सांसद जी, सदन में तो रहिये | EDITORIAL by Rakesh Dubey

नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संसद सत्र के दौरान दिल्ली में रहने और सदन से गायब रहने वाले सांसदों और मंत्रियो के प्रति खासी नाराजगी जतायी है उन्होंने अनुपस्थित मंत्रियों की सूची तलब की है। अनेक विपक्षी नेताओं ने उनसे मंत्रियों की गैर-हाजिरी की शिकायत की थी। आम मतदाता की भी यही अपेक्षा है कि देश की सबसे बड़ी पंचायत अपना कामकाज ठीक ढंग से कर सके, इसके लिए जरूरी है कि सांसद और मंत्री सदन की बैठकों में मौजूद रहें। यही हाल राज्यों में विधानसभाओं का है। वहां भी मंत्री विधायक सदन से अनुपस्थित रहना शान समझते हैं। परिपाटी तो यह है कि सरकार का प्रतिनिधित्व करने के लिए मंत्रियों की एक सूची बनायी जाती है, जिसके अनुसार बारी-बारी से मंत्रियों का समूह सदन में हाजिर रहना होता है।

लोक सभा में चालू सत्र के दौरान ठीक ऐसा ठीक से नहीं होने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नाराजगी जतायी है और उन्होंने अपने सांसदों को भी सदन में रहने की फिर नसीहत दी है। वे पहले यह भी इंगित कर चुके हैं कि मंत्रिपरिषद गठन में उन्होंने सांसदों की मौजूदगी और चर्चाओं में शामिल होने के रिकॉर्ड का भी संज्ञान लिया था। वैसे प्रधानमंत्री ने उचित ही कहा है कि सत्र की अवधि में सदन में नहीं रहने का कोई कारण नहीं हो सकता है। सही मायने में जनता ने उन्हें सत्र के दौरान सदन में उपस्थित रहने और  कानून बनाने और अहम मसलों पर चर्चा करने के लिए लोकसभा और राज्यसभा में भेजा है। ठीक इसी तरह, विधानसभा और विधान परिषद में विधायकों की भूमिका होती है।

सदन की कार्यवाही में सरकार से जवाब तलब करना सांसद और विधायकों का अधिकार है तो सरकार की ओर से अपना पक्ष रखना तथा सदन की कार्यवाही में निरंतर भागीदारी मंत्री के दायित्व का महत्वपूर्ण हिस्सा है। अगर सांसद  विधायक और मंत्री सदन में ही नहीं होंगे, तो सत्र का मतलब क्या रह जाता है? कई यह भी देखा जाता रहा है कि प्रश्न काल में जब मंत्री जवाब देने के लिए मौजूद होते हैं, तो सवाल पूछने वाले सांसद विधायक ही गायब रहते हैं।

कुछ साल पहले इस समस्या के कारण राज्यसभा ने अपने नियमों में कुछ संशोधन करते हुए यह व्यवस्था कर दी है कि ऐसे सांसदों के न रहने पर भी मंत्री मौखिक रूप से जवाब दे सकते हैं और उपस्थित सदस्य पूरक प्रश्न पूछ सकते हैं। इससे सरकार की जवाबदेही को पुख्ता करने में मदद मिली है। आम तौर पर साल में संसद और विधानसभा के सत्रों की अवधि सौ दिन के आसपास होती है। सौ दिन भी पूरी मुस्तैदी से काम  न करना कहीं से भी ईमानदारी नहीं कही जा सकती।

संसद सत्र का खर्च छह सौ करोड़ रुपये से भी अधिक आता है। कुछ आकलनों के मुताबिक संसद का हर मिनट का खर्च ढाई लाख होता है| ऐसा खर्च आंकड़ा विधानसभाओं का है |ऐसे में मंत्रियों और सदस्यों के न रहने, हंगामा होने, स्थगन होने जैसे कारकों से समय के साथ धन की भी बर्बादी होती है| जनता द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधियों को यह ध्यान में रखना चाहिए कि उनके वेतन-भत्ते और सुविधाओं का खर्च जनता ही वहन करती है| अनुपस्थिति और अव्यवस्था और हंगामों से विधेयकों पर चर्चा भी बाधित होती है| कई बार सत्र के अंतिम एक या दो दिन में अनेक विधेयकों को मामूली चर्चा या बिना बहस के पारित करना पड़ता है| सदन चलाने में विपक्ष की भूमिका भी महत्वपूर्ण है, पर इसकी अधिक जिम्मेदारी सत्ता पक्ष की है| दोनों अपनी जवाबदारी समझे जनता उनका मूल्यांकन कर रही है |
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श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।
संपर्क  9425022703        
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