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अयोध्या विवाद: मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट ने 67 एकड़ अधिग्रहित भूमि वापस मांगी | MP NEWS

नई दिल्ली। लोकसभा चुनाव से पहले केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अर्जी देकर अयोध्या में गैर-विवादित जमीन पर यथास्थिति हटाने की मांग की है। इस पर अयोध्या के साधु-संतों और दोनों पक्ष (राम मंदिर-बाबरी मस्जिद) के पैरोकारों की प्रतिक्रियाएं भी सामने आ रही है। यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने भी सरकार की याचिका का स्वागत किया है। उन्होंने कहा, 'हम केंद्र के इस कदम का स्वागत करते हैं। हम पहले भी कह चुके हैं कि हमें गैर-विवादित जमीन के इस्तेमाल की अनुमति मिलनी चाहिए।'  

केंद्र सरकार की 67 एकड़ जमीन की वापसी की याचिका पर राम जन्म भूमि मंदिर के पुजारी सत्येंद्र दास ने कहा कि केंद्र सरकार अविवादित 67 एकड़ अधिग्रहित भूमि को वापस ले सकती है लेकिन जबतक गर्भगृह की विवादित जमीन पर फैसला नहीं होता मंदिर निर्माण नहीं शुरू हो सकता। उन्होंने कहा, 'कोर्ट लगातार तारीख देकर मंदिर-मस्जिद केस की सुनवाई टाल रहा है। इस पर जल्द फैसला आना चाहिए या सरकार संसद में कानून बना कर इस विवाद का हल कर अपने वादे पर खरा उतरे।' 

बाबरी मस्जिद के दूसरे पक्षकार हाजी महबूब ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा, 'यह राजनीतिक खेल जिससे 1990 जैसे हालात पैदा हो सकते हैं। न्यास को जमीन देने की मंशा सरकार ने जाहिर कर दी है जबकि अधिग्रहण के मकसद में साफ कहा गया है कि जिसके पक्ष में फैसला आएगा, उसे इसका हिस्सा आवंटित किया जाएगा।' उन्होंने कहा कि विवादित भूखंड को छोड़ कर कहीं भी मंदिर निर्माण किया जाए हमें ऐतराज नहीं है पर विवादित 2.77 एकड़ सुरक्षित रहना चाहिए। 

'याचिका 2014 में ही दायर हो जानी चाहिए थी'
राम जन्म भूमि न्यास के वरिष्ठ सदस्य डॉ. राम विलास वेदांती ने कहा कि 67 एकड़ जमीन की वापसी की याचिका केंद्र सरकार का देर से उठाया गया पर अच्छा कदम है। उन्होंने कहा, 'यह याचिका 2014 में जब बीजेपी की सरकार बनी उसी समय दायर होनी चाहिए थी। अब तक मंदिर का निर्माण भी चलता रहता और कोर्ट का फैसला भी आ गया होता। अब अगर कोर्ट में याचिका पर निर्णय होकर अविवादित जमीन न्यास को वापस मिल जाती है तो मंदिर निर्माण शुरू कर दिया जाएगा।' 

वीएचपी ने किया सरकार के कदम का स्वागत 
विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) के अंतरराष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष आलोक कुमार ने कहा, 'हम सरकार द्वारा उठाए गए कदम का स्वागत करते हैं।' उन्होंने कहा, 'तत्कालीन सरकार ने 1993 में कुल 67.703 एकड़ जमीन अधिगृहीत कर ली थी। इसमें राम जन्मभूमि न्यास की जमीन भी शामिल थी।' उन्होंने कहा कि 'विवादित ढांचा वाले जमीन सिर्फ 0.313 एकड़ की है। इसके अलावा राम जन्मभूमि न्यास सहित बाकी जमीन विवादित स्थल पर नहीं है। हमें उम्मीद है कि सुप्रीम कोर्ट इस अर्जी पर जल्द से जल्द फैसला लेगा।' 

कोर्ट ने पहले कोई धार्मिक गतिविधि न होने देने का निर्देश दिया था 
बता दें कि केंद्र ने कोर्ट में कहा है कि वह गैर-विवादित 67 एकड़ जमीन इसके मालिक राम जन्मभूमि न्यास को लौटाना चाहती है। इस जमीन का अधिग्रहण 1993 में कांग्रेस की तत्कालीन नरसिम्हा राव सरकार ने किया था। कोर्ट में बाद में वहां यथास्थिति बनाए रखने और कोई धार्मिक गतिविधि न होने देने का निर्देश दिया था। 

केंद्र सरकार की याचिका के मुताबिक 0.313 एकड़ जमीन जिसपर विवादित ढांचा स्थित था, उसी को लेकर विवाद है। बाकी जमीन अधिग्रहित जमीन है। जबकि बाकी पक्षों का मानना है कि विवादित स्थल 2.77 एकड़ जमीन पर है जिसे इलाहाबाद हाई कोर्ट ने तीन पक्षकारों में बराबर-बराबर बांट दिया था। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट की संविधानपीठ ने 2003 में पूरी अधिग्रहित जमीन 67.707 एकड़ पर यथास्थिति बनाने का आदेश दिया था।