी, खड़गपुर के निदेशक प्रोफेसर वीरेंद्र कुमार तिवारी ने कहा है कि “जैविक रूप से हानिकारक उत्पादों के स्थान पर अन्य उत्पादों के उपयोग को प्रोत्साहित करने से पहले स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव के साथ-साथ उसके पर्यावरणीय पक्ष को ध्यान में रखा जाना आवश्यक है। ✒ (इंडिया साइंस वायर) ISW/USM/05/11/2020 


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