साध्वी एवं सांसद प्रज्ञा ठाकुर का बयान आपत्तिजनक क्यों है | Why MP Pragya Thakur's statement is objectionable

Bhopal Samachar
भोपाल। एबीवीपी की पूर्व नेता, साध्वी और महामंडलेश्वर स्वामी पूर्ण चेतनानंद गिरी के बाद अब भाजपा की सांसद बन गईं प्रज्ञा सिंह ठाकुर ने बीते रोज बयान दिया कि भाजपा नेताओं की मौत के पीछे विपक्ष की 'मारक शक्ति' काम कर रही है। यानी विपक्ष ने विशेष प्रकार का 'तांत्रिक टोटका' किया है जिसके कारण भाजपा के नेताओं की मौत हो रही है। इसे आपत्तिजनक बयान माना गया परंतु कुछ विद्वान प्रश्न उठा रहे हैं कि इसमें आपत्तिजनक क्या है। उनके पास कुछ तर्क हैं और दावा करते हैं कि इस तरह का बयान उचित है। आइए जानते हैं प्रज्ञा ठाकुर के बयान को आपत्तिजनक क्यों माना जा रहा है। 

सांसद प्रज्ञा ठाकुर का बयान किस श्रेणी में आता है

लोगों को अब समझ लेना चाहिए कि प्रज्ञा सिंह ठाकुर अब एक सांसद है। भारत के भाग्य का निर्धारण करने वाली संसद की सदस्य, जो भारत के संविधान के अनुसार संचालित होती है। किसी अखाड़े के नियमों के अनुसार नहीं। प्रज्ञा ठाकुर का यह बयान 'अंधविश्वास' की श्रेणी में आता है, क्योंकि वो या उनके पूज्य महाराजजी अपने दावे को वैज्ञानिक तौर पर प्रमाणित नहीं कर सकते। यदि यह बयान महामंडलेश्वर स्वामी पूर्ण चेतनानंद गिरी ने दिया होता तो किसी को आपत्ति नहीं होती। उन्हे अंधविश्वासी साधु मानकर नजरअंदाज कर दिया जाता है परंतु ऐसा नहीं है। यह बयान सांसद प्रज्ञा ठाकुर ने दिया है। 

संविधान क्या कहता है

संविधान की धारा 51-ए में मानवीयता एवं वैज्ञानिक चिंतन को बढ़ावा देने में सरकार के प्रतिबद्ध रहने की बात की गई है और इसी धारा की प्रतिबद्धिता यह सुनिश्चित करती है कि भारत की सरकार में शामिल लोग यानी सांसद से लेकर पार्षद तक और प्रधानमंत्री कार्यालय के अफसरों से लेकर ग्राम पंचायत के कर्मचारी तक सभी लोग ना केवल अंधविश्वास से दूर रहें बल्कि यदि कहीं है तो उसका विरोध करें। 

क्या साध्वी प्रज्ञा सिंह धर्म की बात कर रहीं थीं

‘नरेन्द्र दाभोलकर’ और ‘अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति’ ने 18 वर्षों तक संघर्ष किया। वो अं​धविश्वास के खिलाफ लड़ रहे थे परंतु उन्हे कुछ हिंदू नेताओं ने धर्मविरोधी करार दिया गया। उन्हे कई बार धार्मिक भावनाएं आहत करने के अरोप में जेल में बंद किया गया और अंतत: उनकी मृत्यु हो गई लेकिन इतिहास में दर्ज है कि ‘नरेन्द्र दाभोलकर’ के कारण ही महाराष्ट्र में अंधविश्वास विरोधी और काला जादू (रोकथाम) अधिनियम लागू किया गया। इसी के साथ सुनिश्चित हुआ कि धर्म और अंधविश्वास अलग-अलग हैं। अंधविश्वास, जादू-टोना या तांत्रिक क्रियाओं को बढ़ावा देने वालों का कोई धर्म नहीं होता। वो केवल भय का वातावरण निर्मित करते हैं और लाभ कमाते हैं। 
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