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GWALIOR को चंबल के पानी पर वन विभाग का बेतुका अड़ंगा

ग्वालियर। ग्वालियर के लोगों की प्यास बुझाने के लिए चंबल का पानी दिए जाने की प्रक्रिया पर वन विभाग ने अड़ंगा लगा दिया है। चम्बल की बाढ़ ने हाल ही में कई गांव डुबा दिए थे, अब वन विभाग का कहना है कि नदी में पानी कम है। यदि इंसानों के लिए पानी दिया तो जानवर प्यासे रह जाएंगे। 

वन विभाग हमेशा अड़ंगे लगाता है

मध्यप्रदेश में वन विभाग की पहचान अड़ंगे लगाने वाले विभाग के रूप में ही हो गई है। दर्जनों ऐसे मामले में हैं जिसमें वन विभाग के अफसरों ने पहले जानवरों के लिए बेहद घातक बताकर कई महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट को एनओसी नहीं दीं, कुछ समय बाद परिस्थितियों में बिना किसी बदलाव ​के एनओसी जारी कर दी गई। वन विभाग के अफसर ऐसा करके अपनी वेल्यू एड करते हैं या फिर इसके पीछे कोई साजिश है, यह तो जांच का विषय है परंतु इस मामले में वन विभाग जितना पानी नदी में होने पर इन जीवों के सुरक्षित रहने का दावा कर रहा है, उतना पानी तो नदी में अभी भी नहीं बहता और उसी बहाव में से राजस्थान कई क्षेत्रों के लिए पर्याप्त मात्रा में पानी सप्लाई ले रहा है।

वन विभाग की थ्योरी मान लें तो घड़ियाल और डॉल्फिन अब तक मर जाने चाहिए थे

वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि चंबल नदी में पानी का बहाव 68 क्यूबिक मीटर प्रति सेकंड है, जो कि कम है। क्योंकि, 200 क्यूबिक मीटर प्रति सेकंड से कम बहाव पर घड़ियाल और डॉल्फिन मर जाएंगे। जबकि न तो सामान्य तौर पर नदी का बहाव 200 क्यूबिक मीटर प्रति सेकंड होता है और न अभी है। वन विभाग की थ्योरी मान लें तो घड़ियाल और डॉल्फिन अब तक मर जाने चाहिए थे। यदि वो जिंदा हैं तो यह प्रमाणित होता है कि वन विभाग की थ्योरी गलत है। 

राजस्थान भी तो पानी ले रहा है, मप्र में ही आपत्ति क्यों

फिर भी राजस्थान अपने कोटा, करौली समेत अन्य क्षेत्रों के लिए पर्याप्त पानी ले रहा है। ग्वालियर के लिए 1.75 क्यूबिक मीटर प्रति सेकंड बहाव के पानी की जरूरत है। अप्रैल, मई व जून के दौरान नदी में पानी का स्तर कुछ कम रहता है तो इससे पहले और इसके बाद तिघरा को भरा जा सकता है। इन महीनों में ग्वालियर के लिए पानी नहीं लेकर भी चंबल से पानी लाने का विकल्प खुला रह सकता है।