Loading...

भोपाल नगर निगम का प्रतीक चिन्ह बदला, 1997 में पहल की थी 22 साल के बाद बदला | BHOPAL NEWS

भोपाल। नगर निगम भोपाल का लोगो बदलने के आदेश जारी हो गए हैं। 26 जून को नगर निगम परिषद बैठक में महापौर आलोक शर्मा ने इस संबंध में प्रस्ताव पेश किया था। नेता प्रतिपक्ष मो सगीर सहित कांग्रेस के अन्य पार्षदों के विरोध के बाद बहुमत से प्रस्ताव पारित हुआ था। सगीर ने निगमायुक्त को पत्र लिखकर प्रतीक चिह्न बदलने पर आपत्ति भी दर्ज कराई थी। खास बात यह है निगमायुक्त ने पत्र को लीगल ओपिनियन के लिए भेजा है। लेकिन इससे पहले ही यह आदेश जारी हो गए। परिषद अध्यक्ष सुरजीत सिंह चौहान ने बताया कि उन्होंने नगरपालिक निगम अधिनियम का हवाला देकर आदेश जारी करने को कहा था।

नगर निगम में जिस प्रतीक चिन्ह (लोगो) को सालों तक अपनाया गया, वह नवाबकाल में हैदराबाद निजाम ने भोपाल भेजा था। निगम के इस लोगो को बदलने के लिए भी 1997 में पहल शुुरू की गई थी। भोपाल के इतिहास के जानकार बताते हैं कि दो मछली, फतेहगढ़ किले की तस्वीर, फूल और 12 इमामों के प्रतीक के इस चिन्ह को माहिमरातिव कहा जाता था, जो वर्ष 1726 में भोपाल की नवाबकालीन रियासत को हैदराबाद के निजाम ने भेजा था।

डॉ. आलोक गुप्ता द्वारा लिखी गई किताब भोपाल-दी रियल हिस्ट्री में इस प्रतीक चिन्ह का इतिहास मिलता है। डॉ. गुप्ता ने बताया कि वर्ष 1722 के पहले हैदराबाद के निजाम ने भोपाल रियासत पर आक्रमण किया था। तब भोपाल पर शासन कर रहे दोस्त मोहम्मद खान निजाम का मुकाबला नहीं कर पाए और निजाम दोस्त मोहम्मद खान के बेटे यार मोहम्मद खान को बंधक बनाकर हैदराबाद ले आए। 1726 में दोस्त मोहम्मद खान की मौत की खबर हैदराबाद पहुंची। तब निजाम ने यार मोहम्मद खान को कई उपहारों के साथ भोपाल रियासत के लिए रवाना किया था। यहीं से इस प्रतीक चिन्ह का सफर शुरू हुआ।

शाहजहां बेगम ने भी नहीं अपनाया था प्रतीक चिन्ह

इतिहास में प्रमाणित रूप से इस चिन्ह का उल्लेख शाहजहां बेगम द्वारा आत्मकथा पर लिखी गई किताब में मिलता है। उन्होंने हैदराबाद के निजाम द्वारा भोपाल रियासत को याद मोहम्मद खान के माध्यम से भेजने की बात लिखी थी। पर इस चिन्ह को शाहजहां बेगम ने भी नहीं अपनाया। डॉ. आलोक गुप्ता बताते हैं कि भोपाल नवाबकालीन शासन में किसी भी शासनकाल में इस प्रतीक चिन्ह को राज्य चिन्ह नहीं बनाया गया।

1901 में बने नवाबकालीन भवनों में उकेरा गया

भोपाल रियासत के सिक्के, दस्तावेज, पुराने रोजनामचा में भले ही चिन्ह का उपयोग नहीं किया हो, लेकिन भवनों में इस चिन्ह को उकेरा गया था। नवाबकालीन इमारतों में चिन्ह दिखाई दिया। गुप्ता ने बताया कि वर्ष 1901 में सुल्तानजहां बेगम ने इसका उपयोग किया था। 250 साल के नवाबी शासन काल के अंतिम 50 साल में इसका उपयोग हुआ। भोपाल नगर निगम की स्थापना भी नवाबकालीन दौर में हुई। लिहाजा, इस चिन्ह का उपयोग प्रतीक चिन्ह के रूप में किया जाने लगा।

गुलामी के प्रतीक इस चिन्ह को बदलने के लिए वर्ष 1997 और 1999 में पत्र लिखा गया। तत्कालीन महापौर, नियमायुक्त व मुख्मयमंत्री को इतिहास का हवाला देते हुए इसे बदलने की मांग की गई। सरकार ने कुछ समय बाद इस प्रतीक चिन्ह में अशोक स्तंभ को शामिल किया। वर्ष 2012 में भोपाल विलीनीकरण एवं स्वातंत्र्य समिति के डॉ. आलोक गुप्ता ने तत्कालीन राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री के नाम 62 पृष्ठों का ज्ञापन सौंपा।

प्रतीक चिन्ह को लेकर हो रहे विरोध की जानकारी महापौर आलोक शर्मा को थी। उन्होंने वर्ष 2016 में प्रतीक चिन्ह की जानकारी ली। डॉ. आलोक गुप्ता बताते हैं कि वर्ष 2017 के बजट सत्र में इसे बदलने की तैयारी पूरी कर ली गई थी, लेकिन 22 साल के बाद इसे हटाया गया।