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केंद्र – राज्य सम्बन्ध : अब नई व्याख्या जरूरी - Pratidin

अब महाराष्ट्र सरकार ने भी दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना कानून के तहत बने प्रतिष्ठान सी बी आई को एक कानून के तहत राज्य में शक्तियों और न्यायक्षेत्र के इस्तेमाल की सहमति को वापस ले लिया है| अब सी बी आई को  महाराष्ट्र में किसी मामले की जांच के लिए राज्य सरकार की अनुमति लेनी होगी| पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान जैसे राज्य भी सी बी आई जांच को लेकर ऐसे ही फैसले ले चुके हैं| इन निर्णयों के प्रकाश में भारत संघ के ढांचे, राज्य केंद्र सम्बन्धों पर पुनर्विचार की आवश्यकता महसूस होने लगी है | वैसे आवश्यकता तो पिछले कई वर्षों से देश के संविधान के पुनर्लेखन की भी है,पर इस राष्ट्रीय महत्व के विषय पर विचार करने की किसी को फुर्सत नहीं है |

वैसे तो संविधान के अनुच्छेद 256-263 तक केंद्र तथा राज्यों के प्रशासनिक संबंधों की चर्चा की गई है। प्रशासनिक संबंधों से तात्पर्य केंद्र व राज्यों की सरकारों के कार्यपालिका संबंधी तालमेल से होता है।सामान्य रूप में संघ तथा राज्यों के बीच शक्तियों का विभाजन किया गया है, परंतु प्रशासनिक शक्तियों के विभाजन में संघीय सरकार अधिक शक्तिशाली है और राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए राज्य सरकार के प्रशासन पर संघ को पूर्ण नियंत्रण प्रदान किया गया है।केंद्र को यह अधिकार दिया गया है कि वह आवश्यकतानुसार कभी भी राज्यों को निर्देश दे सकता है।

संयुक्त राज्य अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के विपरीत भारत में शक्तियों का वितरण संविधान की सातवीं अनुसूची में वर्णित तीन सूचियों के तहत किया जाता है। शक्तियों के विभाजन का आधारभूत सिद्धांत यही माना जा सकता है कि जो विषय राष्ट्रीय महत्त्व के हैं उन पर कानून बनाने का अधिक केंद्र के पास है और जो विषय क्षेत्रीय महत्त्व के हैं उन पर कानून बनाने का अधिकार राज्य के पास है।इसके अलावा समवर्ती सूची में वे विषय शामिल हैं जिनमें केंद्र व राज्य दोनों की ही भागीदारी की आवश्यकता होती है। परंतु विवाद की स्थिति में केंद्र को प्रमुख माना जाएगा।इस प्रकार शक्तियों के बँटवारे के कई अन्य प्रावधान भी हैं जिनमें केंद्र को वरीयता दी गई है, जो कि राज्यों के मध्य केंद्रीकरण का भय उत्पन्न करता है।

महाराष्ट्र सरकार और केंद्र सरकार के प्रतिनिधि कहे जाने वाले राज्यपाल के बीच तनातनी किसी से छिपी नहीं है| भारत में प्रत्येक राज्य के लिये राज्यपाल का कार्यालय एक संवेदनशील मुद्दा रहा है, क्योंकि यह कभी-कभी भारतीय संघ के संघीय चरित्र के लिये खतरा बन जाता है। केंद्र द्वारा इस संवैधानिक कार्यालय के दुरुपयोग के आरोप लगते रहे है |जिस पर  देश में तीखी बहस और मतभेद विषय विषय भी बने रहे हैं ।

महाराष्ट्र सरकार ने यह फैसला तब लिया है, जब सी बी आई ने फर्जी टीआरपी मामले की जांच के लिए केस दर्ज किया है| इससे संबंधित शिकायत उत्तर प्रदेश में दर्ज कराई गई है| टीआरपी केस की जांच मुंबई पुलिस कर रही है| पांच  टीवी चैनलों के नाम सामने आ चुके हैं| इस मामले में अब तक 8 लोग गिरफ्तार किए जा चुके हैं| भारत सरकार का लक्ष्य देश को वित्तीय वर्ष 2024-25 तक 5 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था बनाना है, परंतु यह तब तक संभव नहीं होगा जब तक देश में केंद्र और राज्य साथ मिलकर कार्य नहीं करेंगे। कई बार केंद्र और राज्य दोनों के मध्य सुगम संबंध न बन पाने का एक प्रमुख कारण राजनीतिक मतभेद भी होता है|

भारत  के संविधान को बनाने वाली संविधान सभा ने एक समय सीमा के बाद नई संविधान सभा के गठन और समय समय पर संविधान की समीक्षा की बात कही थी, लेकिन रस्म अदायगी को छोड़ इस विषय पर कभी कोई गंभीर काम नहीं हुआ | अब राज्यों और केंद्र में अलग-अलग विचारों की सरकारें है और आगे भविष्य भी इस प्रकार की सरकारों  का दिखाई देता हैं | ऐसे में समय की मांग है कि भारत संघ और राज्य सरकारों के आपसी सम्बन्धों को पुनर्परिभाषित किया जाये | संविधान में कई विषय और अनुबंध भी अपने गुणधर्म बदल चुके है, उनको भी अध्यतन किया जाना ही देश हित है |
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श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।
संपर्क  9425022703        
rakeshdubeyrsa@gmail.com
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