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मप्र में है अर्द्धकुंवारी माता का मंदिर: आधी रात को अर्जी लगती है, अष्टमी को लगता है दरबार | MAA ARDHKUWARI KA MANDIR HARPALPUR CHHATARPUR

सुनील विश्वकर्मा/छतरपुर/हरपालपुर। झाँसी से मात्र 96 किलोमीटर दूर, जिला छतरपुर से 60 किलोमीटर की दूरी व खजुराहो से 100 किलोमीटर की दूरी पर है हरपालपुर में स्थित अर्द्धकुंवारी माता का मंदिर। बाहर से आने वाले श्रद्धालु भक्त आसानी से अपने निजी वाहन से मंदिर तक पहुंच सकते हैं। सीढ़ियां चढ़कर माता के मंदिर में दर्शन कर सकते है और जो भक्त ट्रैन या बस से आते है मंदिर तक जाने के लिए टैक्सी वाहन से मंदिर पहुंच सकते है। 

आज तक कोई खाली हाथ वापस नहीं लौटा

पहाड़ पर स्थित है हरपालपुर की माता अर्द्धकुंवारी का भव्य मंदिर। मंदिर पर पहुंचने के लिए लगभग 300 सीढ़ियों से चढ़कर माता के दर्शन करने की लिये श्रद्धालु आते हैं और मंदिर में माता अर्द्धकुंवारी से अपनी विनती कर अपनी मनोकामना पूर्ण करते हैं। मान्यता हैं कि माता अर्द्धकुंवारी के दरबार से आज तक कोई खाली हाथ वापस नहीं गया। श्रद्धालुओं की मनोकामना  पूर्ण होने पर दूर दराज से श्रद्धालु नवरात्रि में चढ़ावा चढ़ाने के लिए माता के दरबार में आते है।

सुबह चार बजे होती हैं अर्द्धकुंवारी की आरती

सुबह तीन बजे से ही मंदिर जाने के लिए श्रद्धालुओं  का तांता लग जाता है। माता अर्द्धकुंवारी का मंदिर पहाड़ पर ऊंचाई पर स्थित होने से माता रानी का मनोरम दृश्य भक्तो को खींचकर लाता हैं पहाड़ से इतनी अधिक ऊंचाई से नीचे का नजारा देखने का अलग ही दृश्य होता हैं। नवरात्र एक ऐसी नदी हैं जो भक्ति और शक्ति के तत्वों के बीच बहती है। सनातन हिन्दू धर्म में नवरात्र की प्रासंगिकता स्वयं सिद्ध हैं।

अष्टमी के दिन रात्रि में लगता है माता का दरबार 

दूर दराज से श्रद्धालु आते है और माता के दरबार में अपनी अर्जी डालते हैं। माता के दरबार खाली हाथ कोई भी श्रद्धालु वापिस नहीं जाता हैं। माता के दरबार जब लगता है रात्रि के समय बहुत भीड़ हो जाती है हर कोई माता अर्द्धकुंवारी का दरबार देखने के लिये रात के समय ही पहुंच जाते है। अष्ट्मी के दिन हजारों की संख्या में श्रद्धालु माता के मंदिर में पहुंचते हैं। यह भौतिक नहीं, बल्कि लोक से परे आलौकिक रूप है। 

पहाड़ी तक कैसे पहुंचे

पहले आदिकुंवारी के मंदिर के लिए पहुंचने के लिए कोई न कोई रास्ता था और न ही सीढ़िया थी सीधे पहाड़ पर चढ़कर ही श्रद्धालु माता के दर्शन करने के लिए जाते थे। ऊँचे पहाड़ पर माँ अर्ध कुवारी विराजमान हैं। भक्तों की मनोकामना पूर्ण होने से धीरे धीरे मंदिर का निर्माण होता गया और आज मंदिर जाने के लिए सीढ़ियां बन गयी है और पहाड़ की ऊंचाई अधिक होने से सीढ़ियों के किनारे ग्रिल लगाई गयी है। भक्तों को पीने के पानी के लिए पहाड़ पर पानी की टंकी भी बनाई गयी पहाड़ के नीचे जमीन पर बोर से पाइप लाइन के द्वारा ऊंचे पहाड़ पर बनी पानी की टंकी में पहुंचाया जाता है।
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