मप्र में 3 मंत्रियों को हरा चुका है नोटा, अबकी तीसरी ताकत बन सकता है | MP ELECTION NEWS

Updesh Awasthee
भोपाल। ईवीएम मशीन में सबसे लास्ट में आने वाला बटन नोटा यानि उपरोक्त में से कोई प्रत्याशी पसंद नहीं, की दहशत इस बार साफ नजर आ रही है। आरक्षण के खिलाफ चल रहे आंदोलन में नोटा इस आंदोलन का सर्वमान्य नेता बनकर सामने आया है। आंकड़े बताते हैं कि 2013 के विधानसभा चुनाव में नोटा ने 17 सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाई थी। अब 2018 के चुनाव में 148 सीटों पर इसका व्यापक असर दिखाई दे सकता है। बता दें कि 230 में से 148 वोट सीटें हैं जहां सवर्ण एवं पिछड़ा वर्ग के लोगों का वोट प्रतिशत सबसे ज्यादा है। 2013 में बताना जरूरी है कि नोटा के कारण 3 मंत्री चुनाव हार चुके हैं। 

मध्यप्रदेश में तीसरी ताकत बन सकता है नोटा
6 सितंबर को भारत बंद के बाद उज्जैन में हुई सवर्णों की सभा में करीब 2 लाख लोग जुटे थे। इनमें ओबीसी भी शामिल थे। राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो इस बार 32 सीटें ऐसी हैं, जहां सवर्ण-ओबीसी आबादी यदि इन आंदोलनों का हिस्सा बनीं तो इन सीटों पर नोटा प्रभावी रह सकता है। 2013 में बसपा का वोट 6.29 फीसदी था। ऐसे में नोटा इसबार तीसरी ताकत बन सकता है। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टीएस कृष्णमूर्ति ने ये मांग उठाई है कि नोटा बहुत बेहतर है। जिन सीट पर जीत और हार के अंतर से ज्यादा नोटा पर वोट हो, वहां पर दोबारा चुनाव हो। मप्र में 2013 के चुनाव में 6.51 लाख नोटा वोट थे, जो कि कर्नाटक और गुजरात के असेंबली इलेक्शन में पड़े नोटा वोट से भी ज्यादा थे 

3 मंत्री नोटा के कारण घर बैठ चुके 
2013 के चुनाव में मप्र में पहली बार नोटा विकल्प था। 6.51 लाख नोटा वोटर थे। इससे सरकार में रहे तीन मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा, करण सिंह वर्मा और हरिशंकर खटीक चुनाव हार गए थे। दो मंत्री माया सिंह और रंजना बघेल नजदीकी मुकाबला जीती थीं। इन प्रत्याशियों की जीत-हार के अंतर से ज्यादा वोट नोटा पर पड़े थे। यदि ये वोट मंत्रियों को मिल जाते तो वो जीत जाते। 

गुजरात-कर्नाटक में भी दम दिखा चुका है नोटा 
गुजरात-कर्नाटक में हुए चुनाव में नोटा तीसरी ताकत बना था। गुजरात में साढ़े 5 लाख यानी (1.80 फीसदी) वोटर ने नोटा दबाया था। भाजपा और कांग्रेस के बाद दूसरी पार्टियों से ज्यादा नोटा रहा था। कर्नाटक में 3,21,829 नोटा वोट (0.90) भाजपा के लिए विलेन बने थे। यहां छह सीट में भाजपा की हार का अंतर नोटा से कम था। इनमें भाजपा दूसरे नंबर पर रही, लेकिन सरकार में नहीं आ पाई। 

यूं समझें…कहां-कहां असर करेगा नोटा 
सवर्ण समाज के आंदोलन से सपाक्स, राजपूत करणी सेना, ब्राह्मण एकजुटता जुड़े हैँ। प्रदेश में सवर्ण समाज 15 फीसदी है, जबकि ओबीसी 37 फीसदी है। ये कुल आबादी का 52 प्रतिशत है। सवर्ण विंध्य में 29 प्रतिशत, ग्वालियर-चंबल-28 प्रतिशत, मध्यभारत में 24, महाकौशल-22 फीसदी और मालवा-निमाड़ में 11 फीसदी है। 
ओबीसी ग्वालियर-चंबल-32,विंध्य-14,महाकौशल-18 और मालवा-निमाड़ में 12 फीसदी है। दलित आंदोलन से नाराज ये दोनों वर्ग नोटा में बदले तो करीब 32 से 40 सीटें ऐसी होगी, जिनमें जीत और हार के फैक्टर में नोटा अहम हो सकता है। 
मध्यप्रदेश और देश की प्रमुख खबरें पढ़ने, MOBILE APP DOWNLOAD करने के लिए (यहां क्लिक करेंया फिर प्ले स्टोर में सर्च करें bhopalsamachar.com
भोपाल समाचार से जुड़िए
कृपया गूगल न्यूज़ पर फॉलो करें यहां क्लिक करें
टेलीग्राम चैनल सब्सक्राइब करने के लिए यहां क्लिक करें
व्हाट्सएप ग्रुप ज्वाइन करने के लिए  यहां क्लिक करें
X-ट्विटर पर फॉलो करने के लिए यहां क्लिक करें
फेसबुक पर फॉलो करने के लिए यहां क्लिक करें
समाचार भेजें editorbhopalsamachar@gmail.com
जिलों में ब्यूरो/संवाददाता के लिए व्हाट्सएप करें 91652 24289

#buttons=(Ok, Go it!) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Check Now
Ok, Go it!