महिला बाल विकास: 1 आॅफिस, 4 साल, 3.57 करोड़ का सेलेरी घोटाला | BHOPAL MP NEWS

Updesh Awasthee
भोपाल। महिला बाल विकास विभाग में बड़ा घोटाला सामने आया है। पूरे प्रदेश में यदि जांच हुई तो यह 100 करोड़ से ज्यादा का वेतन घोटाला हो सकता है। फिलहाल केवल एक कार्यालय की गड़बड़ी पकड़ी गई है। यहां लगभग सभी अधिकारी/कर्मचारियों ने गिरोह बनाकर घोटाला किया। 4 साल में 3.57 करोड़ रुपए वेतन के नाम पर डकार लिए गए। 

2014 से 2017 तक चार साल के भीतर 3 करोड़ 57 लाख का फर्जी भुगतान किया गया। 2014 से 2016 के बीच बैरसिया 1 व 2 परियोजना में 80 लाख, गोविंदपुरा 29 लाख, बरखेड़ी 40 लाख, चांदबड़ 64 लाख, मोतिया पार्क 14 लाख, बाणगंगा 2 लाख, फंदा परियोजना में 40 लाख रुपए निकाले गए है। इस मामले में अब तक 14 अफसरों और अकाउंटेंट्स के खिलाफ एफआईआर दर्ज हो चुकी है।

इस घोटाले में परियोजना अधिकारी बबीता मेहरा, अर्चना भटनागर, मीना मिंज, कृष्णा बैरागी, सुमेघा त्रिपाठी, कीर्ति अग्रवाल, श्याम कुमार व राहुल संधीर शामिल थे। पांच अकाउंटेंट दिलीप जेठानी, राजकुमार लोकवानी, बीके चौधरी, बीना भदौरिया और बंधारी की मिलीभगत से घोटाले को अंजाम दिया गया।

इस घोटाले की शुरूआत दिलीप जेठानी द्वारा शुरू की गई। इसके बाद एक-एक कर जेठानी के कहने पर दूसरे परियोजना में पदस्थ अकाउंटेंट, परियोजना अधिकार भी घोटाले में शामिल हो गए। विभाग को 95 में से 30 खाते ऐसे मिले हैं। जिसमें दिलीप जेठानी और अन्य अकाउंटेंट द्वारा बार-बार मानदेय का पैसा जमा कराया जाता था। 

मंत्री ने 3 बार जांच कराई, कुछ नहीं मिला
मामले की शिकायत मिलने के बाद महिला एवं बाल विकास मंत्री अर्चना चिटनीस ने 2016 में इस मामले की तीन बार उच्च स्तरीय जांच कराई लेकिन हर बार जांच टीम को अनियमितता नहीं पाया। इसके बाद जब मंत्री के पास इस मामले में चौथी बार शिकायत पहुंची तो उन्होंने यह जांच अपर संचालक राजपाल कौर और वित्त सलाहकार राजकुमार त्रिपाठी की कमेटी बनाई।

इसके लिए टीम को एक महीने का समय दिया गया। मामले की पड़ताल शुरू हुई। 2 हजार से ज्यादा आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं की पास बुक की जांच की गई। परियोजना अधिकारी द्वारा लगाए गए 400 से ज्यादा बिल और बाउचर की पड़ताल हुई। इसके बाद भी अफसर मामले को पकड़ नहीं पाए लेकिन जब मानदेय जमा करने की जांच जिला कोषालय के सॉफ्टवेयर से कराई गई, तो यह मामला पकड़ में आया।

जिला कोषालय द्वारा खातों की जानकारी उपलब्ध कराई। इसके बाद अफसरों ने इसका मिलान महिला एवं बाल विकास विभाग के सॉफ्टवेयर में दर्ज रिकॉर्ड से की गई तो पता चला कि जिन 95 खातों में पैसा जमा किया जा रहा। वो असल में विभाग के नहीं है।
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