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VIDEO बनाना छोड़ मेरी मदद के लिए दौड़ा, जान की बाजी लगाई और मुझे बचाया: गोल्डन गेट हादसा

इंदौर। अक्सर आपने ऐसी खबरें सुनी होगी कि जब हादसा होता है तो लोग वीडियो बनाने लगते हैं। वह पीड़ितों की मदद नहीं करते लेकिन इंदौर में गोल्डन गेट हादसे में इसका ठीक उल्टा हुआ है। एक युवक शरद कुमार जो हादसे का वीडियो बना रहा था जैसे ही उसने देखा कि एक व्यक्ति फंसा हुआ है, उसकी जान खतरे में है तो शरद ने वीडियो बनाना छोड़ उस व्यक्ति को हिम्मत बधाई क्या आप यहीं रुको मैं आता हूं। शरद ने अपनी जान जोखिम में डाली और उस व्यक्ति को बचाया। हम भोपाल समाचार की तरफ से शरद कुमार को बधाई देते हैं। हम एलान करते हैं कि शरद कुमार इंदौर का असली हीरो है।

मामला क्या है 

इंदौर के फाइव स्टार होटल गोल्डन गेट में अचानक आग लग गई थी। जिस समय यह हादसा हुआ होटल में कई यात्री मौजूद थे। लोग यहां वहां अपनी जान बचाने के लिए भाग रहे थे। होटल में एक निजी कंपनी के सीईओ दीपक बजाज भी थे। उन्होंने बताया कि सुबह मैं होटल में अपने कमरे में था, तभी कुछ लोग चिल्लाते हुए दौड़े कि अपना सामान पैक कर भागो। मैं समझ गया कि कोई हादसा हुआ है। मैंने चप्पल पहनी और छोटा बैग निकाला। कमरे से बाहर निकला तो हर तरफ धुआं था और लपटें भी आने लगी थीं। मैं सिक्योरिटी कंपनी में हूं और टीम को फायर से बचने की ट्रेनिंग भी देता हूं, इसलिए मैं ऊपर की तरफ भागा। चौथी मंजिल पर छत से झांका कि कैसे बचकर निकलूं। रोड पर दूसरी तरफ और आसपास की बिल्डिंगों से सारे लोग मुझे देख रहे थे और वीडियो बना रहे थे। मैं उन्हें देखकर हैरान हो गया कि वे मुझे बचाने के बजाय यह देखना चाहते थे कि आदमी जिंदा बचेगा या जलेगा? 

हर तरफ जोखिम था तब शरद कुमार दिखा

इधर, लपटों की गरमाहट तेज महसूस होने लगी थी। कुछ समझ नहीं आ रहा था। पास में ही ऊपर टंकी दिखी तो मैं उस तरफ गया। वहां से एसी वाले सेक्शन में पहुंचा। उस जगह एक खिड़की दिखी। मुझे लगा खिड़की के ऊपर का पतरा पकड़कर मैं दूसरी छत पर जा सकता हूं, लेकिन उसका पतरा कमजोर था। इस विकल्प के बंद होने पर सोचा कि पास की छत पर छलांग लगा दूं, लेकिन मन में विचार आया कि ये आखिरी ऑप्शन है। अभी कोई और रास्ता देखना चाहिए। इसी बीच दूसरी छत पर वीडियो बना रहे युवक (शरद कुमार) ने मुझे इशारा किया कि वहीं रुकें, वह मदद करने आ रहा है।

शरद कुमार, मुकेश चाय वाले और एक पुलिसकर्मी को लेकर ऊपर आया

वह नीचे गया और एक युवक (मुकेश, चायवाला) व एक पुलिसकर्मी के साथ ऊपर आया। उन्होंने पड़ोस की छत से सीढ़ी लगाई और मुझे धीरे-धीरे आने को कहा। सीढ़ी पर चलने में डर लग रहा था, पर उधर से तीनों हिम्मत बंधा रहे थे। जैसे-तैसे मैं उस पार पहुंचा और उन लोगों ने मुझे थाम लिया। धुएं के कारण मेरे साथ शरद की हालत भी थोड़ी खराब हो गई। उसे ऑक्सीजन सपोर्ट देना पड़ा। ये तीन देवता समान लोग थे, जिन्होंने मेरी जान बचा ली। इनका दिल से शुक्रिया।