कांग्रेस ने पीताम्बरा पीठ को भी राजनीति में घसीट लिया | MP ELECTION NEWS

15 October 2018

श्रीमद डांगौरी। राहुल गांधी ने आज दतिया में मां पीताम्बरा शक्ति पीठ पहुंचकर दर्शन एवं पूजा अनुष्ठान किए। इसी के साथ कांग्रेेसियों ने यह प्रचारित करना शुरू कर दिया कि इस पीठ से 25 सीटों पर प्रभाव पड़ेगा। यहां बताना जरूरी है कि मध्यप्रदेश में धर्म संस्थान और मंदिर या पीठ उत्तरप्रदेश की तरह राजनीति में दखल नहीं रखते। शक्ति पीठ से वोट के लिए कोई अपील नहीं की जाती और ना ही कोई संकेत दिया जाता है। 

राहुल, गांधी परिवार के तीसरे व्यक्ति जो पीठ की शरण में आए

भारत की शायद ही ऐसी कोई हस्ती हो जो मां पीताम्बरा शक्ति पीठ की शरण में ना आई हो। राहुल गांधी अपनी राजनीति के लम्बे समय बाद यहां आए। वो गांधी परिवार के तीसरे सदस्य हैं। इससे पहले प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी एवं राजीव गांधी यहां आए थे। मां पीताम्बरा शक्ति पीठ पर चीन से युद्ध के समय शांति के लिए अखंड यज्ञ अनुष्ठान किया गया था और माना गया कि इसी के कारण भारत की रक्षा हो पाई। 

मां पीताम्बरा शक्ति पीठ में शत्रुनाश के लिए अनुष्ठान होता है

मां पीताम्बरा को शत्रुनाश की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है। यहां राजसत्ता प्राप्ति के लिए अनुष्ठान किए जाते हैं। कभी यहां श्मशान हुआ करता था। इस पीठ की स्थापाना 1935 में हुई थी। 1962 में चीन आक्रमण के समय राष्ट्र रक्षा के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने यहां अनुष्ठान कराया था। हालांकि, वे खुद नहीं आए थे। कहा जाता है कि यज्ञ की अंतिम आहुति के साथ ही युद्ध समाप्त हो गया था। यहां कई नेता और कारोबारी अनुष्ठान कराने आते हैं। मंदिर कभी किसी के साथ या खिलाफ नहीं होता। 

सभी दलों के नेता यहां आते हैं

पीताम्बरा पीठ में अटल बिहारी वाजपेयी, राष्ट्रपति बनने से चंद दिन पहले रामनाथ कोविंद, राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे, उत्तरप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ यहां पूजा-पाठ कर चुके हैं। 2013 में जब संजय दत्त पर आर्म्स एक्ट का केस चल रहा था। उस दौरान संजय दत्त अपने अपने बहनोई कुमार गौरव और कुछ मित्रों के साथ यहां आए थे। 

मप्र में मंदिरों की राजनीति नहीं होती

यहां बताना जरूरी है कि मध्यप्रदेश में मंदिरों की राजनीति नहीं होती। सभी प्रतिष्ठित मंदिरों में सभी दलों के नेता आते हैं लेकिन यहां कोई भी मंदिर किसी नेता या पार्टी के समर्थन में अपील नहीं करता। यहां मंदिर की समितियां और मठाधीश किसी विचारधारा के साथ या खिलाफ नहीं होते। वो हमेशा तटस्थ होते हैं। 
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